कैसा लगेगा अगर सरकार आपको घर बैठे हर महीने एक तय रकम देगी?

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उमंग कुमार/

आने वाले कुछ ही सालों में सरकार, देश के प्रत्येक नागरिक को एक निश्चित रकम हर महीने उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही है. आप भले कोई काम करें या न करें, आपको एक तय रकम दी जायेगी. लेकिन इसके एवज में सरकार से मिलने वाली अन्य सारी सुविधाएं ख़त्म कर दी जाएंगी. सरकार बहुत जल्दी ही इसकी शुरुआत कुछ राज्यों से करने वाली है.

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने सोमवार को इसकी पुष्टि की. उन्होंने कहा कि आने वाले दो सालों में इसे एक दो राज्यों से शुरू किया जाएगा. अरविंद सुब्रमण्यन इस आधारभूत आय या युनिवर्सल इनकम (UI)के बड़े पैरोकार रहे हैं. वर्ष 2017 में जारी आर्थिक सर्वेक्षण में उन्होंने कहा था कि इस आधारभूत आय को भारत में शुरू करने का समय आया है कि नहीं इस पर बहस हो सकती है लेकिन इसपर बातचीत करने का समय तो जरुर आ गया है.

सोमवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली के संसद में आर्थिक सर्वेक्षण संसद के पटल पर रखने के बाद, मुख्य आर्थिक सलाहकार ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि अगले दो साल में एक या दो राज्यों में सबके लिए आधारभूत आय (यूबीआई) लागू की जाएगी.

पिछले साल आर्थिक सर्वेक्षण में सीईए ने सबके लिए उनकी जरूरतों के मद्देनजर सार्वभौमिक आधारभूत आय के बारे में सुझाव दिया था

मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) ने कहा, “सार्वभौमिक आधारभूत आय के मसले पर पिछले साल से काफी विचार-विमर्श किया गया है. मौजूदा दौर में भी इस पर बातचीत चल रही है. मैं शर्त लगा सकता हूं कि कम से कम एक या दो राज्य दो साल के भीतर इसे लागू करेंगे.”

पिछले साल आर्थिक सर्वेक्षण में सीईए ने सबके लिए उनकी जरूरतों के मद्देनजर सार्वभौमिक आधारभूत आय के बारे में सुझाव दिया था.

जनता को एक नियत रकम हर महीने दिए जाने का यह विचार देश के लिए नया नहीं है. इसके पहले योजना आयोग ने भी साठ के दशक में इस पर बातचीत शुरू की थी. लेकिन यह विचार हाल-फिलहाल चर्चा में अधिक रहा है. इसके पैरोकारों का कहना है कि देश की एक बड़ी आबादी अभी भी गरीबी रेखा से नीचे रहती है और सरकार उनको तमाम तरह से सहायता पहुंचाती है जिसमें सब्सिडी इत्यादि शामिल है. इन लोगों का मानना है कि यह सब्सिडी भ्रष्टाचार की वजह से लोगों के पास सही मात्रा में नहीं पहुँच पाता है, जितने के वे हकदार हैं. इन सारी बातों को तर्क के तौर पर इस्तेमाल कर यह कहा जाता है कि सार्वभौमिक आय इन सबसे निपटने में मदद करेगा.

एक या दो राज्यों से ही क्यों?

सरकार अगर इस योजना को देश के सभी बीपीएल परिवारों से इसे शुरू करे तो इस पर सालाना करीब 3.24 लाख करोड़ रुपये खर्चा आएगा. वह भी तब जब सरकार हर गरीब को महज 1,000 रूपए हर महीने देगी. देश में करीब 27 करोड़ लोग बीपीएल श्रेणी में आते हैं.

वर्ष 2016-17 में केंद्र सरकार ने करीब ढाई लाख करोड़ रुपये सब्सिडी पर खर्च किये थे. इसमें से करीब 1.34 लाख करोड़ रुपये लोगों को भोजन पर दिए जाने वाले सब्सिडी पर खर्च हुए. करीब 70,000 करोड़ रुपये खाद के लिए सरकार ने उपलब्ध कराया था. इसी तरह पेट्रोल डीजल पर दिए जाने वाले सब्सिडी के लिए सरकार ने 26,947 करोड़ रूपये खर्च किए थे.

इसका मतलब यह हुआ कि अगर सरकार सब्सिडी एकदम बंद भी कर दे तब भी इसे एक लाख करोड़ रुपये और खर्च करने होंगे. दूसरे, यह अनुमान तब है जब सरकार लोगों को महज 1,000 रुपये हर महीने उपलब्ध कराएगी. आज के खर्चे के हिसाब से इस रकम से कोई फायदा नहीं होगा.

शायद इसीलिए सरकार पूरे देश में एक साथ प्रयोग न कर कुछेक राज्यों से ही शुरू करने का खाका तैयार कर रही है.

 

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