अनिल अंबानी: एक राजकुमार था!

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

आपकी लिमोज़ीन में आपके साथ हर कोई सवारी करना चाहता है परंतु लिमोज़ीन न रहे तो कितने लोग आपके साथ बस की सवारी करना पसंद करेंगे? ओफ्रा विनफ्रे ने यह बात किसी और संदर्भ में की थी परंतु चर्चित अंबानी परिवार के कनिष्ठ अनिल अंबानी वर्तमान में  लगभग इन्ही परिस्तिथियों से गुजर रहे है।

अनिल अंबानी भारत के उन उधमियों में शामिल है जिन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत धमाके से की थी। एक समय उनकी सम्पति बड़े भाई मुकेश के बराबर थी  परंतु महज ग्यारह वर्षों में उन्होंने अपनी नब्बे फीसदी दौलत गँवा दी है। कॉर्पोरेट दुनिया को नजदीक से जानने वाले विश्लेषक बताते है कि जुलाई से सितंबर की हालिया तिमाही में उनका घाटा उस शिखर पर पहुँच गया है जिसने कीर्तिमान रच दिया है।  भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास के पिछले सौ वर्षों  में इतना नुकसान सहन करने वाले वे दूसरे व्यक्ति बन गए है।

अनिल अंबानी ग्रुप की कंपनियों का संयुक्त घाटा एक लाख सत्तर हजार  करोड़ रूपये पर पहुँच चुका है! यह स्थिति उनके शुरूआती दौर से ठीक उलट है जब 2008 में उन्हें फोर्ब्स पत्रिका ने दुनिया का छठा सबसे अमीर व्यक्ति घोषित किया था! उनके लिए काम कर चुके एक अमेरिकन बैंक के निदेशक ने पिछले दिनों इस बात के लिए अफ़सोस जताया था कि बदली परिस्तिथियों में वे लोग भी उनका साथ छोड़ रहे है जिन्हे उन्होंने जमीन से उठाकर आसमान पर बैठाया था। शेयर बाजार में उनकी कंपनियों का पूंजीकरण सर्वकालिक निम्न स्तर पर आ चुका है।

कुछ आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी जमा पूंजी उनके बड़े भाई के निवास ‘अंटालिया’ की कीमत से भी कम रह गई है।

स्टीवन स्पीलबर्ग के साथ अनिल अम्बानी

हिंदी फिल्म जगत में ऐसे बहुतेरे निर्माता रहे है जिन्होंने दर्जनों फिल्मो की घोषणा की परंतु चुनिंदा फिल्मे ही बना पाये। उनकी इस हवाबाजी का परिणाम यह रहा कि वे हमेशा ख़बरों में बने रहे और खुद को महत्वपूर्ण बताते रहे। ‘मासूम’ और  ‘बेंडिट क्वीन’ के निर्देशक शेखर कपूर कुछ इसी तरह के निर्देशक थे। शेखर कपूर ने जितनी फिल्मे बनाई उससे दस गुना फिल्मों की घोषणा कर नहीं बनाई! अनिल अंबानी भी कुछ इसी तरह काम कर रहे थे।  वे रोज एक नयी कंपनी खरीद रहे थे। एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें खुद अपनी कंपनियों के नाम याद रखने में परेशानी होने लगी। मनोरंजन जगत के जितने भी प्लेटफॉर्म के नाम  आपके जेहन में आते है,  उनकी प्रमुख कंपनी के मालिक अनिल अंबानी ही थे।

एक समय था जब फिल्मों को फाइनेंस करने वाले चुनिंदा लोग ही मायानगरी में उपलब्ध थे।  ये गुजराती, मारवाड़ी परिवार के लोग हुआ करते थे जो पीढ़ियों से इस व्यवसाय में साख बनाये हुए थे। 2005 में अनिल अंबानी के दृश्य में आने के बाद फिल्मों को फाइनेंस करने का काम कॉर्पोरेट घरानो के पास चला गया। अनिल की कंपनी ‘रिलाइंस एंटरटेनमेंट’ ने निर्माताओं को दोनों हाथों से धन उपलब्ध कराना आरंभ किया। 2005 से 2019 तक रिलायंस एंटरटेनमेंट पंजाबी, हिंदी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम की 128 फिल्मों को फाइनेंस कर चुका है।

छोटे अंबानी ने फाइनेंस व्यवसाय को ग्लैमरस बना दिया था।  उनके देखा देखी भारत के अन्य नामचीन घराने भी इसी राह  पर चलने लगे।  यही नहीं अनिल ने हॉलीवुड के प्रसिद्ध निर्माता निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग की कंपनी  ‘ड्रीमवर्क्स पिक्चर’ के साथ सह उपक्रम बनाकर पच्चीस से अधिक हॉलीवुड फिल्मों में भी निवेश किया। रिलाइंस  और ड्रीमवर्क्स के संयुक्त उपक्रम में बनी ‘लिंकन’ (2012)  ऑस्कर से सम्मानित हुई।

आम उद्योगपतियों के विपरीत अनिल अंबानी ने खुद को  कॉर्पोरेट दुनिया का  एक विनम्र, सरल  और सोशल व्यक्ति के चेहरे के  रूप में प्रस्तुत किया है। बहुत कम लोग इस बात को नकारेंगे कि ‘मृत्युदाता’ के महाफ्लॉप हो जाने और  कैरियर की उलटी गिनती शुरू हो जाने के दिनों में जब सारी दुनिया बिग बी से  किनारा कर चुकी थी तब समाजवादी अमर सिंह और अनिल अंबानी ने उन्हें मनोवैज्ञानिक संबल दिया था। अपने बड़े भाई से ठीक उलट अनिल प्रदर्शनप्रिय स्वभाव के रहे है। चर्चित तारिका टीना मुनीम से पारिवारिक विरोध के बावजूद उनका विवाह उनके इसी चारित्रिक गुण को दर्शाता है।

अनिल कहाँ चूक गए, कैसे अर्श से फर्श पर आ गए जैसी बातों पर हमेशा चर्चा होती रहेगी। हो सकता है आने वाले समय में  शायद उन पर किताबे भी लिखी जाए या उनके जीवन को केंद्र में रखकर कोई फिल्म भी बनाई जाए! अनिल अंबानी के व्यक्तित्व और दुस्साहस से प्रभावित कई लोगों को इस बात का अफ़सोस रहेगा कि अपने स्वास्थ के प्रति सजग और मेराथन दौड़ में हिस्सा लेने वाले इस उद्योगपति ने अपने बिजनेस के लिए वैसी सजगता क्यों नहीं दिखाई!

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(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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