दशरथ मांझी क्या दशरथ दास कहलाना पसंद करते थे?

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अरुण सिंह/

अरुण सिंह

पिछले दो दिनों से दशरथ मांझी फिर से सुर्ख़ियों में हैं। लेकिन अपने काम की वजह से नहीं बल्कि दूसरे कारणों से। फेसबुक पर बहस भी चल रही है। दशरथ मांझी (बाद के दिनों में वे कबीरपंथी हो गए थे और खुद को दशरथ दास कहलवाना पसंद करते थे। उन्होंने एक टोपी भी बनवाई थी जिसपर दशरथ दास लिखा था। लेकिन जाति की राजनीति में डूबा समाज उन्हें मांझी ही कहता रहा।

उन्होंने 1982 के आसपास पहाड़ काटकर रास्ता बनाया था। उसके बाद से वे जिला मुख्यालय की दौड़ लगाते रहे। कोई उनके काम को देख ले। जिलाधिकारी को वे तैयार कर सके। उन्हें पुरस्कृत भी किया गया। इस खबर की एक कतरन जोकि तत्कालीन प्रतिष्ठित अखबार आर्यावर्त की थी- मैंने उनके पास देखी थी। एक कॉलम और 6-7 सेंटीमीटर की खबर। कहीं अंदर के पन्नों में छपी हुई।

जब मैं उनसे उनके गांव में पहली बार मिला तो वे हतप्रभ थे। उनसे उनके गांव जाकर मिलने वाला मैं पहला पत्रकार था। मेरी रिपोर्ट 1 जनवरी 1989 के धर्मयुग में छपी थी। प्रभात खबर के अपने कॉलम में मैंने दशरथ जी की कहानी फिर से लिखी। अगर आपमें धैर्य हो तो इसे पढ़ें। आपकी कई शंकाओं का समाधान हो जा सकता है।

वह 1988 के गर्मियों के दिन थे जब मैंने पहली बार दशरथ मांझी का नाम सुना था। जनशक्ति अखबार से सम्बद्ध पत्रकार मित्र पुरुषोत्तम ने उनके बारे में बताया था। सुनकर सहसा विश्वास नहीं हुआ था कि क्या कोई ऐसा भी व्यक्ति हो सकता है; जिसने अपनी पत्नी के लिए अकेले पहाड़ काट कर लंबा रास्ता बनाया, और इस काम में उसे बीसों वर्ष लगे।

पुरुषोत्तम ने सिर्फ इतना बताया था कि वह व्यक्ति गया जिले का रहने वाला है और बोधगया के सीपीआई विधायक बालिक राम उसको जानते हैं। मैं बालिक राम को ढूढ़ते हुए बोधगया उनके घर पर गया। वह घर पर नहीं मिले। निराशा हुई। उन दिनों मोबाइल का जमाना नहीं था। आस पास दशरथ मांझी के बारे में कोई बता नहीं पाया। निराश हो पटना लौट आया।

मैं उस अद्भुत व्यक्ति से मिलने के लिए बेचैन था इसलिए कुछ दिनों के बाद मैं दुबारा बोधगया के लिए निकल पड़ा। दिन भर मैं लोगों से यहां वहां पूछता फिरा। कई बार मुझे पूछने में भी संकोच होता था। क्योंकि शायद मैं भी इस खबर पर यकीन नहीं कर पा रहा था। कई बार लोग मेरा सवाल सुनकर हँसने लगते थे। शाम को मायूस होकर मैं महाबोधि मंदिर के पास एक ढाबे में बैठ गया। यहीं मेरी भेंट संघर्ष वाहिनी के सदस्य प्रदीप जी से हुई। मेरे गले में लटके कैमरे को देख उन्हें उत्सुकता हुई। मैंने उन्हें दशरथ मांझी के बारे में बताया।

उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की। कहा,’मैंने तो ऐसी कोई बात सुनी नहीं और इस इलाके में ऐसी घटना भी नहीं हुई है।’ लेकिन फिर भी मुझे उन्होंने आश्वस्त किया कि वे पता करेंगे। मैं वहीं बैठ कर उनका इंतज़ार करने लगा। करीब दो घंटे बाद वे लौटे। बताया, ‘हां पता चल गया है। ऐसा ऐसा है और ऐसी घटना भी हुई है। लेकिन इसके लिए आपको वापस गया लौटना होगा और फिर वहां से 40-45 मील आगे।’ उन्होंने बताया।

मैंने रात तिब्बत मोनेस्ट्री में काटी। सुबह एक घंटे के मोटर साइकिल के सफर के बाद मैं अतरी प्रखंड पहुंचा। कुछ लोगों से दशरथ मांझी के बारे में पूछता हूं। वे बता नहीं पाते। फिर एक छोटी सी दूकान में झिझकते हुए उनके बारे में पूछता हूं। झिझक शायद इसलिए कि अब तक मैं इस पर विश्वास नहीं कर पाया हूं। दूकानवाला मुझे विस्मय से देखता है, ‘क्या आप उससे मिलने आये हैं?’ फिर मुझे उसने रास्ता बताया।

थोड़ी देर के बाद मैं दशरथ मांझी की कुटिया के आगे था। एक बूढी औरत बाहर बैठ कर बर्तन धो रही थी। पूछने पर उसने अंदर की ओर इशारा किया। सामने जमीन पर एक 55-60 वर्ष का व्यक्ति बैठ कर रोटी खा रहा था। वे अकबकाये से मुझे देखते है। मैंने बताया कि मैं बाहर से आया हूं, पत्रकार हूं। उनके पहाड़ काटने की कथा सुनने, जानने आया हूं। बाहर के लोग भी जानना चाहेंगे। लौट कर अखबार में लिखूंगा। मैं उन्हें समझाता हूं। अब वे थोड़ा सहज दिखे।

‘हां, हमने ही पहाड़ी काट कर रास्ता बनाया है।’ उनके चेहरे पर मासूम सी मुस्कुराहट आती है, उसमें थोड़ी झिझक भी शामिल है -मानों किसी बच्चे ने गलती से कोई अच्छा काम किया हो और अब उसे स्वीकार करने में झिझक रहा हो। फिर वे अपनी छोटी सी कथा सुनाते हैं।

पहाड़ की तराई में बसे गेहलौर गांव में दशरथ मांझी पैदा हुए। पिता मंगरु मांझी खेत मजदूर थे। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी सो दशरथ मांझी पढ़ नहीं सके। बचपन से ही पिता के साथ खेतों में काम करने लगे। बड़े हुए तो पिता ने उनकी शादी फगुनी देवी के साथ कर दी।

मजदूरी कर दशरथ घर चलाते रहे। एक बार उन्हें पहाड़ के दूसरी ओर की घाटी में काम मिला। यह 1960 के आस पास की बात है। वे रोज मजदूरी करने उस गांव में जाते। पत्नी कलेवा (दोपहर का खाना) और घड़े में पानी लेकर उनके पास जाती। उस पार घाटी में जाने का एक ही रास्ता था -पहाड़ में डेढ़ फ़ीट चौड़ी एक दरार ! सारे लोग, जिन्हें उस पार घाटी के गांवों में जाना होता, उसी रास्ते से जाते थे। संकरा रास्ता होने के कारण लोगों को तिरछे हो कर उसमें से गुजरना होता था। इससे कई बार उनके बदन पर खरोचें भी लग जातीं।

एक दिन उनकी पत्नी उस संकरे रास्ते में फंस गयी। घड़ा फूट गया और उन्हें चोट भी आयी। रोती-बिसूरती, खाना लेकर अपने पति के पास पहुंची। उन्हें सारी बात बताई। उस दिन दशरथ मांझी को प्यासा रह जाना पड़ा। उस रात उन्हें नींद नहीं आयी। दिमाग में विचारों की आंधी चल रही थी और उससे एक नया निश्चय पैदा हो रहा था।

