द पॉलिएस्टर प्रिंस: एक किताब जिसे कम ही लोग पढ़ पाए!

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रजनीश जे जैन/

किसी भी किताब को पढ़कर ख़त्म कर देने के बाद आपके मन में जो सबसे पहला ख्याल आता है कि काश यह लेखक आपका दोस्त होता तो आप उसे तुरंत फोन कर के बधाई दे पाते! आप कह पाते कि इस किताब में दिए गए तथ्य आँख खोलने और चौंकाने वाले हैं। साथ में यह भी कि ये सारी जानकारियाँ बगैर इस किताब के कही और मिलना लगभग नामुमकिन हैं। ‘द पॉलिएस्टर प्रिंस’  पढ़ने के बाद में ऐसे ही विचारो में डूब उतर रहा हूँ। लेकिन यह संभव नहीं है क्योंकि इस पुस्तक के लेखक हेमिश मैक्डोनाल्ड तक मेरी पहुँच नहीं है। इस किताब को रंक से राजा बने उद्योगपति धीरूभाई अंबानी की अनाधिकृत जीवनी कही जा सकती है। आज इस उद्योगपति के पुत्र मुकेश अंबानी दुनिया के गिने-चुने धनाढ में शुमार हैं।

जूनागढ़ के चोरवाड़ में जन्मे धीरूभाई का सफर एडेन की कंपनी में एक क्लर्क की हैसियत से शुरू हुआ था। महज सोलह बरस की उम्र में उन्हें समझ आ गया था कि यमन की सिक्कों के रूप में ढली मुद्रा में चांदी का प्रतिशत उसके मूल्य से कही ज्यादा है! अपने व्यावसायिक उपक्रम की शुरुआत उन्होंने इन सिक्कों को गलाकर मोटा मुनाफा बनाने से की। यह एक ऐसा दुस्साहस था जिसके बारे में उन से पहले किसी और ने नहीं सोचा था!

रजनीश जे जैन/

हेरिश मैक्डोनाल्ड ने आस्ट्रेलियन अखबार ‘सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड’ के संवाददाता के रूप भारत और एशिया के कई देशों में काम किया है। अखबार के दिल्ली दफ्तर की वजह से कई सारे तथ्य उन्हें सहज उपलब्ध हुए जो इस किताब का आधार बने। फिल्मों की प्रचलित ‘ फ़्लैश बैक’ तकनीक शैली में लिखे इस पुस्तक में लेखक पाठक को रोलर कोस्टर की राइड का अनुभव करा देते है।

सत्तर के दशक के बाद रिलायंस और अंबानी शब्द भारतीय जनमानस से परिचित होने लगे थे। यही वह दौर था जब स्टॉक मार्केट के बारे में कुछ लोग जानने लगे थे। निसंदेह स्टॉक मार्केट के महत्व को आम लोगों तक पहुँचाने में अंबानी का बड़ा योगदान था। लेकिन यह अँधेरे की सतह पर चमक थी जो लोगों की नजर में आई,  अँधेरा आम लोगों की जानकारी से बहुत दूर था।

हेमिश यह जानते हुए कि धीरूभाई समय के साथ एक ‘ कल्ट फिगर ‘ बनते जा रहे थे, अपनी बात को  तथ्यों के साथ प्रस्तुत करते हैं। केंद्र की सरकार में उनसे सहानुभूति रखने वाले लोग हरेक काल में मौजूद रहे है। हर छोटा बड़ा अखबार उनकी कंपनी के विज्ञापन की आस में ‘रिलायंस’ के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं लिख पाता था वह भी तब जबकि विवाद और अंबानी का गहरा नाता था।

चार सौ पृष्ठों की किताब में हेमिश ने इस परिवार से जुड़े लगभग हरेक घटनाक्रम पर कलम चलाई है। अनिल अंबानी का विवाह, फुटबाल स्टेडियम में शेयर धारकों की मीटिंग, प्रतिद्वंदीयों पर आयकर विभाग का छापा, लाइसेंस राज में हरेक लाइसेंस सिर्फ रिलायंस को मिलने का संयोग, वी पी सिंह, चरण सिंह, चंद्रशेखर की सरकार का पतन,  नुस्ली वाडिया का वीजा रद्द कराकर उन्हें भारत से बाहर निकालने की साजिश, फिर जानलेवा हमले का प्रयास, हर्षद मेहता की गिरफ्तारी पंद्रह दिन टालने की सिफारिश, ब्रिटेन में कई कंपनियों का निर्माण, दूसरों को मात देने के लिए अपनी ही कंपनी के शेयर खरीदना , बेटियों की शादी में वित्त मंत्रालय के बड़े अफसरों का डांडिया, तीन दशक तक रिलायंस का जीरो टेक्स कंपनी बना रहना, इंडियन एक्सप्रेस से विवाद-  ये ऐसे कुछ विवाद है जिन पर समय की गर्द पसर चुकी है लेकिन जनमानस में इन्हें जानने को लेकर उत्सुकता बरकरार है। द पॉलिएस्टर प्रिंस – इसी उत्सुकता को तुष्ट करने का प्रयास करती है।

यद्यपि यह किताब आमजन तक कभी नहीं पहुँच पाएगी क्योंकि इसे 1998 में ही भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया था। पाठकों को याद होगा कि सलमान रुश्दी की ‘ सेटेनकि वर्सेज ‘ भी कभी भारत में प्रतिबंधित हुई थी लेकिन अब इंटरनेट पर सहज उपलब्ध है। ठीक वैसे ही ‘द पॉलिएस्टर प्रिंस’ भी सुधी पाठकों तक पहुँच रही है!

माफिया कारोबार को महिमा मंडित करती कालजयी  काल्पनिक कथा ‘गॉडफादर’ की शुरुआत में महान फ्रेंच उपन्यासकार बाल्ज़ाक का एक लाइन  कथन  पाठक के दिमाग में गॉडफादर की भूमिका तय कर देता है –   Behind every fortune there is a crime ( हरेक भाग्य के पीछे एक अपराध छिपा होता है!)

कोई आश्चर्य नहीं कि ‘द पॉलिएस्टर प्रिंस’ की पंक्तियों से गुजरते हुए यह वाक्य आपके दिमाग में भी गूंजने लगे !

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(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं।)

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