जिस मुद्रा योजना की नींव ऐसी है वहाँ मकान कैसा होगा!

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जितेन्द्र राजाराम/

जितेन्द्र राजाराम

शुक्रवार को प्रधानमंत्री के अधिकारिक ट्वीटर एकाउंट से ट्वीट किया गया, “देशभर में 15 करोड़ मुद्रा लोन दिए गए हैं इनमें से 11 करोड़ से अधिक महिला उद्यमियों को मिले हैं.” प्रधानमंत्री मुद्रा योजना की सफलता की कहानी कह रहे थे. लेकिन क्या सच में लोगों को इस योजना से फायदा मिला है और अगर मिला है तो किसको?

इस योजना का मूल 2014 में बनी नरेन्द्र मोदी की सरकार ने भारत में दो करोड़ रोज़गार प्रति वर्ष देने के वादे में देखा जा सकता है. इस दो करोड़ रोजगार के लिए सरकार ने कहा था कि व्यापार के अवसरों को भी बढ़ाया जाएगा ताकि रोज़गार माँगने वालों के साथ-साथ रोज़गार देने वालों की संख्या और सामर्थ में भी इज़ाफ़ा किया जाएगा. इसी उद्देश्य की पूर्ती के लिए सरकार ने मुद्रा योजना की घोषणा की. अब जब भी बढ़ती बेरोजगारी की बात होती है तो केंद्र सरकार इसी योजना के आंकड़े देकर कहती है कि पिछले चार साल में बहुत रोजगार का सृजन हुआ है. केंद्र सरकार के किसी दावे का आंकड़ो से पुष्टि करना तो लगभग नामुमकिन है क्योंकि सरकार आंकड़े देने में भरोसा नहीं करती. इसलिए हमने इस योजना के स्रोत का ही अध्ययन किया और पाया कि जमीन पर सबकुछ सरकार के दावे से अलग है.

केंद्र सरकार की मुद्रा योजना मध्यप्रदेश की एक योजना से प्रेरित है. मध्य प्रदेश में किसी भी स्नातक युवक को उद्यम स्थापित करने के लिए राज्य सरकार ने 25 लाख रुपय तक का कर्ज देने की योजना बनाई थी. स्नातक युवती के लिए, ओबीसी, एससी और एसटी वर्ग के लिए अतिरिक्त ऋण-मुक्त बीज-धन की परियोजना मध्यप्रदेश में पहेले से ही चल रही थी। ऐसी और भी कई उद्यमी योजनाओं में मध्यप्रदेश सरकार ने 1 करोड़ रुपय तक आवंटित करने के वादे किए थे. लेकिन वादों और हक़ीक़त के बीच इतने छेद हैं की मुद्रा योजना कहाँ से बह निकली ये कहानी बेहद दिलचस्प है.

हमने इस योजना का विधिवत अध्ययन किया और पाया कि इससे मध्यप्रदेश में कोई नया रोजगार अवसर नहीं बना. और तो और लगभग 90 प्रतिशत आवंटित राशि भी लोग खा पचा गए. 2016-17 में किए गए एक शोध के अनुसार, मध्यप्रदेश सरकार की इस योजना की विफलता की वजह यह बताई जा रही है की जिन लोगों ने ये लोन लिया है उन्हें उद्यमिता का इल्म ही नहीं था. इसको दूसरें शब्दों में कहें तो यह राशि सरकार और सत्तारुढ दल से जुड़े लोगों को दिया गया न कि उनको जिनके पास उद्यमिता का इल्म हो.

लेकिन सरकार अध्ययन को सही साबित करने के लिए फिर एक नयी योजना बनाई. वो यह कि सभी उद्यमिता कोष हितग्राहियों को मध्यप्रदेश सरकार अपने ख़र्चे पर प्रशिक्षण देगी. इस प्रशिक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की मानव विकास इकाई को चुना गया.

2016-17 में मध्यप्रदेश के 51 जिलों में से कुल 2800 हितग्राहियों की तीन दिन का प्रशिक्षण 50 दिनों के भीतर दिया जाना था. तीन दिन के इस प्रशिक्षण में हितग्राहियों की भागीदारी कुल 3 प्रतिशत से भी कम रही. जो लोग उपस्थित हुए वो उनमें से आधे महिला हितग्राही के पति थे. यानी कि ऋण महिला के नाम लिया गया और निधि का उपयोग पुरुष ने किया.

