श्रीलंका में नकाब पर प्रतिबन्ध से समस्या सुधरेगी या बिगड़ेगी!

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उमंग कुमार

हालिया आतंकी घटनाओं के मद्देनज़र श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रिपाला श्रीसेना ने देश के आपातकालीन नियमों का इस्तेमाल करते हुए मुस्लिम महिलाओं के नकाब पहनने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है. सनद रहे कि ईसाई धर्म के पर्व ईस्टर (संडे) के दिन गिरिजाघरों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में सैकड़ो लोगों की मौत हो गई थी. आईएसआईएस ने इस हमले कि जिम्मेदारी ली है. हमले के बाद श्रीलंका में सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर दी है.

इस फैसले के बाद नकाब पर प्रतिबन्ध लगाने वाले देशों में श्रीलंका यूरोप के बाहर का एकमात्र देश बना है. इस फैसले में कहा गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से चेहरा ढकने पर प्रतिबंध रहेगा. लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि राष्ट्रपति ने बिना विचार-विमर्श के ही ऐसा अतिरेक वाला कदम उठाया है. ऐसा इसलिए कहा जाएगा क्योंकि यह श्रीलंका के संविधान में स्थापित बुनियादी स्वतंत्रता के खिलाफ है. अगर यह भी माना जाए कि आपातकाल स्थानीय सरकार को कुछ स्वतंत्रता को निलंबित करने की शक्ति देता है, फिर भी यह अपने आप में एक कठोर कदम माना जाएगा.

नकाब मध्य पूर्व से आयातित है और श्रीलंका में बहुत कम ही देखने को मिलता है. बहुत कम महिलाएं ही नकाब का इस्तेमाल करती हैं. इस नए फैसले के बाद अब यह भी खतरा है कि धीरे धीरे अन्य सामान्य परिधानों जैसे हिजाब और बुर्का को भी इसमें शामिल करने की मांग उठेगी. वहाँ बौद्ध चरमपंथी पहले से ही ऐसी मांग करते रहे हैं. हो सकता है कि धीरे धीरे अन्य परिधान पर भी प्रतिबन्ध लगाने की मांग उठने लगे, जैसे पुरुषों का टोपी पहना. इन सब परिधानों के धार्मिक जुड़ाव के मद्देनज़र विरोध होना कोई बड़ी बात नहीं लगती.

गौरतलब है कि राष्ट्रपति द्वारा नकाब पर प्रतिबन्ध की घोषणा के पहले ही वहाँ के मुस्लिम सिविल सोसाइटी संगठनों और मौलवियों ने अपील की थी कि वे पूरी तरह चेहरा ढकने वाले परिधान पहनना बंद करें या सार्वजनिक जगहों पर इसे पहनने से बचें.

यह स्पष्ट नहीं है कि इस अपील के निहितार्थ पुरुष वर्चास्व वाले समाज को मालूम था भी कि नहीं या यह भी कि आगे इसका क्या असर हो सकता है, उनलोगों सोचा भी है कि नहीं. लेकिन यह जरुर स्पष्ट है कि मुस्लिम समुदाय जो वहाँ के स्थानीय समुदाय से तमिलों से अधिक घुला मिला है वह हमले के बाद से डरा हुआ है.

यह साबित नहीं किया जा सकता कि श्रीलंका में वर्तमान में जो समस्या पैदा हुई है उसमें महिलाओं के परिधान की कोई भूमिका है. लेकिन नकाब पर प्रतिबंध लगाने से सरकार लोगों को ऐसा एहसास करा रही है कि कार्रवाई की जा रही है. लेकिन यह तो स्पष्ट है कि आईएसआईएस के कट्टरपंथ की चुनौती से निपटने  का यह तो तरीका नहीं हो सकता. 2015 से श्रीलंका सरकार इस बात से अवगत है कि उसके कुछ युवा नागरिक आईएसआईएस के प्रति आकर्षित हो रहे हैं और ‘धर्मयुद्ध’ के नाम सीरिया भी जा रहे हैं. सही समय पर सही कदम उठाने के एवज में सरकार के इस कदम से धर्मों के बीच मतभेद ही बढेगा.

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