सन् 2008: भारत में क्रेडिट का प्रसार, दुनिया की आर्थिक मंदी और आधार की कल्पना

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फोटो: हाउसिंग.कॉम से साभार

जितेन्द्र राजाराम/

सन् 1999 के पहले तक भारत में घर खरीदने वाले व्यक्ति की औसत उम्र 49 वर्ष थी. यानि कि ज़्यादातर लोग रिटायर होने के बाद ही पूरे जीवन की गाढ़ी कमाई से बचाई गई बूँद-बूँद पूँजी जोड़ कर घर खरीदते थे. सन् 2006 में कॉल-सेंटर और आईटी क्रांति आने के बाद शहरी-भारत में मकान मालिकों की औसत उम्र 35 वर्ष हो गई. वजह थी निजी कंपनियों की आसानी से मिलने वाली नौकरी और भविष्य के सब्जबाग दिखाती सरकार.

भारत के आम जनों में कर्ज-संस्कृति की शुरुआत लगभग हो चुकी थी. अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने विश्व-व्यापारियों के लिए घरेलू बाज़ार खोले थे और शहरी उपभोक्ता इसकी चपेट में आ चुके थे. अब इन व्यापारियों की नज़र ग्रामीण उपभोक्ताओं पर थी.

लेकिन ग्रामीण बाजार में न तो बीपीओ थे और न ही आईटी क्रांति. लेकिन यह भी तथ्य था कि ग्रामीण उपभोक्ताओं को बिना साधे मुनाफे को अधिकतम नहीं किया जा सकता था. पर कैसे साधा जाए इसका कोई आसान तरीका नहीं नज़र आ रहा था.

इसके पीछे कई वजहें थीं. एक तो ग्रामीण व्यवस्था में शहरों की तरह नगद की आमद नहीं थी क्योंकि वहाँ रोजगार नहीं थे. दूसरे कर्जदारों के पास लोन चुकाने के लिए पैसा ना हो तो कम से कम बीमा हो ताकि कर्ज के डूबने की संभावना कमतर हो सके. लेकिन भारत की सबसे बड़ी और हर जगह मौजूद रहने वाली बीमा कम्पनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) भी शहरों में इतनी व्यस्त थी कि गाँव उसकी प्राथमिकता में नहीं थे. इसलिए खुले बाज़ार के मनमोहिनी रूप से प्रभावित नीति-निर्धारकों के लिए सबसे जरुरी कदम बना, बीमा कंपनियों को गाँव का रास्ता दिखलाना. ऐसे में बाज़ार ने चढ़ाई की और भारत सरकार ने जीवन बीमा में भी 49 प्रतिशत विदेश निवेश की छूट दे दी.

बीमा कंपनियों को भी नए बाज़ार की तलाश थी

प्रुडेंशियल, लोम्बार्ड, एर्गो, ये वो कंपनिया हैं जिनके बारे में हमलोग रोज सुनते हैं. इन्हीं कंपनियों ने एक सदी पहले टाईटेनिक जहाज का बीमा किया था. टाईटेनिक के डूबने के बाद इन कंपनियों को जहाज के मालिक को भारी-भरकम बीमा की राशि चुकानी पड़ी थी. वो भी इस हद तक कि ये कम्पनियाँ दिवालिया होने के कगार पर पहुँच गईं. लेकिन इससे ये हुआ कि दुनिया में लोगों को “बीमा” के फायदे समझ में आ गए. और इस तरह ये कंपनिया बीमा बाजार की बादशाह बन गईं.

दो-दो विश्व युद्ध के विजेता सयुंक्त राज्य अमेरिका के घर में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जो “बेबी बूम” का दौर आया. समृद्ध परिवारों में जो अप्रत्याशित जनसंख्या वृद्धि हुई. इस बहार की मोटी फ़सल इन बीमा कंपनियों के हिस्से गयी. पर पिछली सदी के आखिरी दशक आते-आते अमेरिका की वो पीढी रिटायर हो रही थी और उनको अपनी बीमा की रकम वापिस चाहिए थी. इस पैसे के लिए बीमा कंपनियों को नए बाज़ार की जरुरत थी.

दुनिया भर के देशों को अपनी अर्थव्यवस्था खोलने की नसीहत दी जा रही थी. भारत में पैसा बचाने और जमा करने की संस्कृति थी और इस जमा पैसे पर, उद्योगपतियों की नज़र. भारत ने भी इस नसीहत से अपने बाज़ार खोल दिए और बीमा कंपनियों में 49 प्रतिशत के विदेशी निवेश की छूट दे दी. इस तरह बीमा शार्क भारत में प्रवेश कर गए.

