इस लुटेपिटे दौर में मोदी को उद्योगपतियों के साथ खड़े होने की ताकत कहाँ से मिलती है?

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जितेन्द्र राजाराम/

जब देश आर्थिक लुटेरों से घिर गया हो. सरकारी बैंक कुछ कर्ज लेकर भागे और कुछ यहीं जम कर खड़े उद्योगपतियों से निपटने में बेचारे साबित हो रहे हों. तब जब सरकारी तेल कंपनी ओएनजीसी रिलायंस से करीब 155 करोड़ डॉलर या कहें 10620 करोड़ रूपया का केस हार जाती हो. उसी समय दसलखा सूट पहनने वाला भारत का प्रधानमंत्री यह बयान देता है कि उसे उद्योगपतियों के साथ खड़े होने में शर्म नहीं आती. आखिर इसका क्या मतलब है?

इसको समझने के लिए यह समझिये कि भावनाओं का बाजार सबसे तरल होता है. देश के प्रधानमंत्री को यह बात बखूबी समझ में आती है. आंसू ख़ुशी के हों या ग़म के टपकने से पहले बाजार में बिकने लगते हैं. इन आसुंओ के खरीदार बहुतेरे रहे हैं.

इन्टरनेट, सिनेमा से लेकर टीवी में दिखाई जाने वाली हर असली और बनावटी कहानियों में भावनाएं सबसे खरी कीमत में बिकती हैं. खेती, कर्ज और शहरी पलायन के दौर में मदर इंडिया और आखरी रास्ता जैसी सिनेमा ने आपकी जेब हलकी की थी, बेरोजगारी के जमाने में मजदूर और बाजारवाद के ज़माने में कॉर्पोरेट जैसी फिल्मों ने मौके का फायदा उठाया था.

हमारे देश के प्रधानमंत्री को मालूम है कि हर दौर में भावनाओं को बेचा गया है. तो वह अपनी सारी बातों को इसी भावना की चासनी में डुबोकर बेच रहे हैं. अब तक के किये गए गलत बयानी और मजहबी राजनीति से यह भी स्पष्ट हो गया है कि प्रधानमंत्री को नैतिकता और सही-गलत जैसी चीजों से बहुत कुछ लेना देना नहीं है. उनके लिए बस उद्देश्य तय है और उसे साकार करना है. इसके लिए बस समस्या है तो वह है चुनावी लोकतंत्र में रह रही जनता. मोदी को मालूम है कि इन लोगों को येन केन प्रकारेण तैयार करना है. मतलब जहर को शहद में मिलाकर बेचना है ऐसे कि वह शहद लगे.

प्रधानमंत्री के अब तक के किये गए गलत बयानी और मजहबी राजनीति से यह भी स्पष्ट हो गया है कि प्रधानमंत्री को नैतिकता और सही-गलत जैसी चीजों से बहुत कुछ लेना देना नहीं है

लेकिन इसके अपने खतरे हैं. जो लोग ये झूठा शहद खरीद रहे हैं. खासकर उनके लिए. कल्पना कीजिये कि कल को हीरे की मांग बढ़ जाती है और इस मांग को पूरा करने के लिए नकली हीरा बाज़ार में आ जाता है. उसके बाद अगर कभी ऐसा हो कि नकली हीरों के ग्राहक कम होने लग जाएँ तो ये बाजार गुस्से से बिलबिला उठेगा और अपने ही ग्राहकों को सबक सिखाने की ठान लेगा.

मोदी की राजनीति में यह आपको खूब दिखेगा. जो लोग इस जहर को शहद की जगह उसके सही नाम से पुकार रहे हैं उनको देशद्रोही इत्यादि बताकार सजा दिया जा रहा है.

आज के पूरे राजनितिक परिदृश्य को देखेंगे तो यह स्पष्ट होगा कि कितने बड़े स्तर पर इस व्यवसाय को  प्लान किया गया है. जहर को बेचना है. इसे बेचने के लिए इसे कुछ और बताना है. अगर लोग सवाल करें तो उनसे कैसे निपटना है. इसके बाद सामान्य लोगों के बीच उभर रहे स्वाभाविक गुस्से को कैसे रोकना है. पहले तीन कड़ी को समझने के बाद सबसे अहम् कड़ी समझने को रह जाती है. वहा है लोगों के बीच पनपता गुस्सा.

बेरोजगारी, असुरक्षा इत्यादि की वजह से लोगों में गुस्सा मौजूद है. ऐसे में उसे गुस्से का प्रबंधन प्लान किया जाता है. इन व्यवसायियों की लागातार एक चिंता होती है हाउ तो एलोकेट एंगर? हिंदी सिनेमा इस नितांत भूख को ओर्गासम प्रदान करता है. आजकल, दक्षिण सिनेमा की हिंदी डबिंग का इतना प्रचलन भी इसी लिए हुआ है. किसी बनाये गए विलेन के खिलाफ हीरो के द्वारा की गयीं सिसिलेवार हत्याएं सभ्य समाज का एंगर मैनेजमेंट है.

तो इस मोदी-बाज़ार में राष्ट्रवाद, गौ रक्षा, पकिस्तान (सर्जिकल स्ट्राइक) इत्यादि भी एंगर मैनेजमेंट के बाजार में एंटी-डोट की तरह बिक रहा है या बेचा जा रहा है.

और इसी एंटी-डोट के बूते देश के प्रधानमंत्री को इतना भरोसा होता है कि वह कुछ भी कहेगा और करेगा वो चाहें लुटेरे उद्योगपतियों के साथ खड़ा होना ही क्यों न हो. जनता उससे प्रभावित नहीं होगी क्योंकि उसने उन्हें एक ख़ास तरह की घुट्टी पिला रखी है. देखना यह है कि क्या सच में जनता ने वह घुट्टी पी रखी है या यह मोदी का भ्रम मात्र है.

(जितेन्द्र राजाराम  आजकल भोपाल में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं. आप उनसे उनके नम्बर 9009036633 पर संपर्क कर सकते हैं.)

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