कौमार्य परिक्षण अब भी जारी, सयुंक्त राष्ट्र ने आवाज उठाई पर भारत अब भी चुप

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अनिमेष नाथ/

जब देश में नवरात्रि का उत्सव चरम पर था और लड़कियाँ देवी के तौर पर देखी जा रही थीं, ठीक उसी समय एक 23 साल कीमहिला को इसलिए गरबे में शामिल होने से रोक दिया गया क्योंकि उसने पारंपरिक कौमार्य परिक्षण या कहें वर्जिनिटी टेस्ट मेंशामिल होने से मना कर दिया था.

पुणे की रहने वाली इस महिला का नाम ऐश्वर्या तमाचिकर  है. इनका विवाह इसी साल मई महीने में विवेक तमाचिकर के साथसंपन्न हुआ. न केवल इस महिला ने, बल्कि उसके पति ने भी इस कौमार्य परिक्षण की कुप्रथा को मानने से इनकार करदिया. ऐश्वर्या शादी के पहले से ही इस कुप्रथा का विरोध कर रही थीं और इसके खिलाफ अभियान भी छेड़ रखा था.

इक्कसवी सदी में भी प्रचलित इस कुप्रथा के बारे में आइये आपको बताते चलें. यह प्रथा कंजर भाट आदिवासी समुदाय में प्रचलित है जिसमें महिलायें, अपनी शादी की पहली रात सफ़ेद चादर लेकर सोने जाति हैं. सामाजिक अपेक्षा के अनुसार उस चादर को सुबह खून के धब्बे होने चाहिए.

अगर ऐसा नहीं होता है तो महिला के कौमार्य और चरित्र पर संदेह किया जाता है. इसके बाद उस महिला को कैसी स्थिति का सामना करना पड़ता होगा इसका अनुमान आप आसानी से लगा सकते हैं.

इस नवरात्रिपर ऐश्वर्या मायके गयीं और घर के पास आयोजित गरबा में भाग लेने का मन बनाया. लेकिन उनके और उनकी माँके गरबे में पहुंचते ही लोगों ने गरबा रोक दिया. यह सब ऐश्वर्या के विरोध में किया गया.

खैर, ऐश्वर्या जागरुक महिला हैं इसलिए उन्होंने स्थानीय थाने में इन ‘सामाजिक ठेकेदारों’ के खिलाफ मामला दर्ज कराया है. लेकिन इस कुप्रथा को झेलने वाली सारी महिलायें ऐश्वर्या की तरह जागरुक नहीं होतीं और उनको शर्मसार करने वाली प्रक्रिया सेगुजरना ही होता है.

संयोग देखिये कि इधर ऐश्वर्या  मुद्दे को लेकर थाने जा रही थीं और उधर सयुंक्त राष्ट्र से जुडी कई संस्थाओं ने इस अवैज्ञानिक कुप्रथा पर रोक लगाने की मांग भी कर दी. यह भी पिछले सप्ताह ही हुआ.

(इस विषय पर एक सुंदर लघु फिल्म)

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग, संयुक्त राष्ट्र महिला आयोग और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने न केवल कौमार्य परीक्षण पर रोक लगाने की बात की है बल्कि यह भी कहा कि यह परीक्षण पूरी तरह अवैज्ञानिक है और इसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है. इन संस्थाओं ने जोर देकर कहा है कि इस कुप्रथा की वजह से बड़ी संख्या में महिलाओं को दर्दनाक और अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ता है.

इन संस्थाओं की माने तो विश्व के कम से कम 20 देशों में इस तरह के कौमार्य परीक्षण किये जाते हैं. इसमें महिला को देवी मानने वाला देश भारत भी शामिल है. ये कौमार्य परीक्षण यह जानने के लिए किया जाता है कि महिला या लड़की ने जीवन में कभी संभोग किया है या नहीं.