भारत सरकार जो अब तक लोगों को उनके नुकसान पर मुआवज़ा देती थी अब बीमा कंपनियों को यह काम सौंपने लगी और इस तरह फ़सल बीमा जैसे मुद्दे उछाले जाने लगे. अब तो स्वास्थ्य भी सरकार बीमा कराके ही देना चाहती है. उम्मीद यह थी कि ग्रामीण जगत भी बीमा शब्द से धीरे-धीरे अवगत होता रहे और इस ‘बीमा’ का प्रचार और प्रसार होता रहे.

बीमा और कर्ज का खेल

नियम से कर्ज देने वाली कंपनियों के लिए यह राहत की बात थी. गली-गली में बैंकों के ब्रांच खुल रहे थे. पर उधर बीमा और कर्ज की संस्कृति का वाहक अमेरिका ही मंदी के चपेट में आ गया. अमरीकी बैंकों ने इतने हाउसिंग लोन बाँट दिए थे कि सब के सब दिवालिया होने लगे. सिटी बैंक और लेहमान ब्रदर्स तो ऐसे फट पड़े जैसे लगा कि अमेरिका की पूरी अर्थव्वस्था को ही चपेट में ले लेंगे.

अमेरिका से जुड़े भारतीय उद्योग जैसे आईटी इंडस्ट्री, निजी बैंक, ये बीमा कम्पनियाँ, रियल इस्टेट इत्यादि सब प्रभावित होने लगे. सबसे बड़ी शिक्षा थी कि सिर्फ बीमा से कर्ज की उगाही नहीं हो सकती.

यह सीख सबसे पहले शायद भारत की सबसे सफल आईटी कंपनी ‘इनफ़ोसिस’ के नंदन नीलकेणी को समझ आई. इनफ़ोसिस भारत की पहली कंपनी थी जिसने अमेरिकी शेयर बाजार ‘नास्डैक’ में कारोबार शुरू किया था. इस कंपनी के एक सह:संस्थापक नीलकेणी ने अपनी पहली किताब “इमैजिनिंग इंडिया- यूनिवर्सल आइडेंटिटी नंबर” यानि की यू.आई.डी की कल्पना लिख डाली. इसकी परिभाषा में उन्होंने लिखा था की युआईडी की मदद से भिखारी से लेकर आतंकवादी तक कोई भी पैसों के लेन-देन में गोलमाल नहीं कर पायेगा. उन्होंने लिखा कि इससे भारत को चरमराती हुई व्यवस्था में पूँजी के निवेश के अवसर भी मिलेंगे, गाँव के लोगों को पहचान मिलेगी और आतंकवाद को रोकने में भी मदद मिलेगी.

चारों तरफ से घिरते जा रहे मनमोहन सिंह सरकार को मानो संजीवनी मिल गयी. इस तरह युआईडी यानि आधार कार्ड को प्रत्येक भारतीय पर थोपे जाने का संग्राम आरंभ हुआ. साल 2009 में युपीए सरकार की वापसी हुई और नंदन नीलकेणी को आधार कार्ड परियोजना का सरताज बनाया गया.

नरेन्द्र मोदी सरकार ने तो इसको ऐसा विस्तार किया कि देश का सुप्रीम कोर्ट भी मुंह बाए खड़ा रहा. उसके किसी आदेश को सरकार ने नहीं माना और आज आधार घर-घर पहुँच गया है.

एक अरब छः करोड़ आधार कार्ड बनाये जाने के बाद, नयी सरकार ने इसे बैंक से जोड़ दिया. सरकार की अत्यधिक समर्थित जियो डिजिटल लाइफ ने इसे मोबाइल नंबर से भी जोड़ दिया. इस तरह 2014 में शुरू हुई भारत सरकार की जैम योजना- JAM जनधन(J)-आधार(A)-मोबाइल(M)- मुकेश अम्बानी के जियो और विजय शेखर शर्मा के पेटीएम नाम की निजी कंपनियों की मदद से पूरी हुई. शायद अब कहने आवश्यकता नहीं है कि इस सरकार ने नोटबंदी जैसा निर्णय क्यों लिया.

आज जब न्यायालय ने निर्णय लेने में इतनी देरी कर दी और देरी के बाद भी निर्णय में कहा कि इससे गरीबों का भला हो रहा है तो यह समझने में कोई चूक नहीं होनी चाहिए कि यह कैसा ‘भला’ है.

(जितेन्द्र राजाराम  आजकल भोपाल में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं. आप उनसे उनके नम्बर 9009036633 पर संपर्क कर सकते हैं.)

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