तब दशरथ जी ने बताया था, ”उस रात किसी ने कहा,’तुम्हें यह काम करना होगा।’

मैं चौंक कर जाग गया। आसपास कहीं कोई नहीं था। तब लगा, यह आवाज अपने ही अंदर की आवाज थी।”

सुबह हुई तो वे बदल चुके थे। एक दृढ निश्चय उनके अंदर पैदा हो चुका था – पहाड़ को काट कर पार जाने के लिए चौड़ा रास्ता बनाने का निश्चय ! वे चुपचाप उठे और पत्नी को बताये बगैर हथौड़ी उठा कर पहाड़ की ओर चले गये। वहीं चट्टान पर बैठ कर उन्होंने छेनी तैयार की और कटाई का काम शुरू किया। तीन-चार घंटे बाद वे वापस घर आ गये। पत्नी को इस बारे में कुछ भी नहीं बताया। नाश्ता कर खेतों में काम करने चले गये।

अगले दिन वे पहाड़ काटने के काम में जुट गये। गांव के लोग अब तक उन्हें पहाड़ काटते देख चुके थे। उनमें काना-फूसी होने लगी। किसी ने उनकी पत्नी को जाकर कह दिया कि तुम्हारा पति तो पागल हो गया है। पहाड़ को काट कर रास्ता बनाना चाह रहा है ! ऐसा कहीं हो सकता है भला !

उस दिन जब वे घर आये तो पत्नी ने झिड़का, ‘तुम पागल हुए हो क्या ? तुम्हीं को चिंता है रास्ता बनाने की ? और फिर यह दरार तो तबसे है, जबसे यह धरती बनी. तुम पागल मत बनो, चुपचाप जाकर खेतों में काम करो…’ जवाब में वे हंसकर रह गये।

अब यह उनकी दिनचर्या बन गयी। गांव के लोग उन्हें पागल कहने लगे। वे सुनते और हंसकर रह जाते। वे सुनते और हंसकर रह जाते। सूरज निकलने के पहले ही वे पत्थर काटने में लग जाते। तीन चार घंटे काटने के बाद वे खेतों में काम करने चले जाते।

अब यह उनकी दिनचर्या बन गयी। गांव के लोग उन्हें पागल कहने लगे। वे सुनते और हंसकर रह जाते।

चांदनी रात होती तो रातों में भी वे कटाई करते। धन की रोपाई के बाद जो खाली वक्त होता, वह भी इसी में बीतता। धीरे-धीरे उनके ‘पागलपन’ की चर्चा आस पास के गांवों में भी होने लगी। एक दिन पिता ने भी समझाना चाहा। तब दशरथ मांझी ने अपने पिता को कहा, ‘आज तक हमारा खानदान मजदूरी करता रहा है। मजदूरी करते-करते लोग मर गये। खाना-कमाना और मर जाना! इतना ही तो काम रह गया है। सिर्फ यह एक काम है, जो मैं अपने मन से करना चाहता हूं। आप लोग मुझे रोकिये मत, करने दीजिए।’

पत्नी भी समझाते-समझाते चुप हो गयी। वह अपने भोले-भाले पति के ‘पागलपन’ पर तरस खाकर रह जाती। दिन गुजरते गये, काम जारी रहा। लोगों को विस्मय होने लगा। सचमुच वहां धीरे-धीरे रास्ता बनता जा रहा था। मजाक बंद हो गया। लोग विस्मय के साथ वहां आते और उनका काम देखते। इसी बीच पिता मंगरू मांझी का देहावसान हो गया। जिस पत्नी के लिए पहाड़ी काट कर रास्ता बनाना शुरू किया था, वह भी गुजर गयीं। उस क्षण वे विचलित जरूर हुए, लेकिन फिर भी उनका काम चलता रहा। दिन-महीने-वर्ष बीतते गये।