इस परीक्षण के महिलाओं पर दुष्प्रभाव को देखते हुए इस संस्थाओं ने इसे लैंगिक भेदभाव भी बताया.

इन संस्थाओं ने इस ‘कुप्रथा’ के सामाजिक ढांचे पर हमला बोलते हुए कहा कि कौमार्य कोई वैज्ञानिक या तथ्य पर आधारित नहीं है. बल्कि इसके पीछे सामाजिक, सांस्कृतिक गफलत भर है. माने ये कि इस तरह के परिक्षण से महिला के कौमार्य का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता.

और इस अवैज्ञानिक परिक्षण से महिलाओं को जबरदस्ती गुजरने के लिए मजबूर किया जाता है. कई बार तो लड़की के माता-पिता या पति उन्हें इसके लिए मजबूर करते हैं. इनका उद्देश्य यह जानना होता है कि वह लड़की विवाह के योग्य है कि नहीं.

ऐसी ही कुछ जांच बलात्कार पीड़ितों पर भी किया जाता है. यह जानने के लिए कि महिला के साथ सच में बलात्कार हुआ है कि नहीं, महिलाओं के जननांग में उंगली डाली जाती है. इसको अंग्रेजी में टू फिंगर टेस्ट (two finger test) कहते हैं. भारत में यह जांच सामान्य है और अधिकतर मामलों में ऐसा किया जाता है.

इस जांच से योनि से पानी के स्राव या उसके खुलने के आकार के आधार पर यह जानने की कोशिश की जाती है कि महिला के साथ बलात्कार हुआ है कि नहीं. इन दोनों तकनीकों का उपयोग इस विश्वास के साथ किया जाता है कि इनके द्वारा किसी महिला की यौन गतिविधियों के बारे में पता लगाया जा सकता है.

हालाँकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का कहना है कि, “इस तरह के जांच के सही होने के पक्ष में कोई सबूत नहीं है. इस परीक्षण से किस महिला की यौन गतिविधि का पता लगाया जा सकता है, यह आधारहीन कल्पना है.”

भारत में इसके खिलाफ लम्बा संघर्ष चला है. जो लोग इसके खिलाफ लड़ाई में शामिल हैं उनका कहना है कि यह परीक्षण सिर्फ़ महिलाओं के प्रति मानवाधिकारों का उल्लंघन ही नहीं है बल्कि बलात्कार के मामलों में यह पीड़ित महिला पर थोपे गए अतिरिक्त मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना है.

इस तरह के कौमार्य परिक्षण के कई तात्कालीन और दूरगामी प्रभाव देखने को मिलें हैं. कई मामलों में ये महिलाओं की चिंता, अवसाद और आघात सम्बन्धी तनाव का कारण बनते हैं. ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जिनमें महिलाओं पर इस परीक्षण का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है और महिलाऐं आत्महत्या तक करने पर मजबूर हो गयी हैं. कई बार तो परिवार के “सम्मान” के नाम पर कौमार्य परिक्षण में फेल हुई लड़कियों की हत्या तक के मामले सामने आये हैं.

मानवाधिकार और स्त्री अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोगों को मानना है कि इस मुद्दे पर समाज में जागरूकता लाने की आवश्यकता है.

भारत ने 2015 में ही इस विवादस्पद ‘टू-फिंगरटेस्ट’ पर रोक लगा दी थी लेकिन अमूमन जैसा होता है कि सारे अच्छे आदेश  कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं, यह आदेश भी कागज़ में ही रह गया. लोगों का आरोप है कि सरकार ने इसके लिए जो जरुरी अन्य तरीके हैं जिसमे एक रेप-किट भी शामिल है. इन सारे तरीकों से बलात्कार के होने न होने का पता चल सकता है. सरकार को इन तरीकों को बढ़ावा देना है ताकि टू फिंगर टेस्ट न किया जाए. सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया और परिणामस्वरूप यह आधारहीन जांच अभी भी जारी है.

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