2014 से 2019 में बदली नज़र आ रही तस्वीर: विज्ञापन कमजोर हुए या लोग समझदार!

0

जितेन्द्र राजाराम/

मेरठ से चुनावी अभियान की शुरुआत करते हुए भारतीय जनता पार्टी के नेता और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि देश उनको चुनने का मन पहले ही बना चुका है. तमाम टीवी चैनल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स, अखबारों और अब शहरों में लगे बैनर से यही बताने की कोशिश की जा रही है कि मोदी वापस आ रहे हैं. लेकिन विज्ञापन का भी एक मनोविज्ञान होता है.

जब तक आप कोई चीज़ ख़रीद कर उपयोग नहीं करते तब तक उसका विज्ञापन आपको बहुत प्रभावित करता है. लेकिन जैसे ही ग्राहक उस प्रोडक्ट को खरीद कर इस्तेमाल करने लगता है वैसे ही विज्ञापन में बताई ख़ूबी और हक़ीक़त में तुलना शुरू हो जाती है. 2019 और 2014 के बीच राजनीति में विज्ञापनों के अत्यधिक प्रयोग को भी कुछ इस तरह ही परखा जाना चाहिए.

मोदी के ‘अच्छे दिन’ के विज्ञापन का असर भी 2014 से 2017 तक चलता रहा. देश के लोगों पर इसका जादू कायम रहा. यहीं से मोदी ने कुछ बड़े फैसले लेने शुरू किये. अव्वल तो नोटबंदी. इसके कुछेक महीनों बाद उत्तर प्रदेश में चुनाव हुए और जनता को मोदी के नाम पर योगी थमा दिया गया. जीएसटी भी लागू हुआ.

यही समय था जब विज्ञापन में मोदी के वादे को परखने का मौका मिला. इस फ़र्क़ की सबसे पहले पहचान भी गुजरात से ही शुरू हुई. भाजपा को सरकार बनाने में वहाँ पसीने छूट गए. उसके बाद हुए पाँच राज्यों के चुनावों में साबित हो गया कि “मात्र विज्ञापन से वोट पाना” पूरी रणनीति का हिस्सा नहीं हो सकता.

एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी की सीनियर एचआर मैनेजर ने कहा “मोदी के आने से युवा राजनीति में रुचि लेने लगे हैं, नहीं तो कोई राजनीति जानता भी नहीं था.” इससे स्पष्ट होता है कि युवा जिनके पास अनुभव की कमी है वो मोदी के विज्ञापन पर भरोसा कर रहे हैं.

वहीँ दूसरी तरफ, हाल ही में प्रयागराज में कुम्भ के दौरान एक ग्रामीण बुज़ुर्ग ने ग़ुस्से में कहा, “ये मोदी जब से आया है जीना दूभर हो गया है, हर चीज़ में बस वाह-वाही लूट रहा है और हमारे करम फूट रहे हैं.” वह बुजुर्ग मुझसे मुखातिब थे. उनकी बातचीत से लगा कि वे मोदी के द्वारा दिखाए जा रहे विज्ञापन की असलियत समझ गए हैं.

अब विज्ञापन से कोई नया वोटर नहीं बन रहा है. बल्कि मौजूदा वोटरों में ही सारा प्रभाव बनाने का प्रयास है. निशाने पर वो लोग हैं जो हर विज्ञापन के बाद अपना विश्वास और गहरा करते जा रहे हैं

इन दोनों वाक्यों से ही राजनीति में विज्ञापन की सफलता और विफलता का आंकलन किया जा सकता है. यह सिर्फ मेरा अनुभव नहीं है. तमाम रिपोर्ट आ रही हैं कि युवा अभी भी मोदीमय है पर प्रौढ़ और बुजुर्ग अब मोदी के वादे से प्रभावित नहीं है.

