मेक इन इंडिया का तो कुछ नहीं हुआ लेकिन ब्रेक इन इंडिया ने नई ऊँचाई जरुर पा ली

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शिखा कौशिक/

सोमवार की शाम जब सबकी निगाहें एक दिन बाद आने वाले पांच विधानसभा चुनाव के नतीजों पर थी तब देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत बुरी खबर आई. भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफे की घोषणा कर सबको चौंका दिया.

वैसे तो पटेल ने ‘निजी कारणों’ का हवाला दिया, पर उनके सामने चारा भी क्या था! क्या कहते कि अब सरकार के साथ मिलकर कार्य करना लगभग असंभव हो गया है. लेकिन उनके बिना कहे, सुनने वालों ने यही सुना. इस घटना पर चिंता जताते हुए आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने मीडिया से बात करते हुए यह कह दिया कि यह एक तरीके से सरकार से विरोध दर्ज कराना हुआ. रिज़र्व बैंक के गवर्नर के पास विरोध दर्ज कराने का बस यही एक तरीका है. उन्होंने तो यह तक कह दिया कि केंद्रीय बैंक से गवर्नर की इस तरह से विदाई पर सारे देशवासियों को चिंतित होना चाहिए.

सीएनबीसी टीवी 18 के सलाहकार संपादक उदयन मुखर्जी ने तो यह भी लिखा कि यह खासा परेशान करने वाली खबर है. सिर्फ इसलिए नहीं कि मंगलवार को सेंसेक्स औंधे मुंह गिरेगा बल्कि इसलिए भी कि इसके दूरगामी परिणाम होंगे.

मुखर्जी ने लिखा कि पूर्व गवर्नर राजन ने जिस तरह से वर्तमान सरकार की भर्त्सना की है यह सरकार उसी के काबिल है. उनका कहना है कि अभी तो विश्व समुदाय का इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया आनी बाकी है. ये विदेशी निवेशक न केवल शब्दों से सरकार की भर्त्सना करेंगे बल्कि भारत से पैसा वापस निकालकर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौती भी पैदा करेंगे.

एक बार अर्थव्यवस्था से अगर निवेशकों का भरोसा ख़त्म हो जाता है तो इसे वापस पाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है.

भारतीय रिज़र्व बैंक एक ऐसी संस्था है जिसपर निवेशक भारत सरकार से भी अधिक भरोसा करते हैं. अगर इन निवेशकों को यह लगने लगा कि यह संस्था भी अब नेताओं के कब्जे में आ गई है तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर से उनका भरोसा उठ जाएगा. वे भारत में निवेश करने से डरेंगे.

अगर निवेशकों को यह लगने लगा कि यह संस्था भी अब नेताओं के कब्जे में आ गई है तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर से उनका भरोसा उठ जाएगा. वे भारत में निवेश करने से डरेंगे

ऐसा नहीं है कि केंद्र सरकार और रिज़र्व बैंक के गवर्नर के बीच तनाव की स्थिति पहली बार बनी. ऐसा तनाव होना स्वाभाविक है. क्योंकि देश के वित्त मंत्री और रिज़र्व बैंक की प्राथमिकता हमेशा एक नहीं होती. लेकिन ऐसी स्थिति में गवर्नर कुछ दिन की गंभीरता दिखाते हैं और सरकार को भी देर सवेर समझ में आ जाता है कि देश के लिए सही क्या है. इसी तेवर की तरफ इशारा करते हुए कुछ दिनों पहले रघुराम राजन ने कहा था कि भारतीय रिज़र्व बैंक का काम नवजोत सिंह सिद्धू की तरह फटाफट बल्लेबाजी कर आउट होने का नहीं है. बल्कि केंद्रीय बैंक को राहुल द्रविड़ की तरह टिककर खेलना होता है. धैर्य के साथ.

लेकिन यह तब संभव हो पायेगा जब सरकार भी देश के दूरगामी परिणामों को लेकर चिंतित हो और देर से ही सही समझने को तैयार हो. वर्तमान सरकार के साथ ऐसा नहीं है. इसके लिए किसी भी कीमत पर जितना जरुरी है. किसी भी कीमत पर!

बनर्जी लिखते हैं कि आने वाले चुनाव और देश में मंदी के मद्देनज़र सरकार किसी भी तरह से पूँजी जुगाड़ना चाहती है.  नोटबंदी और जीएसटी की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही है. सरकार पूँजी निवेश कर के जल्दी से जल्दी इसे वैसी स्थिति में लाना चाहती है कि अप्रैल में होने वाले चुनाव में लोगों को अपना मुंह दिखा सके.

भारतीय रिज़र्व बैंक सरकार के इस प्लान के बीच में खड़ा है क्योंकि इसका उद्देश्य तत्कालीन चुनाव नहीं बल्कि देश का भविष्य है. अगर यह अपना खजाना चुनावों के मद्देनज़र खोलने लगे तो देश का भविष्य अधर में आ जाएगा. दूसरी तरफ इस सरकार की नज़र में किसी भी संस्था के लिए इतनी इज्जत नहीं है कि उसकी बात सुन सके. खासकर केंद्रीय बैंक के बारे में तो इस सरकार ने नोटबंदी के समय ही अपना नजरिया स्पष्ट कर दिया था.

इस लड़ाई में किसी एक को हारना था और जाहिर है वह भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर ही होते. इस तरह उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया और लोगों को सन्देश देने की कोशिश की कि देखिये देश के भविष्य के साथ क्या हो रहा है.

बनर्जी लिखते हैं कि एक तरह से यह अच्छा ही हुआ. इनके अनुसार देश में कुछ ऐसा ही बड़ा धमाका (बहुत बुरा) होता तभी वैश्विक ताकतों की नज़र भारत पर जाती. उन्होंने समझ में आता कि भारत सरकार देश के पुराने और महत्वपूर्ण संस्थाओं के साथ कैसा बर्ताव कर रही है.

वैसे भी यह सरकार किसी गवर्नर की भले न सुने पर जब निवेशक बड़ी संख्या में भारत से पूंजी निकालेंगे, सेंसेक्स लुढ्केगा तब तो इनको समझना ही पड़ेगा.

स्क्रोल पर लिखे अपने लेख में बनर्जी लिखते हैं कि किसान, अल्पसंख्यक और पिछड़ी जातियां तो इस सरकार के खिलाफ हैं ही जब शहरी मध्यम वर्ग, व्यवसायी, निवेशक विरोध का झंडा उठाएंगे तब सरकार की अक्ल ठिकाने आएगी.

इनके अनुसार जो सरकार विकास और मेक इन इंडिया का नारा देते हुए सत्ता में आई थी उसके शासन में मेक इन इंडिया तो कभी नहीं जोर पकड़ पाया पर ब्रेक इन इंडिया दिनोंदिन नई ऊँचाई छूता जा रहा है.

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