धीरे-धीरे उस पहाड़ी में एक चौड़ा रास्ता शक्ल लेने लगा। दूर-दूर से लोग देखने आने लगे। कुछ लोगों ने मदद भी करनी चाही, लेकिन दशरथ मांझी ने नर्मतापूर्वक हाथ जोड़ दिये। इसी तरह निकल गए 15-16 वर्ष और-और निकल आया पहाड़ी में से रास्ता! दशरथ मांझी ने करीब साढ़े तीन सौ फीट लंबी और बारह फीट उंची पहाड़ी को काट कर, उसमें से सोलह फीट चौड़ा रास्ता बना दिया, लेकिन यह सब देखने के लिए उनकी पत्नी नहीं बची थीं- वही जिसके लिये उन्होंने रास्ता बनाना शुरू किया था।

मैं अपने सामने बैठे उस सीधे-सादे छोटे से कद के बूढ़े व्यक्ति को अपलक देखता हूं। ‘मुझे वह रास्ता नहीं दिखलाएंगे?’
वे उठते हैं और बगल में रखी खंती जमीन खोदने का औजार, जिसे वे हमेशा अपने पास रखते हैं उठाते हैं। वह जगह वहां से बहुत ज्यादा दूर नहीं थी। रास्ते में कई लोग मिलते हैं। उनके साथ मुझे देखकर उन्हें विस्मय होता है। थोड़ी चढ़ाई पर वह रास्ता दिखता है। मानव की दृढ़ इच्छा शक्ति का इससे बड़ा नमूना शायद दूसरा नहीं होगा। लोग उस रास्ते से हो कर आ जा रहे हैं। औरतें उस पार घाटी से लकड़ियां लेकर इसी रास्ते आती दिखती हैं। कुछ लोग हमारे पास आकर रुकते हैं, दशरथ मांझी को श्रद्धा के साथ प्रणाम करते हैं। कहते हैं, ‘यह रास्ता अकेले साधुजी (लोग उन्हें श्रद्धा से ‘साधु जी’ कहते हैं) ने काट कर बनाया है।’

उनमें से एक बुजुर्ग बताते हैं, ‘कलेक्टर साहब भी एक बार यह रास्ता देखने आये थे। उन्होंने अपनी जीप इस रास्ते पर चलायी थी। जीप से ही वे उस पार घाटी में गये थे।’

मैं दशरथ मांझी को देखता हूं। वे धीरे से मुस्कुराते हैं- ‘यह बाहर शहर से आये हैं, बहुत फोटो लिया है सनीमा में दिखाएंगे।’

‘लेकिन मैं सिनेमा से नहीं आया हूं।’ मैं धीरे से कहता हूं।

मैं उनके साथ उस रास्ते पर चलता हूं। वे बताते हैं कि कैसे, कहां से उन्होंने काटना शुरू किया, कहां पत्थर काटने में बहुत ज्यादा वक्त लगा, कहां रास्ता और चौड़ा होना चाहिए था और अब इस पर सड़क कैसे बननी चाहिए। रास्ता पार कर हम घाटी की ओर उतरते हैं। वे इशारे से बताते हैं कि वहीं सामने वे मजदूरी करते थे। वहीं उनकी पत्नी उनके लिए रोटी ले कर जाती थी। हम एक चट्टान के पास रुकते हैं। चट्टान पर छेनी से पहाड़ी काटने का विवरण लिखा है। वे उस पर हाथ रख कर बताते हैं, ‘यह देखिए सारा कुछ इस पर लिखा हुआ है।’

मैं पूछता हूं , लेकिन आपका नाम तो कहीं है ही नहीं, जबकि आपने ही रास्ता बनाया है। वहां तो सिर्फ मिस्त्री, जिसने लिखा है, उसका नाम है!’

