आधार आगे भी करता रहेगा बेज़ार

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क्या बैंक और मोबाईल कंपनियों से आधार डेटा ख़त्म करने को कहेगी सरकार  

उमंग कुमार/

बुधवार को आधार पर सुप्रीम कोर्ट का बहुप्रतीक्षित फैसला आया और इस फैसले के आते ही मीडिया में जैसे हाहाकार मच गया.  इस फैसले को मीडिया ने कुछ ऐसे चलाया कि लगा सर्वोच्च न्यायालय ने लोगों के डर को समझा और बहुत बड़ी राहत दी है. थोडा और गहराई से समझे तो लगेगा कि लोगों को सबसे अधिक परेशानी अपने बच्चे के लिए स्कूल में आधार जमा करने से था या मोबाईल नम्बर के लिए आधार जमा करने से था. और कोर्ट ने इसे समझते हुए राहत दे दी है.

जबकि हुआ है एकदम इसके उलट. आधार से लोगों को सबसे अधिक समस्या देटा के इंटरलिंकिंग से थी जो अब भी बदस्तूर जारी रहेगा. वर्तमान सरकार आधार को ऐसे प्रोमोट कर रही थी कि मोहल्ले का गार्ड भी आधार मांगने लगा था. इस फैसले ने आधार कानून के धारा 57 को ख़ारिज कर दिया और इस तरह निजी कम्पनियां लोगों का आधार नहीं मांग सकेंगी. यह एक छोटी सी राहत जरुर मिली है. लेकिन यह सबसे बड़ी समस्या नहीं थी.

आधार पर मूल विवाद यह था कि एक व्यक्ति की सारी जानकारी एक जगह इकठ्ठा होना और उसके बेजा इस्तेमाल की सम्भावना. खासकर राज्य के द्वारा. वह डर अब भी मौजूद रहेगा.

आधार अब भी हर जगह मौजूद रहेगा. इस फैसले के अनुसार सरकार के किसी स्कीम का फायदा लेना है तो लोगों को आधार बनाना पड़ेगा. इसके अतिरिक्त अगर आयकर जमा करना है तो आधार की जरुरत पड़ेगी. पैन कार्ड के लिए आधार अनिवार्य रहेगा. भारत के बमुश्किल एक प्रतिशत लोग ही होंगे जो इन सब श्रेणी में नहीं आते होंगे. इन चीजों को देखें तो यह स्पष्ट है कि अगर भारत में रहना है तो आधार की अनिवार्यता बनी रहेगी.

दूसरे अगर बैंक आधार नहीं माँगते है और पैन कार्ड का इस्तेमाल करते हैं तो बात घूम कर वही आ जाती है क्योंकि पैन कार्ड के लिए आधार अनिवार्य हो गया है अब.

आधार की वैधानिकता को लागातार चुनौती मिलती रही है और सर्वोच्च न्यायालय में इसको लेकर 27 याचिकाएं लगाई गयी थीं. इन याचिकाओं पर करीब चार महीने तक बहस चली थी.  इस बहस के बाद मई में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित किया.

आधार की वैधानिकता को लागातार चुनौती मिलती रही है और सर्वोच्च न्यायालय में इसको लेकर 27 याचिकाएं लगाई गयी थीं

इस फैसले के बारे में देश के जाने माने महिला वकील मिहिरा सूद ने ट्वीटर पर लिखा कि यह नागरिकों के स्वतंत्रता के खिलाफ जाता है. पैन कार्ड से आधार को जोड़ना कई समस्याओं की वजह बनेगा. इसी तरह वृंदा ग्रोवर ने भी फेसबुक पर लिखा कि कॉर्पोरेट और सरकार की जीत हुई है और जनता की हार.

आधार को लेकर लोगो की आशंका तब से है जब मनमोहन सिंह की सरकार ने इसे 2009 में शुरू किया था. तब बहुत सारे नागरिक अधिकार के लिए लड़ने वाले लोगों का मानना था कि इस डिजिटल सेवा का बड़े स्तर पर दुरुपयोग किया जा सकता है. इसलिए इसका विरोध इसके जन्म के साथ ही शुरू हो गया था.

जैसे कानूनी मामलों की जानकार उषा रामनाथन और कई अन्य लोगों ने चेतावनी दी थी कि इस कार्यक्रम की वजह से भारत के एक निगरानी राज्य में तब्दील हो जाने की सम्भावना है. यही बात संसद की एक स्टैंडिंग समिति ने भी दोहराई थी. इसके बाद न्यायलय में कई सारी याचिका डाली गई. नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने ने भी आधार की आलोचना की थी. अलबत्ता मोदी जब देश के प्रधानमंत्री बनकर आये तो उन्होंने न केवल आधार का दायरा बढ़ा दिया बल्कि शिद्दत से आधार को लागू करवाया. यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट लागातार सरकार को आधार का विस्तार करने से मना करता रहा. आज आलम यह है कि देश के सभी बैंको और मोबाईल कम्पनियों के पास करोड़ो लोगों का डेटा मौजूद है जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार नहीं होना चाहिए.

तो आधार के इस असंवैधानिक विस्तार में सरकार ने बड़ी भूमिका निभाई. अब देखना यह है कि क्या यह सरकार इन बैंको और मोबाईल कम्पनियों को इस डेटा को नष्ट करने को कहती है. सरकार के रुख को देखकर कहा जा सकता है कि इस डेटा को नष्ट कराने में सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं है.

विडम्बना यह कि लगभग सभी जजों ने डेटा की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई कि आधार डेटा का कुछ बेजा इस्तेमाल हुआ है. फिर भी अधिकतर ने आधार को संवैधानिक करार दिया.

इस फैसले की सबसे बड़ी उपलब्धि रही न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़ का अन्य चारों जजों के फैसले के एकदम उलट फैसला. उन्होंने अपने फैसले में आधार को ‘असंवैधानिक’ करार दिया. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा भी है.

पैन कार्ड को आधार से जोड़ने पर उन्होंने कहा कि यह इसलिए सही नहीं है क्योंकि आधार कानून ही असंवैधानिक है.

आधार पर सुनवाई के हिस्से की एक उपलब्धि में निजता का अधिकार भी आता है. याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायलय में निजता को अधिकार बताते हुए दावा किया था कि आधार उनके निजता का उलंघन करता है. यह तय करने के लिए की भारतीय नागरिकों के पास निजता का अधिकार है भी कि नहीं एक संवैधानिक पीठ गठित की गई और फैसला आम जनमानस के पक्ष में गया.

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