13 ऐसे सूत्र जो बता रहे हैं कि भाजपा 2019 में वापस सत्ता में आ रही है?

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जितेन्द्र राजाराम/ 

क्या कोई ऐसा तरीका है जिससे पता चल पाए कि भारत में 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में किस दल की सरकार बनेगी? भारत जैसे विविधता वाले देश में ऐसे किसी तरीके के बारे में बात करना थोड़ी ज्यादती हो जायेगी. लेकिन अमेरिका के वाइट हाउस में पहुँचने के ऐसे तेरह सूत्र हैं जो बताते हैं  कि इस वहाँ के सत्ता के शीर्ष पर कौन पहुंचेगा.  कई साल से ये सूत्र सही साबित हो रहे हैं.  सबसे मजे कि बात यह है कि पिछले कुछ सालों से भारत में भी इन तेरह सूत्रों का असर देखने को मिलने लगा है.

जितेन्द्र राजाराम

एलन लिष्टमन (Allan Lichtman) नाम के एक विशेषज्ञ ने सन् 1981 में अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों के पूर्व अनुमान के लिए 13 सूत्र बनाए. इन सूत्रों की मदद से उन्होंने 1981 से 2016 तक के अमेरिका के सभी राष्ट्रपति  चुनावों के नतीजों का सटीक अनुमान लगाया है.

इस लेख में इन तेरह सूत्रों को भारतीय आम चुनाव को और उसके परिणाम के मद्देनज़र परखने की कोशिश की जा रही है. हालाँकि, भारतीय संसद का चुनाव अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव से बिलकुल अलग है लेकिन 2010 से 2014 के बीच हुए चुनावी प्रयोगों ने इन सूत्रों को भारत में भी उपयोगी बना दिया है.

2014 के पहले तक भारत के आम चुनाव संघीय हुआ करते थे, यानि वो किसी एक व्यक्तित्व पर निर्भर न होकर पूरे दल के राजनैतिक चाल-चलन पर निर्भर हुआ करते थे. जनता अपने सामाजिक, आर्थिक, जातिगत और क्षेत्रीय  मूल्यों एवं आवश्यकताओं के अधार पर मतदान करती थी. मतदाता अपने प्रतिनिधि के चयन के दौरान किसी राष्ट्रवादी भावना को विशेष तरजीह नहीं देता था.

लेकिन हर बात पर अमेरिका हो जाने की नसीहत देने वाले कॉर्पोरेट वर्ग ने (जिसमें कॉर्पोरेट में कार्यरत कर्मचारी भी शामिल हैं), आखिरकार 2014 के आम चुनाव को अमेरिका के तर्ज पर संघीय से बदलकर अध्यक्षीय कर दिया. सनद रहे कि अमेरिका में संसद का और राष्ट्रपति का चुनाव सभी निकाय एवं गणराज्य चुनावों को मिलाकर किया जाता है, लेकिन भारत में संसद का चुनाव, विधानसभा का चुनाव, शहरी एवं ग्रामीण निकायों के चुनाव बिलकुल स्वतंत्र और अलग-अलग समय में किये जाते हैं. इन चुनावों में महिला और जातिगत आरक्षण का समीकरण भी अलग-अलग निर्धारित होता है. ऐसे में संघीय चुनाव का अध्यक्षीय चुनाव में बदले जाने का मतलब है कि अब चुनाव जीतने के लिए एक इन्सान का चेहरा दिखा कर पूरे दल के चरित्र पर बुरका डाला जा सकता है.

2014 के पहले तक भारत के आम चुनाव संघीय हुआ करते थे, यानि की वो किसी एक व्यक्तित्व पर निर्भर न होकर पूरे दल के राजनैतिक चल-चलन पर निर्भर हुआ करते थे. जनता अपने सामाजिक, आर्थिक, जातिगत और क्षेत्रीय  मूल्यों एवं आवश्यकताओं के अधार पर मतदान करती थी.  मतदाता अपने प्रतिनिधि के चयन के दौरान किसी राष्ट्रवादी भावना को विशेष तरजीह नहीं देता था. 

इस बदलाव को राजदीप सरदेसाई ने अपनी पुस्तक “इलेक्शन दैट चेंज्ड इंडिया” में विस्तार से वर्णन किया है.

इस अनाधिकारिक रूप से विकसित हुई चुनावी प्रणाली का लाभ सिर्फ केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को ही नहीं हुआ है बल्कि दिल्ली राज्य में एक नई नवेली पार्टी को भी अभूतपूर्व एवं ऐतिहासिक विजय मिली.  सबसे नया राजनितिक दल होने के बावजूद भी यह देश के मुख्य राजनितिक दलों में शामिल हो गया. इस प्रणाली ने बिहार विधानसभा के चुनाव में अप्रत्याशित फर्क पैदा किया है. उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में तो अघोषित, अनाधिकारिक फिर भी प्रभावपूर्ण अध्यक्षीय चुनाव प्रणाली ने चौंकाने वाले नतीजे पेश किये.