इसे समझने के लिए कटनी जिले का एक उदाहरण लेते हैं. वहाँ की एक एक महिला उद्यमी  को सरकार से 90 लाख रुपये मिले.  उससे उस महिला ने पोकलेन मशीन खरीदा. महिला उस प्रशिक्षण में उपस्थित ही नहीं हुई और उसके पति से जब इस योजना के फायदे पूछे गए तो उसका जवाब था कि वो पोकलेन मशीन पुरानी थी और अब ख़राब हो चुकी है. इसलिए उससे कोई आमदनी नहीं हो रही है.

सवाल यह है कि पुराना पोकलेन ख़रीदने वाली परियोजना में एक ऐसी महिला को जिसने कभी भी गृह निर्माण जैसा कार्य नहीं किया था उसे इतनी बड़ी रकम कैसे दे दी गई? एक पोकलेन ख़रीदना उद्यमिता की परिभाषा में कैसे आया? पुरानी मशीन ख़रीदने की योजना को अनुमति कैसे मिली?

कर्ज लेने देने में हैं पेंच

जितने भी सवाल ऊपर पूछे गए हैं उसका जवाब समझने के लिए कुछ मूलभूत बातें जाननी होगी. उद्यमिता योजना के अन्तर्गत प्राप्त होने वाले आवेदन की पुष्टि एमएसएमई करती है. ऋण देना है या नहीं इसका फ़ैसला ज़िला उद्योग केंद्र (डी॰आई॰सी) करता है. अंततः ऋण सरकार के आदेश पर कोई सरकारी बैंक देता है. यहीं आकर पेंच फंसता है.

सरकार के लाख दबाव के बाद भी बैंक ऋण देने के मामले में अपने अधिकार सुरक्षित रखता है. यानी की किसी भी नैतिक-अनैतिक दबाव के बावजूद बैंक ऋण आवंटित करने के मामले में स्वतंत्र है.

आँकड़े दुरुस्त करने और ख़ास लोगों की ख़ुशामद के दबाव में सरकार आनन-फ़ानन में बहुत से आवेदनों को ऋण देने के लिए बैंकों  पर दबाव बनाती है. दोनो तरफ़ से ये नूरा-कुश्ती चलती रहती है लेकिन ऋण नहीं दिया जाता.

यह सब बहुत प्रायोजित होता है वह इसलिए कि एक गरीब देश में बेरोजगारी से मार खाए बड़ी संख्या में लोग ऐसी योजना से लाभ लेने के लिए आवेदन करते हैं. अगर व्यस्थित सब हो तो इनको फायदा मिलेगा लेकिन सरकार का उद्देश्य अपने निजी दल के कार्यकर्ता और नाते रिश्तेदार होते हैं. देरी की जाती है. मार्च का महीना करीब आता है और सरकार और बैंक मिलकर आनन्-फानन में ऋण देना शुरू कर देते हैं. इसी कुछ दिनों पैरवी, रसूख आदि का इस्तेमाल होता है.

बताते चलें कि उद्यमिता प्रशिक्षण शिविर का प्रबंधन हैदराबाद की एक निजी फ़र्म जिसे सयुंक्त राष्ट्र ने ठेका दिया था. प्रशिक्षण की विषयवस्तु भारतीय प्रबंधन संस्थान इंदौर ने तैयार की थी और हैदराबाद की फ़र्म ने इंदौर और भोपाल के ही प्रशिक्षकों को मामूली फ़ीस पर अनुबंधित किया था. तीन प्रतिशत हितग्राहियों के उपस्थिति के बाद भी निजी फ़र्म ने प्रशिक्षण के सफल होने की रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र को दी. संयुक्त राष्ट्र ने प्रशिक्षण शुल्क का भुगतान कर दिया.

यह सब है मध्य प्रदेश के मुद्रा योजना का सच. इसी आधार पर केंद्र सरकार की योजना का अनुमान भी लगाया जा सकता है.

(जितेन्द्र राजाराम आजकल मध्य प्रदेश के शहर इंदौर में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं.)

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