उम्मीदों की हत्या का जश्न और बेशर्म तंत्र

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सौतुक डेस्क/

गोरखपुर ने योगी आदित्यनाथ को पांच बार संसद तक पहुँचाया. देश के सबसे बड़े राज्य का मुखिया बनाया. वही गोरखपुर जहां 60 से अधिक मासूम, प्रशासन की मामूली लापरवाही की वजह से अपनी जान गवां बैठे. प्रशासन तो खैर कई बार अपना बयान बदल चुका है पर अब तक यह स्पष्ट हो गया है कि इन बच्चों की मौत ऑक्सीजन की कमी से हुई और वो भी आइसीयू में. जिन घरों ने अपने बच्चे खोये वहां चूल्हा भी जला होगा इसपर संदेह है जबकि उत्तर प्रदेश सरकार ने अगले ही दिन एक नया फरमान जारी किया राज्य में जन्माष्टमी का जबरदस्त उत्सव मनाया जाए. ज़ाहिर है कि इन बच्चों की मौत का सरकारी तंत्र पर कोई प्रभाव तक नहीं पड़ा. इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की मौत के बाद भी सरकारी चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई.

जब भी ऑक्सीजन की कोई बात होती है मुझे शाहरुख़ खान की एक फिल्म अंजाम का एक दृश्य याद आता है. प्रेम के इस विद्रूप वर्णन में दीपक तिजोरी को ऑक्सीजन दिया जा रहा होता है. वहीँ उनकी पत्नी की भूमिका में माधुरी दीक्षित सेवाभाव से मौजूद हैं. शाहरुख़ माधुरी से खुद से शादी करने को कहते हैं. उनदोनों के बीच जिरह जारी है और माधुरी शाहरुख़ से बार बार अपने सुहागन होने की बात कहती हैं जिनके लिए यह सोचना भी पाप है. इस समस्या से निपटने के लिए शाहरुख़ बिस्तर पर लेटे बीमार दीपक तिजोरी के पास जाते हैं और उनके चेहरे से ऑक्सीजन मास्क हटा देते हैं. माधुरी आवाक देखती रह जाती है. शाहरुख़ के चेहरे पर भी कोई शिकन नहीं होती.

इन दोनों शिकन नहीं होने के दृश्य में बस इतना फर्क होता है कि फिल्म के विलेन को सर्वसम्मति से विलेन माना जाता है और इस वास्तविक दृश्य के विलेन के लिए तमाम बचाव परोसे जाते हैं. सांस के लिए घुटते मासूमों और उनकी मृत्यु के बचाव में राज्य के एक मंत्री यहाँ तक कह देता है कि अगस्त के महीने में तो बच्चे मरते ही हैं. लेकिन यह नहीं बताते कि यह जानते हुए भी कि अगस्त का महीना इस अस्पताल और इस क्षेत्र के लिए बड़ा कठिन गुजरता है, समुचित व्यवस्था क्यों नहीं की गई.

बतौर सांसद, आदित्यनाथ ने भी वर्ष 2009 में संसद में यह कहा था कि दिमागी बुखार का तांडव 15 जून के करीब शुरू होता है जब इलाके में बरसात शुरू होती है. यह अक्टूबर नवम्बर तक चलता रहता है. यह जानते हुए भी क्या यह नहीं लगता कि आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रशासन को कहीं अधिक मुस्तैद होना चाहिए था.

अगस्त महीने में बच्चे मरते हैं और इस खुशी में जन्माष्टमी धूम-धाम से मनाई जाए कहने वाली सरकार की गंभीरता को समझने के लिए इस तथ्य को देखिये. वर्ष 2016 के फ़रवरी महीने में इस मेडिकल कालेज के प्रधानाध्यापक ने दिमागी बुखार के इलाज के लिए सरकार को 37.99 करोड़ की तत्काल जरुरत के बारे में बताया. वह पत्र वहाँ से राष्ट्रीय स्वास्थय मिशन (एनएचएम) के निदेशक को भेजा गया. सनद रहे कि केंद्र और राज्य में भाजपा सरकार होने के बावजूद भी यह रकम नहीं उपलब्ध करवाई गई. यह सूचना ‘द वायर’ में प्रकाशित हुई है. इस वेबसाइट ने यह भी लिखा है कि दिमागी बुखार के कुल 60 प्रतिशत बच्चों का इलाज इसी अस्पताल में होता है. इस अस्पताल में प्रत्येक साल करीब 3.5 लाख लोग आते हैं और करीब 40,000 भर्ती होते हैं.

