हर्षवर्धन के हिसाब से वायु प्रदुषण की समस्या विकराल नहीं है

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उमंग कुमार/

इस लोकसभा चुनाव में लोग, खासकर दिल्ली वासी थोड़ी राहत महसूस कर रहे थे कि सभी राजनितिक दलों ने अपने मैनिफेस्टो में वायु प्रदूषण को एक गंभीर मुद्दा माना है. तभी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री हर्षवर्धन ने हालिया वैश्विक रिपोर्ट को खारिज कर अपने सरकार की नियत का बखान कर दिया. इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि लाखों लोग वायु प्रदुषण की वजह से जान गंवाते हैं. हर्षवर्धन ने कह दिया कि ऐसी रिपोर्ट सिर्फ लोगों को डराने के लिए आती हैं. संयोंग से वह केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री भी हैं और चाहते तो तार्किक तौर पर अपनी बात कर सकते थे जो उनके पद को भी शोभा देता.

एक समाचार एजेंसी को साक्षात्कार देते हुए हर्षवर्धन ने कहा कि यह सब रिपोर्ट सही नहीं है. अमेरिका स्थित स्वास्थ्य प्रभाव संस्थान की रिपोर्ट में कहा गया है कि वायु प्रदूषण के कारण 2017 में भारत में लगभग 12 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी.

इस तरह की रिपोर्टों को खारिज करने के बजाय मंत्री को चाहिए था कि वे बताएं कि किस आधार पर इन रिपोर्ट को खारिज कर रहे हैं. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.

अमेरिका स्थित स्वास्थ्य प्रभाव संस्थान की रिपोर्ट में कहा गया है कि वायु प्रदूषण के कारण 2017 में भारत में लगभग 12 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी

ऐसा पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है जब सरकार वायु प्रदुषण के मुद्दे को सुलझाने के बजाय इस विकराल समस्या को दिखाने वाली रिपोर्ट को ही खारिज करना चाह रही है.

साल 2017 में हर्षवर्धन ने ही कहा था कि किसी भी डेथ सर्टिफिकेट में वायु प्रदुषण को मौत का कारण नहीं बताया जाता. इस साल 4 जनवरी को उनके मंत्रालय ने संसद में एक प्रश्न के जवाब में बताया कि ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है जो वायु प्रदुषण और मृत्यु के बीच सीधा सम्बन्ध स्थापित करे.

हर्षवर्धन जो पिछले पांच सालों में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों की कमान संभालकर अब लोगों के बीच पहुंचे हैं और उनसे वोट मांगते फिर रहे हैं, उनका चुनाव क्षेत्र चांदनी चौक है और राजधानी के वायु प्रदुषण से प्रभावित क्षत्रों में शुमार है.

अब लोगों का सामना करते हुए यह अपनी गैर-जिम्मेदाराना रवैये को छिपाने के लिए आंकड़े पर ही सवाल खड़ा कर रहे हैं. संयोग से ये महानुभाव केंद्रीय स्वास्थय मंत्री भी रहे हैं.

जिस रिपोर्ट को हर्षवर्धन खारिज कर रहे हैं वह एक आधार है और अगर अमेरिका में सही है तो दुनिया के अन्य देशों में भी होगा. भारत में भी होगा. अधिक से अधिक यह होगा कि मरने वाले की संख्या में कमी या बढ़ोत्तरी हो सकती है.

फिजूल के बयानबाजी की जगह सरकार को चाहिए कि अपना रिसर्च करवा ले. अगर सरकार खुद ऐसा कोई सर्वेक्षण करवाती है तो बहुत सम्भावना है कि मरने वाले की संख्या बढ़ेगी ही. इसकी वजह है भारत की कुछ अन्य समस्याएं. जैसे कुपोषण. भारत में कुपोषण अधिक है और कुपोषित लोगों पर वायु प्रदूषण का प्रभाव अधिक पड़ेगा.

गलत बयानबाजी करने और अध्ययन को खारिज करने से बेहतर होता कि सरकार निश्चित समय सीमा में कोई समाधान लेकर आती और उसको लागू करती. इससे कई लोगों का जीवन बच जाता.

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