क्या सच में आज के राजनितिक चुनौती का हल राहुल गाँधी के इस्तीफे में छिपा है?

0

उमंग कुमार/

जब से लोकसभा चुनाव का परिणाम घोषित हुआ है, लोग कांग्रेस पार्टी को यह सलाह देते फिर रहे हैं कि अब बस एक ही रास्ता बचा है- राहुल गांधी का कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा. ऐसा नहीं होगा तो कांग्रेस ख़त्म हो जायेगी. ऐसा कहने वाले वही रटी-रटाई धारा ले रहे हैं कि जीतने वाला सबकुछ और हारने वाला कुछ भी नहीं. लेकिन लोकतंत्र में ऐसा कुछ नहीं होता.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर इस बार कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल नहीं होते तो क्या लोकसभा का चुनाव परिणाम कुछ और हो सकता था? अगर जवाब हाँ है तो तब तो राहुल गांधी को तत्काल इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. लेकिन अगर जवाब नहीं है तब बड़ा सवाल है कि लोग किस बुनियाद पर राहुल गांधी से इस्तीफे की मांग कर रहे हैं.

इस बात को समझने के लिए अन्य राजनितिक दलों की स्थिति भी देख लें. राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज  पार्टी, समाजवादी पार्टी, तेलगुदेशम पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल या आम आदमी पार्टी. क्या इन सारी पार्टियों ने मोदी-शाह जोड़ी के सामने स्थानीय स्तर पर कोई ऐसा मॉडल दिया है जो भविष्य का कोई रास्ता दिखाता हो? देखने में तो ऐसा नहीं लगता. ऐसे में हार का ठीकरा अकेले राहुल गाँधी पर क्यों?

दुसरे राहुल गांधी ने वर्तमान राजनीति के व्याकरण के अनुसार ऐसा क्या नहीं किया जो उन्हें करना चाहिए था? क्या उन्होंने मीडिया में अपनी मौजूदगी नहीं दिखाई, क्या उन्होंने मीडिया से सवाल जवाब में शामिल होने में कोताही दिखाई, क्या उन्होंने अन्य राजनितिक दलों के साथ गठबंधन नहीं किया, क्या उन्होंने रैलियाँ नहीं की? इस सबके जवाब सर्वविदित हैं. भाजपा के मुकाबले कांग्रेस ने अधिक दलों से गठबंधन किया, मीडिया के सवालों का डटकर जवाब दिया, चुनाव प्रचार में लगे रहे, न्याय जैसी योजना की रुपरेखा खींची जो विश्व के लिए भी नया है. तो ऐसा क्या था जो राहुल गांधी कर सकते थे पर नहीं कर पाए?

यह सपष्ट है कि राहुल ने वर्तमान राजनीति के व्याकरण के अनुसार सब कुछ कर दिया जो उन्हें करना चाहिए था. जो नहीं किया वह यह कि वो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की तरह ‘फूट डालो और राज करो’ की राजनीति नहीं की. दो समुदायों को एक दुसरे के खिलाफ भड़काया नहीं, डराया नहीं, केंद्रीय चुनाव आयोग के आदेश को माना और सुरक्षा बलों के नाम पर राजनीति नहीं की. अगर सब कुछ किया ही तो गड़बड़ी कहाँ हो गई?

इस सवाल पर गौर करें तो आपको सपष्ट हो जाएगा कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने राजनीति का व्याकरण बदल दिया है. पुराने टूल्स से आज की राजनीति नहीं जीती जा सकती. ये दोनों हर चुनाव में पाकिस्तान का डर दिखाते हैं और बाद में हंस के निकल लेते हैं. इनलोगों ने गुजरात विधानसभा चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस पर आरोप लगा दिया कि ये लोग पकिस्तान के साथ मिलकर मोदी को हटाना चाहते हैं. चुनाव जीतने के बाद जब जांच की मांग हुई तो मोदी के एक मंत्री ने संसद में यह कहकर पल्ला झाड लिया कि यह सब चुनाव प्रचार में कह दिया जाता है.

