अंग्रेज भारतीयों को सिविल सेवा की परीक्षा में क्यों नहीं बैठने देते थे, जानिये पूरी कहानी

0

उमंग कुमार/

इतिहास में एक समय ऐसा भी होता था कि भारत के लोगों को ही यहाँ के सिविल सेवा जिसकी आप आज के यूपीएससी से तुलना कर सकते हैं, में बैठने की इजाज़त नहीं थी. अंग्रेज अपने को सर्वोत्तम मानते थे और यह भी कि सिविल सेवा की नौकरी के लिए सिर्फ वही उपयुक्त हैं. गोरों ने भारतीय लोगों को इस सिविल सेवा की परीक्षा में बैठने से रोकने के लिए कई सारे तीन-तिकड़म लगाए पर आखिरकार उनकी हार हुई और धीरे-धीरे भारतीय लोग इस क्लास वन की नौकरी में शामिल होने लगे.

इस विषय की जानकारी दीपक गुप्ता की पुस्तक दी स्टील फ्रेम: अ हिस्ट्री ऑफ़ द आईएएस से मिलती है. यह पुस्तक रोली प्रकाशन से आई है. गुप्ता लिखते हैं कि भारतीयों को सिविल सेवा की परीक्षा में शामिल होने के लिए काफी पापड़ बेलने पड़े.

मज़ेदार यह है कि इसकी मांग सबसे पहले ब्रिटिश इंडिया कंपनी के ही अधिकारियों की तरफ से उठी कि भारत के लोगों को भी इस नौकरी में मौका दिया जाए. एल्फिनस्टोन और मुनरो नाम के अधिकारियों ने इसकी मांग रखी जिसके बाद कंपनी को अपने चार्टर एक्ट 1833 में संशोधन करना पड़ा. इसमें स्पष्ट किया गया कि किसी भी व्यक्ति को जाति, रंग या जन्मस्थान के आधार पर परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जाएगा.

एल्फिनस्टोन और मुनरो नाम के अधिकारियों ने इसकी मांग रखी जिसके बाद कंपनी को अपने चार्टर एक्ट 1833 में संशोधन करना पड़ा. इसमें स्पष्ट किया गया कि किसी भी व्यक्ति को जाति, रंग या जन्मस्थान के आधार पर परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जाएगा

लेकिन कानून बस कागज़ पर ही रहा और भारतीयों को अधिकतर निचले स्तर के न्यायिक पोस्ट से ही समझौता करना पड़ता था. जैसे मुंसिफ, सदर अमीन इत्यादि. बाद में उप-कलक्टर जैसे पदों पर भी कुछ लोग नियुक्त हुए.

यही समय था जब बंगाल में ‘पुनर्जागरण’ जैसा कुछ हो रहा था. वहाँ आन्दोलन हो रहे थे और लोगों का पढ़ाई-लिखाई की तरफ खासा रुझान था. देश में भी कॉलेज और विश्वविद्यालय खुल रहे थे. यहाँ से पढ़कर निकलने वाले युवाओं में क्लास वन की नौकरी पाने का शौक और जज्बा था. ये युवा अपनी आवाज बुलंद करने लगे.

फिर सन् 1854 में ब्रिटिश संसद में इस बात पर सहमति बनी कि सिविल सेवा के पोस्ट के लिए भी प्रतियोगी परीक्षा होनी शुरू की जायेगी. इससे भारतीयों को इस परीक्षा में भाग लेकर अंग्रेजों को चुनौती देने का मौका मिला.

समय का पहिया आगे बढ़ा और इस मुद्दे पर बहस होने लगी कि अंग्रेज और भारतीयों को बराबर मौका मिले. फिर प्रतियोगिता का सिलेबस, परीक्षार्थियों की अधिकतम आयु पर बहस होने लगी.

अंग्रेज भारतीय विद्यार्थियों के काबिलियत का लोहा मानते थे और इस बात से डरते थे कि अगर परीक्षा इमानदारी से कराई जाए तो गोरों का पलड़ा कमज़ोर पड़ जाएगा. एक बार लार्ड कर्जन ने माना था कि उच्च पद अंग्रेजों के लिए एक तरह से आरक्षित थे. वायसराय कर्जन ने यह भी स्वीकार किया था कि भारतीय अपनी प्रतिभा की वजह से धीरे-धीरे इस सिविल सेवा में भी अपनी पकड़ मजबूत करते जा रहे हैं. कर्जन ने इसे अंग्रेजी समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती बताई थी.

इन्हीं प्रतिभाशाली छात्रों को रोकने के लिए सिविल सेवा की परीक्षा लन्दन में कराई जाती थी. सिलेबस में संस्कृत और अरबी के लिए कम नंबर रखे गए थे

इन्हीं प्रतिभाशाली छात्रों को रोकने के लिए सिविल सेवा की परीक्षा लन्दन में कराई जाती थी. सिलेबस में संस्कृत और अरबी के लिए कम नंबर रखे गए थे. भारतीय लोग लगातार इसका विरोध करते रहे और यह मांग उठती रही कि सिविल सेवा की परीक्षा भारत और इंग्लैण्ड दोनों जगह हो. लेकिन अंग्रेज इसे मानने को तैयार नहीं थे और उनका तर्क भी बेशर्मी से भरा होता था जैसे भारतीय लोग किताबी कीड़ा होते हैं, बहुत नैतिक नहीं होते, बेईमान होते हैं और उनमें शासन करने के गुण नहीं होते.

अंग्रेजों के तीन तिकड़म का अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता है. सन्न 1864 में पहली बार एक भारतीय ने सिविल सेवा की परीक्षा पास की. उनका नाम था सत्येन्द्र नाथ टैगोर. उसी साल अरबी और संस्कृत के पेपर का कुल नंबर घटाकर 500 से 375 कर दिया गया. चार साल पहले यानी सन् 1860 में ही इसे 500 किया गया था. इस परीक्षा में बैठने की अधिकतम उम्र को घटाकर 22 साल से 21 साल कर दिया गया था.  सन् 1876 में इसे और घटाया गया और अब परीक्षा में बैठने की अधिकतम उम्र 19 कर दी गई.

अंग्रेजों के इसी रवैये की वजह से सन् 1900 में सिविल सेवा में भारतीयों का प्रतिनिधित्व महज 4.24 प्रतिशत था. इसमें से भी अधिकतर को न्यायिक कार्य में लगा दिया जाता था.

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जब महत्मा गांधी भारत आये तो स्वतंत्रता संग्राम ने जोर पकड़ा. इसी वजह से सिविल सेवा में भारतीयों की भागीदारी का मुद्दा कमजोर हो गया. लेकिन फिर भी अंग्रेजों पर दबाव तो था ही. अगस्त 1917 में अंग्रेजों ने घोषणा की कि शासकीय नौकरी में भारतीयों का प्रतिशत 33 किया जाएगा. उन्होंने आगे घोषणा की कि डेढ़ प्रतिशत की वृद्धि के साथ इसे दस साल में 48 प्रतिशत किया जाएगा. कई सालों से भारत में सिविल सेवा की परीक्षा कराने की मांग भी वर्ष 1922 में मान ली गई.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here