क्या है किसानों की सबसे बड़ी मांग जिसे सरकार पूरा नहीं कर पा रही है

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शिखा कौशिक/

पिछले कुछ सालों से सरकार और किसानों में ठनी हुई है. आखिर मुद्दा क्या है? क्या चाहते हैं किसान और सरकार क्यों नहीं इन वादों को पूरा कर रही है?

किसानों के फसल की लागत बढती जा रही  है और किसान इससे त्रस्त हैं. इसकी वजह से बड़ी संख्या में किसानों ने खेती छोड़ दी है. वैसे जुलाई में केंद्र सरकार खरीफ की फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढाने को मंजूरी दी और अगर सतह पर देखा जाए तो इससे किसानों को अपनी फसल की लागत का 150 प्रतिशत दाम मिलेगा.

कई साल से किसानों के लिए यह मुख्य मुद्दा रहा है. कायदे से इस निर्णय से किसानों को फायदा होना चाहिए और उन्हें अपनी फसल का दाम निर्धारित करने में मदद मिलेगी. लेकिन यहीं पर सारा पेंच हैं.

न्यूनतम समर्थन मूल्य में गड़बड़झाला

कृषि लागत और मूल्य आयोग (The Commission for Agricultural Costs and Prices- CACP), गणना कर न्यूनतम समर्थन मूल्य की अनुशंसा करता है. यह तीन आधारों पर होता है. जैसे A2, A2+FL और C2.

“A2” में कृषि की वास्तविक लागत शामिल की जाती है जैसे बीज, खाद और खेती के लिए रखे गए मजदूर. वहीँ “A2+FL” में A2 के साथ घर के लोगों की मजदूरी भी जोड़ी जाती है जिन्होंने इसमें श्रमदान किया होता है. “C2” में A2+FL के साथ भूमि का किराया या इस्तेमाल किये गए पूँजी का ब्याज भी शामिल होता है.

इस समर्थन मूल्य को समझने के लिए 16 कृषि विश्वविद्यालय और संस्थाएं 19 राज्यों के दस विभिन्न आकार के दस कृषि भूमि को रोजाना अध्ययन कर के कृषि के लागत का अनुमान करते हैं.

किसानों की आमदनी इस पर तय होती है कि CACP कौन सा फार्मूला चुनता है.  वर्ष 2006 में स्वामीनाथन कमिटी ने C2+50% की अनुशंसा की थी.

वर्ष 2014, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) यही वादा करते हुए सत्ता में आया था कि वह स्वामीनाथन कमिटी की अनुशंसा को लागू करेगा. अलबत्ता सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने ढेरों पैतरे बदले. कभी कहा कि हमने ऐसा वादा ही नहीं किया तो कभी कहा कि ऐसा करने से बाज़ार प्रभावित होगा. पिछले बजट के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अचानक से घोषणा की कि उनकी सरकार किसानों को बढ़ी हुई न्यूनतम समर्थन मूल्य देना शुरू कर चुकी है.

बाद में पता चला कि सरकार किसानों को A2+FL के हिसाब से समर्थन मूल्य देने पर विचार कर रही है. C2 के हिसाब से नहीं, जिसकी अनुशंसा स्वामीनाथन कमिटी ने की थी.

इसका असर यह होगा कि किसानों को इस बढ़े हुए समर्थन मूल्य का कोई फायदा इसलिए नहीं होगा क्योंकि कृषि में आने वाली लागत लागातार बढती जा रही है.

क्या सरकार के पास इतना पैसा है?

इस लड़ाई में सबसे अहम् सवाल यह है कि क्या सरकार के पास इतना पैसा है कि वह किसानों को उनकी फसल का समर्थन मूल्य दे पाए.

बजट भाषण में जेटली ने यह घोषणा की कि सरकार पहले से ही बढ़ी हुई न्यूनतम समर्थन मूल्य देना शुरू कर चुकी है, उस बजट में इसपर आने वाले खर्चे के बारे में कोई बात नहीं की गई. ना ही इसके लिए पैसे का प्रावधान किया गया.

2015 के फ़रवरी में सर्वोच्च न्यायालय में दिए गए एक शपथपत्र में सरकार ने कहा था कि कृषि पर आने वाली लागत का पचास फीसदी दाम बढ़ाना संभव नहीं है. इससे बाज़ार प्रभावित होगा. तीन साल बाद स्थिति और बदतर हुई है. दूसरी तरफ सरकार अन्तराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के बढ़ते दाम की वजह से पहले दबाव में है. दूसरे भारतीय बैंको की स्थिति काफी खराब है और बड़े-बड़े उद्योगपति इन बैंको का पैसा लेकर भाग रहे हैं. ऐसे में यह कहा जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी ने चुनाव में घोषणा भले कर दी हो पर किसानों को हाल-फिलहाल राहत पहुंचाने की स्थिति में नहीं है.

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