‘नहीं, मेरा नाम भी जरूर लिखा होगा यहां पर।’ वे हाथ के इशारे से बताते हैं। लेकिन उनका नाम नहीं था। तब लगा हम कितने चालाक लोग हैं, अवसर का लाभ उठाने से जरा भी नहीं चूकते!

हम पहाड़ी से नीचे उतर कर गांव में आते हैं। सामने एक छोटी-सी चाय-पान की दुकान दिखती है। वहीं रुकते हैं। मैं चाय पीना चाह रहा था। मैं दशरथ जी को चाय के लिए कहता हूं। वे दूकान मालकिन के पास चाय के लिए कहने जाते हैं। बगल में, थोड़ी दूर पर एक पेड़ के नीचे बच्चों की कक्षा चल रही है। एक मास्टर बच्चों को पढ़ा रहे हैं।
‘अभी यहां चाय नहीं मिलेगी। चाय सिर्फ सुबह बनती है। दिन में तो यहां कोई चाय पीता नहीं है, इसलिए।’ दशरथ जी लौट कर बताते हैं, ‘लेकिन थोड़ा सुस्ता लीजिए, तब जाइएगा, अभी बहुत धूप है।’

दशरथ मांझी ने बच्चों को पढ़ा रहे मास्टर की ओर इशारा करके कहा, ‘मास्टर साहब कह रहे थे कि कोई फरहाद हुआ था सतयुग में। जिसने अपनी प्रेमिका के लिए पहाड़ काट कर नहर बनायी थी। शायद, उसकी प्रेमिका का कहना था कि जो पहाड़ काट कर नहर बनायेगा, वह उसी से शादी करेगी। फरहाद उससे प्रेम करते थे। इसलिए उन्होंने पहाड़ काट कर नहर बनायी, लेकिन सुनते हैं कि किसी दुश्मन ने फरहाद को शीरीं के मरने की गलत खबर दी। सुनकर वे पहाड़ से कूद कर मर गये, और जब शीरीं को फरहाद के मरने की खबर मिली तो वह भी शोक में मर गयी। यह सच है क्या?’ वे मुझसे पूछते हैं।

‘हां, मैंने भी सुना है…..

‘अच्छा बताइये, आपने भी तो अपनी पत्नी के लिए पहाड़ी काटना शुरू किया था। वे बीच में ही मर गयीं। जब वे ही नहीं रहीं, तब भी आपने कटाई बंद क्यों नहीं की?’

‘हां, मेरी पत्नी जब मरीं, तो मैं बहुत दुखी हुआ था। मुझे लगा, जब वे ही नहीं रहीं, तो पहाड़ क्यों काटूं? लेकिन फिर मुझे लगा मेरी पत्नी नहीं रही तो क्या हुआ? रास्ते के बन जाने से कितने लोगों की पत्नियों को फायदा होगा! हजारों-लाखों लोग इस रास्ते से आयेंगे जाएंगे।’ वे सीधे-सादे शब्दों में बहुत गहरी बात बोल गये।

‘साधूजी-साधूजी’ वह छोटी बच्ची फिर आयी, मां चाय बना रही है। कहती हैं, ‘परदेशी’ हैं, दूर जाना होगा। चाय पी लें, तब जायें।’

अपने लिए ‘परदेशी’ शब्द मैं पहली बार सुन रहा था। सुनकर अजीब-सी अनुभूति हुई।

बच्चों की कक्षा शायद खत्म हो गयी। मास्टर साहब उठ कर इधर ही चले आ रहे हैं। उन्होंने साधु जी को नमस्कार किया। मेरी ओर सवालिया निगाहों से देखा।

‘यह बाहर से आये हैं। इन्होंने पहाड़ का फोटो लिया है, मेरा भी। ‘सनीमा’ में दिखाएंगे।’ साधुजी मेरा परिचय करवाते हुए बताते हैं। पता नहीं वे क्यों मुझे सिनेमावाला समझ रहे हैं। शायद मेरे गले में लटके कैमरे और जूम लेसों की वजह से। मैं मास्टर साहब को स्वयं अपना परिचय देता हूं।

