सुषमा स्वराज के चुनाव नहीं लड़ने के निर्णय के क्या हैं मायने?

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जितेन्द्र राजाराम/

मध्य प्रदेश में एक भाजपा प्रत्याशी प्रदेश अध्यक्ष से जब फ़ोन पर यह कहता है कि नरेन्द्र मोदी की रैली में कोई आना नहीं चाहता इसलिए प्रधानमंत्री की रैली में भीड़ जुटाने के लिए पच्चीस लाख रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. ऐसा अखबारों में छपा है. जाहिर है पार्टी के लिए यह बुरी खबर है. दूसरे इसी समय में यह भी खबर आती है कि टीवी पर प्रचार कराने में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पहले नंबर पर है. नेटफ्लिक्स और अन्य कंपनियों से भी बहुत आगे है. बल्कि सबसे आगे है. इससे भी यही समझ बनती है कि एक खराब माल को बेचने के संघर्ष में व्यापारी को जो पीड़ा उठानी पड़ती है वही अभी देश में सत्तासीन पार्टी झेल रही है. जनता को दिखाने लिए इस दल के पास कुछ नहीं है इसलिए जो कुछ है उसी को रंगरोगन लगाया जा रहा है. टीवी वालों को भरपूर पैसा दिया जा रहा है कि वे ऐसे प्रोडक्ट को बेचने में मदद करें.

ऐसे समय में जब विधानसभा के चुनाव में आठ-दस दिन बचे हों, पार्टी के 65 के उम्र की कद्दावर नेता सुषमा स्वराज का यह कहना कि वह आने वाला लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी. इसके क्या मायने हैं?

उन्होंने तो खैर यह कहकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की कि इन दिनों उनकी तबियात नासाज़ रहती है और उन्हें डस्ट से समस्या हो रही है. लेकिन अन्य बातों पर गौर करें तो यह इतना सरल मामला नहीं लगता.

जैसे भारत का चुनावी पर्व चल रहा है. पांच राज्यों के इस विधानसभा चुनाव को लोग सेमीफाइनल का दर्जा दे रहे हैं. इस सेमीफाइनल में सुषमा स्वराज का दल संघर्ष करता नज़र आ रहा है. बताने वाले अगर कांग्रेस पार्टी को जीता नहीं रहे तो कांटे की टक्कर का दावा तो कर ही रहे हैं.  ऐसे में उनके दल को और दल के कार्यकर्ताओं को बड़े नेताओं के हौसले की जरुरत है. लेकिन उन्होंने आगे चुनाव नहीं लड़ने की बात कह कर ऐसा माहौल बना दिया कि जूझते समर्थकों के हौसले में थोड़ी कमी ही आई होगी.

ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च कौंसिल का डेटा जिसमें भारतीय जनता पार्टी को सबसे बड़े विज्ञापनदाता के तौर पर दिखाया गया है.

ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि सुषमा स्वराज कोई बचकानी हरकत कर गयीं. यह महिला नेता भाजपा के कुछ चुनिन्दा नेताओं में शुमार है जिसको लोग हाई स्पिरिट में देखते रहे हैं. इनके अच्छे दिनों से इतर, इस नेता के कद्दावर होने का उदाहरण यह भी है कि जब भाजपा के सारे नेता मोदी-शाह जोड़ी के काम करने के तरीके में गायब होते दिखे तब भी यह अपनी प्रासंगिकता बनाएं रहीं. ट्विटर पर ही लोगों की मदद कर के अपने मानवीय चेहरे में और निखार दिखाया. मोदी शासन के पहले सुषमा स्वराज बड़ी नेता मानी जाती रहीं हैं और कभी तो यह तक माना जाता था कि आडवानी के बाद यही प्रधानमंत्री पद की दावेदार होंगी. इसलिए इनके इस कदम को ऐसे ही किसी मैच्योर लेंस से ही देखना होगा.

तो इसके मायने ये हुए कि सुषमा स्वराज का यह कदम भाजपा की अंदरूनी राजनीति की विसात पर चला गया एक कदम है जिसका असर बाद में देखने को मिलेगा. यह भी हो सकता है कि उन्होंने जनता के बीच यह खबर पहुंचाई हो कि देश में जो कुछ हो रहा है उससे वह सहमत नहीं हैं और इसका समर्थन नहीं करती हैं. इस बात को पहुंचाने के लिए उनके पास दूसरा कोई तरीका नहीं था जिससे पार्टी की अंदरूनी राजनीति में भूकंप भी न आये और सन्देश भी पहुँच जाए. वैसे भी मोदी-शाह के वर्तमान ताकत को देखते हुए भूकंप लाने का यह सही समय नहीं है, खासकर इस पार्टी के नेताओं के लिए.

यह भी कि तीन बार विधायक और छः बार सांसद रह चुकी सुषमा स्वराज को लग गया है कि वर्तमान बैनर तले उनका सार्वजनिक जीवन में कमाया हुआ सबकुछ धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा है. इसलिए अब अगर कोई राजनीति होगी तो दूसरे ध्रुव पर लड़ी जायेगी. वापस मोदी सत्ता में आ गए तो यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी वाली लड़ाई और अगर मोदी नहीं आये पर भाजपा आ गयी तो 2014 के पहले की लड़ाई जिसमें स्वराज प्रधानमंत्री पद की दावेदार थीं.

जो कम से कम लगता है वह यह कि सुषमा स्वराज ने वही किया जो 2014 के लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस के बड़े नेता कर रहे थे. डूबती नैया से छलांग लगाना. जैसे पी चिदंबरम, सलमान खुर्शीद इत्यादि ने 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले ही चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा कर दी थी.

मोदी की रैली में लोगों का नहीं आना और विज्ञापन पर भारी खर्चा भी तो इन्हीं सारी बातों की तरफ इशारा कर रहे हैं.

(जितेन्द्र राजाराम आजकल भोपाल में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं. जितेन्द्र इन दिनों भारतीय राजनीति की बारीकियों को समझने के लिए दिल्ली, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक होते हुए मध्य प्रदेश पहुंचे हुए हैं.)

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