वास्तविकता यह है कि अब विज्ञापन से कोई नया वोटर नहीं बन रहा है. बल्कि मौजूदा वोटरों में ही सारा प्रभाव बनाने का प्रयास है. निशाने पर वो लोग हैं जो हर विज्ञापन के बाद अपना विश्वास और गहरा करते जा रहे हैं. दूसरी तरफ वो लोग हैं जो विज्ञापन और हक़ीक़त के बीच फ़ासले को समझकर सवाल कर रहे हैं. विज्ञापन की बढ़ती संख्या उन्हें वर्तमान सरकार से और दूर खिंचेगी.

इस समय शाइनिंग इंडिया का जिक्र भी मानीखेज होगा. अटल बिहारी वाजपेयी के समय में इन्हीं विज्ञापनों के माध्यम से कहा जा रहा था कि देश बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है. लेकिन लोगों ने नहीं माना और वही हुआ जिसका अंदाजा किसी को नहीं था. अजेय लगते वाजपेयी चुनाव हार गए.

इसी से सबक लेते हुए नरेन्द्र मोदी अपने सरकार की किसी ऐसी उपलब्धि पर बात ही नहीं कर रहे हैं जिसे आम जनता तुरंत अपने अनुभवों से मेल कर फैसला सुना सकती है. उदाहरण के लिए, मोदी सरकार की चर्चित उज्ज्वला योजना की बात कर लें. विज्ञापन बताते हैं कि छः करोड़ महिलाओं के जीवन में इस योजना की वजह से आमूल-चूल परिवर्तन आया है. इसकी सच्चाई जानने के लिए हमने कुछ महिलाओं से बात की तो कुछ और ही निकल कर आया.

उतरप्रदेश के फ़तेहपुर ज़िला में शंकर का पूर्वा गाँव में एक महिला चूल्हा फूँकते हुए गाली देती हैं, “होरी खेली की धुआँ म स्वाहा होई जायी,  मोदी के चक्कर में गैस चूल्हा पाएँ न रहे अब सेलिंडेर भरे का ख़र्चा दहिज़ार कहाँ से लायी!” यह  पूछे जाने पर की सिलिंडर तो कम्पनी घर तक पहुँचाने आती है,  महिला ग़ुस्से में घूरते हुए कहती हैं, “जाऊँ वोट माँगे आवत रहें सब सेलिंडेर उसके घर म पड़े हैं, अब जिसके पास रुपया हॉ व जा के ख़ुशामद करे और ले आवे सेलिंडेर!” उसकी आँखे धुएँ से लाल थी या ग़ुस्से से पता नहीं.

इन सच्चाईयों से अवगत मोदी के पास दूसरा कोई तरीका भी नहीं है. विज्ञापन तो करना ही है. इसलिए उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दे चुने हैं जिसकी आम जनता जांच पड़ताल नहीं कर सकती.

फिर गाँव में घूमने से एक बात का एहसास तो होता है कि 2014 के चुनाव और 2019 के चुनावी माहौल में बड़ा परिवर्तन हैं. पांच साल पहले हुए चुनाव में गाँवों में हर घर में झंडे और पोस्टर दिखाई देते थे. 2019 के चुनाव में तो जनता इस बात से भी बेख़बर है कि चुनाव की तारीख़ घोषित हो गई है. उन दिनों रेल यात्रा और बस यात्रा में सभी मोदी के पक्ष में बोलते  मिलते थे. अभी भी कुछ लोग मिल जा रहे हैं पर बहुमत ने चुप्पी साध रखी है.

ज़ाहिर है जनता 2019 में विज्ञापन वाली राजनीति को तरजीह नहीं दे रही है. अख़बारों और बिलबोर्ड्स पर छपे विज्ञापनों से प्रभावित होकर मध्यमवर्गी कर्मचारी, छात्र और शहरी लोग भले ही सरकारी दावे पर भरोसा कर लें पर गाँवों में स्थिति बिलकुल विपरीत है.

(जितेन्द्र राजाराम आजकल मध्य प्रदेश के शहर इंदौर में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं.)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here