यार तूने ये क्या किया!

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रजनीश जे जैन/
रजनीश जे जैन

यह लेख जब आप पढ़ रहे हैं तब देश, चुनाव की मेराथन प्रक्रिया से मुक्त हो परिणामों के आंकलन में जुट गया है। शब्दों का कोलाहल थम गया है। ऊँट की करवट को लेकर बहसों का तार्किक-अतार्किक विश्लेषण आरम्भ हो चुका है। संसद की तरफ जाने वाले सभी रास्तों पर नेताओं के बयानों की धूल बिखरी हुई है , आरोपों का कीचड़ सना हुआ है। शब्दों के दाग धब्बे यहाँ वहाँ हवा में उड़ते नजर आ रहे हैं। ये चुनाव कई बातों के लिए याद किये जाएंगे परन्तु उसमे सबसे शीर्ष पर होगा ‘ सार्वजनिक संवाद का निम्नतम स्तर पर चले जाना । बद्जुबानी और व्यक्तिगत आक्षेप जितने इस बार हुए शायद ही पहले कभी हुए हों। ऐसे ही एक एक आक्षेप ने जाने-अनजाने महानायक अमिताभ बच्चन के चरित्र पर भी सवालिया निशान लगा दिया।

अपने शिखर दिनों में अमिताभ की अधिकांश बहुसितारा फिल्मों की कहानी दो भाइयों या दो खास मित्रों के इर्द गिर्द घूमती नजर आती थीं। ‘ शोले ‘ में उनके निभाए किरदार ने दो अच्छे दोस्तों के लिए ‘ जय-वीरू ‘ का विशेषण गढ़ दिया जो आज चालीस बरस बाद भी सहजता से उपयोग होते देखा जा सकता है। अमिताभ इस लिहाज से खुशकिस्मत रहे कि न केवल परदे पर बल्कि वास्तविक जीवन में भी उनके मित्रों की संख्या खासी रही है। संघर्ष के दिनों में कॉमेडियन महमूद ने उन्हें फुटपाथ से उठाकर अपने घर में आसरा दिया और उनके छोटे भाई अनवर अली उनके घनिष्ट  मित्र  बने। इतना काफी नहीं था, महमूद ने उनके लिए सिफारिश भी की और उन्हें नायक बनाकर ‘बॉम्बे टू गोवा’ भी बनाई। बिग बी के जीवन में एक समय ऐसा भी आया जब वे शिखर पर थे तब  उनसे कुछ व्यावसायिक गलतियां भी हुई ( विश्व सुंदरी प्रतियोगिता का भारत में आयोजन ) जिसके चलते वे भारी  कर्ज में डूबे नतीजन उनके बहुचर्चित निवास ‘प्रतीक्षा’ के बिकने की नौबत आ गई। ऐसे में उन्हें समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह का सहारा मिला। इसी दौरान वे सहारा के निदेशक मंडल में शामिल हो सुब्रतो रॉय और अम्बानी बंधुओ के भी निजी मित्र बने। यद्यपि उनकी काबलियत और प्रतिभा की वजह से फिल्मों और टेलीविज़न पर उनकी  सफल वापसी हुई परन्तु मुश्किल समय में उनके मित्रों का उनके साथ खड़ा होना भी उल्लेखनीय है।

जैसे-जैसे अमिताभ नई ऊंचाइयां छूते गए अपने मित्रों से दूर होते गए। सबसे पहले उन्होंने महमूद से दूरियां बनाईं। यहाँ तक कि महमूद की बीमारी में वे उन्हें देखने भी नहीं गए। अपने अंतिम समय तक मेहमूद उनका बेसब्री से इंतजार करते रहे। जैसे ही दुबारा उनके पाँव फिल्मों में जमे उन्होंने अमर सिंह को दरकिनार करना आरम्भ कर दिया। कभी खुद को अमिताभ का छोटा भाई कहने वाले अमर सिंह आज उनके बारे में  क्या सोचते हैं जानने के लिए सोशल मीडिया पर दर्जनों वीडिओ मौजूद हैं। चरित्र अभिनेता और अमिताभ बच्चन की बहुत सी फिल्मों के डायलॉग राइटर, कादर खान भी उनकी उपेक्षा के शिकार हुए। अपनी मृत्यु से पूर्व दिए एक इंटरव्यू में अमिताभ की बेरुखी को लेकर छलके उनके दर्द से अधिकांश दर्शक परिचित हैं।

पिछले दिनों प्रधान सेवक मोदी द्वारा स्व राजीव गांधी पर अशालीन  टिपण्णी के बाद उम्मीद थी कि अमिताभ अपने अच्छे दोस्त के साथ खड़े नजर आएंगे परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया

पहली बार वोट देने वाले युवाओं को शायद इस बात की जानकारी नहीं होगी कि किसी समय में बच्चन परिवार एवं नेहरू -गाँधी परिवार अभिन्न मित्र रहा है। अमिताभ के माता पिता डॉ हरिवंश राय बच्चन और श्रीमती तेजी बच्चन नेहरू जी और इंदिरा गांधी के पारिवारिक मित्र रहे। इसी वजह से राजीव गांधी और संजय गांधी अमिताभ के बाल सखा बने। यह रिश्ता इतना प्रगाढ़ हुआ कि जब पहली बार सोनिया गांधी बहु बन भारत आईं तो उन्हें डॉ हरिवंश राय बच्चन  के घर पर रखा गया ताकि उन्हें भाषा, भारतीय  संस्कृति और रीति रिवाजों से परिचय कराया जा सके। बच्चन और गांधी की यह मित्रता राजीव गाँधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तक चली परंतु बोफोर्स घोटाले की वजह से इसमें दरार आई। यद्यपि पहले स्वयं अमिताभ और बाद में श्री राजीव गाँधी कोर्ट द्वारा इन आरोपों से मुक्त हुए।

सोशल मीडिया के आरम्भ से ही अमिताभ इस माध्यम का बखूबी इस्तेमाल करते रहे है। सामजिक सरोकार की किसी भी घटना या विचार पर उनकी टिपण्णी ट्विटर से करोडो लोगों तक पहुँचती रही है।  पिछले दिनों प्रधान सेवक मोदी द्वारा स्व राजीव गांधी पर अशालीन  टिपण्णी के बाद उम्मीद थी कि अमिताभ अपने अच्छे दोस्त के साथ खड़े नजर आएंगे परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया।

दलगत राजनीति से ऊपर उनके करोड़ों प्रशंसकों को उनकी यह चुप्पी निराश कर गई। इस समय वे इस स्थिति में है जहाँ उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। असहिष्णुता और चापलूसी के दौर में वे अपनी जायज़ प्रतिक्रिया  रखकर अपना कद और ऊंचा कर सकते थे। अफ़सोस उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि वे सिर्फ अच्छे दिनों के ही साथी है। रामधारी सिंह दिनकर ने शायद  इस तरह की मनोदशा को ही ध्यान रखकर कभी लिखा था:

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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