तो देश की राजनीति के नए व्याकरण में मोदी और शाह चुनाव के दौरान हिन्दू-मुस्लिम को लड़ाते हैं. इस देश के बहुसंख्यक को अल्पसंख्यक से डराते हैं और इन सबमें मीडिया इनका साथ देता है. ये लोग देश की अधिकतर मीडिया पर अकूत पैसा खर्च कर उसे पालतू बनाते हैं और जो कुछ लोग फिर भी पत्रकारिता करने की चाह रखते हैं, उन्हें प्रताड़ित करने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं.

इस चुनाव में तो केंद्रीय चुनाव आयोग ने खुलकर मोदी का समर्थन किया. चुनाव आयोग के स्पष्ट आदेश के बावजूद कि कोई दल पाकिस्तान और सेना का इस्तेमाल चुनाव प्रचार के दरम्यान न करे, देश के प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने खुल कर इसकी धज्जियां उड़ाई पर आयोग चुप रहा. बल्कि इन दोनों को क्लीनचीट देने में व्यस्त रहा. चुनाव के आखिरी चरण में जब मोदी खुद वाराणसी से उम्मीदवार थे उन्हें बेरोकटोक धार्मिक तीर्थाटन की इजाजत दी जिसका प्रसारण लागातार टीवी पर होता रहा. नमो टीवी नाम का एक चैनल चुनाव के दरम्यान घर घर उपस्थित हुआ और चुनाव ख़त्म होते ही गायब हो गया.

ऐसे में जब सत्तारूढ़ दल हर अनैतिकता को मीडिया के प्रोपगंडा और चुनाव आयोग के समर्थन से चुनाव जीतने के लिए इस्तेमाल कर रहा था तो राहुल गांधी ऐसा क्या कर सकते थे जो इस चुनाव परिणाम को बदल सकता था. जब इस चुनाव के एग्जिट पोल और मोदी को लोग 350 सीट जीतता दिखा रहे थे तब वेब दुनिया में मशहूर ध्रुव राठी ने लिखा कि अगर सच में भाजपा और एनडीए को इतनी सीट मिलती है तो उन्हें कोई आश्चर्य नहीं होगा.

उनका कहना था कि जिस स्तर पर पांचो साल चैनलों ने इस सरकार के समर्थन में प्रोपगंडा किया है, भाजपा ने जिस स्तर पर इस चुनाव में पैसा खर्च किया और अमित शाह की टीम जिस तरह इस चुनाव प्रचार में अनैतिक हुई है उसको देखकर बहुत सम्भावना है कि यह दल 350 का आंकड़ा छु ही ले. हुआ भी वही.

ऐसे में राहुल गांधी के पास या किसी और नेता के पास क्या तरीका बचा था जिससे चुनाव परिणाम को बदल जा सकता था. शायद कुछ भी नहीं. इसलिए यह कहना तो सारासार बेमानी है कि राहुल गांधी को हार की नैतिक जिम्मेदारी लेकर अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. यह ऐसा ही है जैसे भाजपा को कहा जाए कि वह अपनी शर्तो पर आने वाले चुनाव खुद लड़ ले और जीत जाए.

गांधी परिवार कांग्रेस में हमेशा अपने लाभ को प्राथमिकता देता रहा है. यह कोई नई बात नहीं है. और कोई बराबरी की चाह रखने वाला इस बात का समर्थन नहीं करेगा कि किसी को भी कोई पद या फायदा सिर्फ इसलिए मिल जाए कि वो किसी ख़ास परिवार से आता है. इस बात के मद्देनज़र देश के प्रत्येक राजनितिक दल में वास्तविक लोकतंत्र लाने की मांग होते रहनी चाहिए. इन सबके बावजूद राहुल गांधी को आज पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा नहीं देना चाहिए.

