बदलती तस्वीर: अकेले हम अकेले तुम!

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

दर्जनों बार दोहराया हुआ मुहावरा है ‘सिनेमा समाज का प्रतिबिम्ब है’। एक नजर समाज और दूसरी सिनेमा पर दौड़ाये तो उक्त कथन और अधिक स्पष्ट हो जाता है। समाज और फिल्मों का गठजोड़ अविश्वसनीय रूप से एक दूसरे से गुथा हुआ है। कौन किसका अनुसरण कर रहा है स्पस्ट रेखांकित नहीं किया जा सकता।

हमारे आसपास संयुक्त परिवार तेजी से ख़त्म हो रहे है।  यह बदलाव कोई अचानक से नहीं आया है। बल्कि इतनी धीमी गति से हो रहा है कि जब इसका आधा रास्ता तय हो गया तब अचानक से एकल परिवार हमारे आसपास बड़ी संख्या में नजर आने लगे।

सिनेमा के आरम्भ में फिल्मों के विषय धार्मिक चरित्र और आदर्शवादी कथानक हुआ करते थे। साठ का दशक आते आते धार्मिक आख्यान पृष्ठभूमि  में चले गए और परदे पर संयुक्त परिवार नजर आने लगा।  इन कहानियों का मुखिया एक आदर्शवादी व्यक्ति हुआ करता था और माँ नाम का चरित्र घोर ममतामयी त्याग की मूर्ति। ननद, बुआ, जेठानी जैसे पात्र भी कहानी को बढ़ाने में मदद करते थे। इस दौर में बनने वाली अधिकांश फिल्मों के निर्माता दक्षिण के थे जिनकी कहानियों के केंद्र में सिर्फ परिवार था। राजकपूर,  राजेंद्र कुमार की सफल फिल्मों से आरम्भ हुआ फार्मूला जीतेन्द्र की फिल्मों तक सफलता पूर्वक चला।

नब्बे का दशक आते आते देश में  ‘वैश्वीकरण’ की बयार बहने लगी। परिणाम स्वरुप  भारत के मनोरंजन क्षितिज पर सैटेलाइट चैनलों की झड़ी लगने लगी

नब्बे का दशक आते आते देश में  ‘वैश्वीकरण’ की बयार बहने लगी। परिणाम स्वरुप  भारत के मनोरंजन क्षितिज पर सैटेलाइट चैनलों की झड़ी लगने लगी। स्टार टीवी ने देसी कार्यक्रमों और पारिवारिक मेलोड्रामा से उबाये दर्शकों को हॉलिवुड पारिवारिक ड्रामा ‘सांता बारबरा’ और ‘बोल्ड एंड ब्यूटीफुल’ से सरोबार कर दिया। ये दोनों प्रसिद्ध शो इस बात के गवाह बन रहे थे कि परिवार नाम की संस्था अमेरिका और भारत में एक साथ बिखर रही थी।

यद्धपि अमेरिका में यह बिखराव आर्थिक आजादी के चलते तेजी से आया। इस बदलाव का रिफ्लेक्शन हिंदी फिल्मों में नजर आना था और वह पुरजोर तरीके से दिखाई भी देने लगा।  फिल्मों से परिवार और रिश्ते तेजी से गायब होने लगे।  यहां एक दिलचस्प संयोग भी है कि हिंदी फिल्मों से गायब परिवार आज भी क्षेत्रीय सिनेमा में नजर आ जाता है।

कभी कभी ऐसा लगता है मानो टीवी और बड़े परदे की दुनिया समय के दो  अलग अलग छोर पर खड़ी  है। फिल्मों की बढ़ती लागत ने कहानियो के हॉलीवुड से आयात का शॉर्टकट सुझाया वही टीवी ने ऐसे परिवार के दर्शन कराये जो वास्तविकता से कोंसो दूर था।  रंग बिरंगे कपड़ों में लिपटे, नफरत और षड्यंत्र से भरे, करोड़ों की बात करने वाले पात्र पता नहीं भारत के किस हिस्से में पाए जाते है , लगभग हरेक मनोरंजन चैनल पर नुमाया होते है। यहां टीवी धारावाहिकों में  परिवार तो है परन्तु नकारात्मकता, अंधविश्वास, और पुरातन ख्यालों से भरा हुआ है  । ये शो इस बात का सन्देश देते नजर आते है कि संयुक्त परिवार झगडे की जड़ है।

इस समय देश पर्यावरण, पानी  और पेड़ बचाने की जद्दोजहद में लगा है। इस अभियान में ‘परिवार’ को भी शामिल कर लिया जाना चाहिए।  महानगरीय जीवन शैली, घटती मृत्यु दर और स्वास्थ के प्रति जागरूकता ने भारतियों को लम्बी उम्र का विकल्प सुझाया है। लम्बी उम्र का फायदा तभी है जब परिवार साथ हो अन्यथा बहुसंख्यक चीनी और जापानी बुजुर्ग नागरिकों की तरह एकाकी जीवन का बोझा इस समय की युवा  पीढ़ी को अपने संध्याकाल में  भुगतना होगा। इन दोनों ही देशो में अकेले रह रहे बुजुर्गो  की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है ।

भारत के संयुक्त परिवारों का कम होते जाना और एकल परिवार का बढ़ते जाना हमे  उसी अवस्था तक पहुंचने का संकेत दे रहा है । फिल्मे हमे पुनः संयुक्त परिवार की और लौटने के लिये प्रेरित कर सकती है या परिवार का महत्व बेहतर तरीके से समझा सकती है ।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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