उम्र बढ़ने के साथ अपने ही घर में गरीब होती जाती हैं भारतीय महिलाएं

0

उमंग कुमार/

नब्बे के दशक में प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने ‘गायब महिलाएं’ (Missing Women) जैसा कुछ शब्द दुनिया के सामने रखा था. उनका कहना था कि विकासशील देशों, खासकर भारत और चीन की जनसंख्याँ में महिलाओं का अनुपात अप्रत्याशित रूप से कम है.

विकसित देशों में लड़कियों के बनिस्बत लड़के अधिक पैदा होते हैं पर प्राकृतिक न्याय के अनुसार इनका अनुपात धीरे-धीरे बराबर हो जाता है. क्योंकि एक सामान्य व्यवस्था में बच्चों की मृत्युदर बच्चियों से अधिक होती है. पर दुनिया के सारे हिस्से में यह प्राकृतिक न्याय देखने को नहीं मिलता. भारत भी इनमें शामिल है जहां स्त्री और पुरुष की जनसँख्या का अनुपात बाद में भी बराबर नहीं हो पाता.

नब्बे के दशक में लिंगानुपात की इस गड़बड़ी पर गौर किया जाने लगा तो भारत के नीति-निर्माताओं ने भ्रूण हत्या को इसका जिम्मेदार माना. वैसे भारत में बिगड़ते लिंगानुपात के पीछे भ्रूण-हत्या एक महत्वपूर्ण वजह तो है ही. आज भी भारत के अधिकतर माता-पिता की पहली पसंद बेटा ही है. लेकिन समस्या बस यहीं तक सीमित नहीं है.

हाल-फिलहाल कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं जो चौंकाने वाले हैं. वर्ष 2010 में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला कि भारत की जनसँख्या में असमान लिंगानुपात सिर्फ बच्चों में ही नहीं बुजुर्गों में भी है. यानि भारत के स्त्री-पुरुषों में सिर्फ जन्म लेने के समय ही सामाजिक अन्याय काम नहीं करता बल्कि ढलती उम्र में भी महिलाओं के असमान मृत्यु में इसकी अहम् भूमिका है.

यही वजह है कि भारत की कुल जनसँख्या में महिलाओं का अनुपात 48.4 है. वहीँ, इंग्लैण्ड और जर्मनी में यह अनुपात 51 प्रतिशत के करीब है. अमेरिका की जनसँख्या में महिलाओं का अनुपात 50.6 प्रतिशत के करीब है.

इस विषय पर अध्ययन करने वाले विद्वानों ने पाया कि ढलती उम्र में महिलाओं की घटती जनसँख्या माता-पिता के बेटे की चाह रखने भर का परिणाम नहीं हैं. बल्कि भारत में पितृ-सत्ता अपना प्रकोप महिलाओं के पूरे जीवन-चक्र को प्रभावित करता है.  ढलती उम्र में घटती जनसंख्या के पीछे महिलाओं के उम्र के साथ साथ उनकी कमजोर होती जाती स्थिति अधिक जिम्मेदार है. बुजुर्गियत की तरफ बढती महिलाओं की यह समस्या भारतीय किशोरियों की समस्या से कहीं अधिक गंभीर है. पर भारत के नीति-निर्माताओं ने भ्रूण-ह्त्या की तरह इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया है.

विश्व स्वास्थय संगठन ने गरीबी को कुपोषण और बिगड़ते  स्वास्थ्य से जोड़ा है जिसका एक व्यक्ति के आयु पर सीधा असर पड़ता है

वर्ष 2017 में राईस विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर रोसेल्ला कलवी ने एक अध्ययन किया और पाया कि बढती उम्र के साथ भारतीय महिलाओं की स्थिति कमजोर होती जाती है. खासकर 45 से 79 उम्र के बीच इन महिलाओं की स्थिति उनके अपने घर और समाज में बद से बदतर होती जाती है.

इसके पीछे वजह है उनके पास बारगेनिंग पॉवर का कम होता जाना. या कह लें घरेलु निर्णय में उनका पक्ष रखना कमतर होता जाता है और अपनी बात मनवाने के लिए उनके पास कोई हथियार नहीं होता. इस वजह से इन महिलाओं का घरेलु संसाधनों का इस्तेमाल कमतर होता जाता है. माने यह कि उम्र बढ़ने के साथ ये महिलाएं अपने परिवार में ही गरीब होती जाती हैं. यही वजह है कि भारत में महिलाओं का मृत्युदर पुरुषों के मुकाबले अधिक है. क्योंकि उम्र के साथ-साथ भारतीय परिवार में पुरुष अमीर और महिला गरीब होती जाती है.

सनद रहे कि विश्व स्वास्थय संगठन ने गरीबी को कुपोषण और बिगड़ते स्वास्थ्य से जोड़ा है जिसका एक व्यक्ति के आयु पर सीधा असर पड़ता है.

इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए शोधकर्ता ने उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण के आंकड़े का इस्तेमाल किया है. इस सर्वेक्षण के आंकड़े का इस्तेमाल कर इन्होंने यह अनुमान लगाया है कि प्रजनन काल के बाद के उम्र में एक महिला, पुरुष के मुकाबले घरेलु संसाधनों का महज 65 प्रतिशत ही इस्तेमाल करती है. इसके साथ ही इन्होंने उन राज्यों के आंकड़े का भी अध्ययन किया है जहां हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन बहुत पहले हो गए थे. वहाँ महिलाओं की स्थिति बेहतर है क्योंकि घर के संसाधनों पर उनका अधिकार है और वे अपने घर में रहते हुए गरीब नहीं होती जा रहीं हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here