आपको नहीं लगता कि यह सारे तथ्य यह बताते हैं कि पूर्वांचल अगर किसी को देश का प्रधानमन्त्री बनाता है और गोरखपुर किसी को उत्तरप्रदेश का मुखिया तो इस क्षेत्र ने एक मामूली सी उम्मीद तो जरुर रखी होगी कि कम से कम ऑक्सीजन की तो समुचित व्यवस्था रखी जायेगी. पर यह उम्मीद बेमानी ठहरी.

इस जले पर नमक छिड़कने जैसा ही था जब देश के प्रधानमंत्री अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस हत्या को प्राकृतिक आपदा साबित करने की कोशिश करते दिखे.

इस भाषण के ठीक एक दिन पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसे हत्या करार दिया था. आयोग के शब्द कुछ ऐसे थे, ‘गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में, इतनी बड़ी संख्या में बच्चों का मरना उनके जीवन के अधिकार के हनन का मामला है’. आयोग ने सोमवार को उत्तर प्रदेश सरकार को इस मामले में एक नोटिस जारी किया और चार हफ्ते में विस्तृत रिपोर्ट देने को कहा. इस रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार को यह बताना है कि उसने दोषी अधिकारीयों के खिलाफ क्या कदम उठाये हैं साथ ही यह भी कि ऐसे हादसे दुबारा न हो इसके लिए क्या प्रयास किये जा रहे हैं.

सरकारी मशीनरी के कार्य करने के तरीके से तो यही प्रतीत होता है कि ऐसे हादसे नहीं रुकने वाले. प्रयास तो दूर की बात एक नकली दुःख तक नहीं दिखाने वाली सरकार से इतनी विकराल समस्या के समाधान की उम्मीद रखना बेमानी होगा. समस्या का किस स्तर की है इसको समझने के लिए यह आंकड़े देखिये. इस अस्पताल में पिछले 30-35 सालों में करीब 10,000 बच्चों ने अपनी जाने गवांई हैं. केवल पिछले साल कुल 641 बच्चों ने इस अस्पताल में अपनी जान गवाईं वहीँ वर्ष 2015 में कुल 525 और 2014 में 491 जाने गईं. और महंत से मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ इससे पूरी तरह अवगत थे.

आयोग के अनुसार 11 अगस्त को सरकार के आला अधिकारियों की इस मुद्दे पर एक बड़ी मीटिंग भी हुई फिर भी यह सरकार दावा करती है कि इन्हें नहीं मालूम था कि ऑक्सीजन की भारी किल्लत चल रही है और ऑक्सीजन मुहैया कराने वाली कंपनी का करीब 70 लाख बकाया है. फेसबुक पर अभी ऐसे पत्र भी आ गए हैं जिससे यह पता चलता है कि उस कंपनी ने अस्पताल के प्रशासन के साथ राज्य के मुखिया को भी पत्र लिखकर इस समस्या से अवगत कराया था. फेसबुक पर शेयर हो रहे इस पत्र के सही गलत होने का प्रमाण सौतुक के पास नहीं है.

पर आपको नहीं लगता कि सरकार को इतने परिवारों के कृष्ण के चले जाने का जरा भी दुख होता तो इस तरह की लापरवाह बयानबाजी नहीं होती और यह सरकार इस गैर इरादतन हत्या के लिए जन्माष्टमी के दिन उन तमाम कन्हैया से माफ़ी मांग रही होती.

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