इसकी मुख्य वजह है. आज के समय में गांधी शब्द का महत्व. गांधी हमारे और देश के जीवन का ऐतिहासिक मूल्य है जिसे वर्तमान सत्ता हमसे छीनना चाहती है. भारत में गांधी शब्द का मतलब बहुत कुछ होता है जैसे त्याग, सद्भाव, अहिंसा, प्रेम, सहिष्णुता, भाईचारा और ऐसे ढेरों शब्द जिसकी आज इस देश को सख्त जरुरत है. राहुल गांधी के परिवार के लोग कई बार  इतिहास में इस धारा से विचलित हुए हैं, दूरिया बनाईं हैं और मुंह की खाए हैं. लेकिन आज के सन्दर्भ में गांधी परिवार इन्ही मूल्यों पर खड़ा है. आज के परिदृश्य में जब नाथूराम गोडसे जिंदाबाद के नारे लग रहे हैं और गांधी की परम्परा को मिटाने की कोशिश हो रही है, राहुल गांधी उसी धारा के प्रतीक हैं. संयोगवश उन्होंने आज की राजनीति में यही लाइन भी ली है और बार बार कहा है कि वह मोदी की नफ़रत को प्यार से हराएंगे. ऐसे में इस देश को राहुल गाँधी की पहले से कहीं अधिक जरुरत है.

इसलिए जो लोग राहुल गांधी का इस्तीफ़ा मांग रहे हैं मूलतः वो भाजपा की राजनीति को ही आगे बढ़ा रहे हैं. नरेन्द्र मोदी की हमेशा से यह राजनीति रही है. वह किसी तरीके से राहुल गांधी को अप्रासंगिक बनाए रखना चाहते हैं. पहले मीडिया की मदद से राहुल गांधी को ‘पप्पू’ शब्द से नवाजा गया. अब जब पिछले चुनाव में राहुल गांधी ने साबित कर दिया कि असली पप्पू कौन हैं तो अब यह नई राजनीति आई है कि राहुल को पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. ऐसा कहने वाले लोगों में राहुल कँवल जैसे पत्रकार भी शामिल हैं हैं जो नरेन्द्र मोदी से एक काउंटर प्रश्न तक पूछने की हिम्मत नहीं दिखा पाते. ऐसे लोगों को भी कांग्रेस के भविष्य की चिंता खाए जा रही है. यह हास्यास्पद से कम कुछ भी नहीं है.

अब सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी वर्तमान रूप में मोदी फेनोमेना का जवाब बन सकते हैं. जवाब है- नहीं. बिलकुल नहीं. इस चुनाव में साबित हो गया है कि दिल्ली और लखनऊ के वातानुकूलित माहौल में बैठकर और उम्मीदवारों के नाम पर गुना-गणित करने मात्र से मोदी-शाह का जवाब नहीं दिया जा सकता. सड़क पर उतरना पड़ेगा. आज और अभी. लोगों के मुद्दों को लेकर जेल जाना पड़ेगा.जब अमित शाह अपने कार्यकर्ताओं को समाज बांटने के लिए लाठी खाने को उकसा रहे हैं वैसे समय में समाज को जोड़ने के नाम पर लाठी खाना पड़ेगा. जमीन पर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना पड़ेगा. आम लोगों से संपर्क स्थापित करना होगा. कुछ इस तरह कि लोगों को वाट्सअप्प पर आये मेसेज और दिन-रात टीवी पर चलने वाला प्रोपगंडा की असलियत खुद की आँखों से दिखे.

यह सब करने के लिए फिर 2022 का इंतज़ार नहीं करना होगा. सत्ता में आने के बाद न्याय दिलाने का वादा करने से बेहतर होगा कि राहुल गांधी जैसे नेता आज लोगों के न्याय के लिए संघर्ष करते दिखें. इसके सिवा कोई चारा नहीं है. राहुल गांधी का इस्तीफ़ा भी नहीं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here