यह भी विदित हो कि भारत का सबसे पुराना राजनीतिक दल अभी तक इस चुनावी प्रणाली में कोई विशेष कौशल हासिल नहीं कर पाया है. हालाँकि, आगामी गुजरात चुनाव में इस पार्टी को कमर कसते हुए देखा जा सकता है.

इस चुनाव सर्जरी के दूरगामी अंजाम क्या होंगे, इस पर किसी तरह की भविष्यवाणी जल्दबाजी है लेकिन इन चुनावों में जीत-हार के सूत्रों को अमेरिकी चश्मे से देखा जा सकता है.  एलन लिष्टमन के मुताबिक निम्नलिखित 13 सूत्रों में से आठ सूत्र यदि सत्तारूढ़ पार्टी के समर्थन में हो जाये तो सत्ताधारी दल वापस सरकार बना सकता है. लेकिन आठ से एक भी कम सूत्र यदि सत्ताधारी दल का समर्थन नहीं करते  तो फिर सत्ता में वापसी असंभव है. इसी तरह यदि मुख्य विपक्षी दल के पक्ष मे यदि पांच सूत्र पाए गए तो समझिये कि विपक्ष सत्ता में काबिज होने वाला है. लेकिन उसी स्थिति में जब मौजूदा सत्ताधारी पार्टी कम से कम सात सूत्रों वाले मामले में पिछड़ रहा हो. ये तेरह सूत्र निम्नलिखित है.

1.क्या सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के सांसद दोनों सदनों में सबसे ज्यादा हैं?
2.क्या सत्ताधारी दल के पास कोई शक्तिशाली प्रधानमंत्री चेहरा नहीं है?
3. क्या सत्ताधारी दल का प्रधानमंत्री प्रत्याशी मौजूदा प्रधानमंत्री भी है?
4. क्या कोई शक्तिशाली तीसरा संघ है जो सत्ताधारी दल और विपक्षी दल को चुनौती देता महसूस हो रहा हो?
5. क्या चुनावी वर्ष में देश पर कोई आर्थिक संकट है?
6. क्या निकट भविष्य में देश की प्रति-व्यक्ति विकास दर में मजबूती की कोई सम्भावना है?
7. क्या मौजूदा व्यवस्था ने पिछले पांच वर्षों में कोई बड़ी परियोजना को पूर्ण किया है?
8. क्या फ़िलहाल कोई बड़ी क्रांति या दंगा जैसी घटना हुई है?
9. क्या सत्तारूढ़ दल किसी बड़े घोटाले में फंसा है?
10. क्या मौजूदा सत्र में देश कोई युद्ध हो रहा है या हो चुका है?
11. क्या मौजूदा सत्र में कोई सामरिक उपलब्धि सरकार प्राप्त की है?
12. क्या सत्ता दल का प्रधानमंत्री प्रत्याशी अत्यंत लोकप्रिय नेता या राष्ट्रीय हीरो हैं?
13. क्या विपक्षी दल के पास कोई राष्ट्रीय हीरो और लोकप्रिय नेता नहीं है?

इन सूत्रों को देखे तो साफ़ दिखता है कि 2014 के आम चुनाव में सत्ताधारी यूपीए गठबंधन क्यों बुरी तरह पराजित हुआ था. इनमें  सूत्र 8 और सूत्र 4 बड़े ही रोचक ढंग से सत्ताधारी यूपीए गठबंधन के खिलाफ खड़े थे. विपक्ष ने 2011-12 के दौरान सूत्र 8 का बहुत ही बारीकी से निर्माण किया और माहौल को अपने पक्ष मे करने में सफल हुआ था. सूत्र 4 के रूप में आम आदमी पार्टी को तीसरे फ्रंट के रूप में स्थापित कर राजग ने संप्रग चारो खाने चित कर दिया था.

इन समीकरणों की माने तो विपक्ष ने भारतीय राजनीति को बड़े सूझ बूझ से इस्तेमाल किया और अपने पक्ष में माहौल बनाने में सफल हुआ. इसमें एलन लिष्टमन के सूत्र काम आये.

इन सूत्रों के माध्यम से अगर मौजूदा स्थिति को समझने की कोशिश की जाए तो  2019 में भी संप्रग लगभग हारा हुआ है और तीसरे फ्रंट को सत्ताधारी राजग कांटे में चारे की तरह उपयोग करने में कामयाब हो जायेगा.

(जितेन्द्र राजाराम  इंदौर में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं.)

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