‘जरूर लिखिये, इन्होंने बहुत बड़ा काम किया है। मालूम है, इस रास्ते के बन जाने से सरकार को कितनी बचत होगी? वजीरगंज से गेहलौर की दूरी 50 मील की थी। इस रास्ते से वह घटकर सिर्फ 8 मील रह गयी है। 42 मील का फासला एकदम से कम हुआ।’

मास्टर साहब ने एक नयी जानकारी मुझे दी। तब तक चाय आ जाती है। हम चाय पीते हैं। दुकानवाली चाय के पैसे नहीं लेती है। मैं दशरथ मांझी से विदा लेता हूं।

यह रपट हिन्दी की मशहूर साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग 1 जनवरी 1989 के अंक (टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह की पत्रिका, जो बंद हो चुकी है) में छपी। कुछ दिनों के बाद इसका मराठी अनुवाद महाराष्ट्र टाइम्स में छपी। यह अनुवाद वासुदेव दशपुत्रे नाम के एक सज्जन ने किया था। उन्होंने दशरथ मांझी की आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारी हासिल की। उन्होंने दशरथ मांझी के लिए 50 रूपये का मनीऑर्डर भी भेजा। उसके बाद मैं यह देख विस्मित हो गया था कि हिन्दी भाषी क्षेत्रों से ज्यादा प्रतिक्रिया महाराष्ट्र में हुई। जलगांव, पुणे, नासिक, मालेगांव, नीमगांव के लोगों में दशरथ मांझी के लिए अद्भुत श्रद्धा और उत्कंठा पैदा हो गयी थी। इसके बाद काफी दिनों तक मेरे पास दशरथ मांझी के लिए 20, 25, 50, 100 रूपये के मनीऑर्डर आते रहे। मैं दशरथ जी का इंतज़ार करता। वे पटना आते तो मैं उन्हें उनके मनी आर्डर की राशि दे देता।

दशरथ मांझी अब धीरे धीरे मशहूर होने लगे थे। उन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया शैशवास्था में था। न्यूज़ चैनल इतने लोकप्रिय नहीं हुए थे। अखबार तो पढ़े ही जा रहे थे, पत्रिकाएं भी खूब पढ़ी जा रही थीं। अखबार तो खैर अभी भी पढ़े जा रहे हैं, पत्रिकाओं के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है।

दशरथ मांझी को अख़बारों और पत्रिकाओं के माध्यम से खूब प्रसिद्धि मिलने लगी थी। अख़बारों और पत्रिकाओं की कतरनों को वे बड़े जतन से एक प्लास्टिक की शीट में जमा कर रखते थे। वे अख़बारों, पत्रिकाओं के दफ्तरों के चक्कर लगाने लगे। वे चाहते थे कि किसी तरह बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद से उनकी भेंट हो जाय। वे उन्हें उस रास्ते के बारे मे बताना चाहते थे और चाहते थे कि सरकार उस पर पक्की सड़क बना दे ताकि लोगों को आने जाने में आसानी हो। एक पत्रकार ने उनकी मुलाकात लालू प्रसाद से करवा दी।

लौटे तो बहुत खुश थे। लालू जी ने सड़क बनाने का आश्वासन दिया था और सात एकड़ जमीन भी दी थी। बाद में पता चला कि वह जमीन बंजर थी। दशरथ ने एक भेंट में कहा था, ‘हमने तो लालू जी से अपने लिए तो कुछ नहीं कहा था। हमने सड़क के लिए कहा था। जमीन उन्होंने खुद दी। लेकिन जमीन भी दी तो बंजर।’ बाद में उस जमीन पर उन्होंने अस्पताल बनवाने का प्रयास किया।

दशरथ जी से जब मैं पहली बार मिला था तो एक जिज्ञासा हुई थी – क्या दशरथ इतिहास में दर्ज हो सकेंगे !

उन्हीं दिनों से कोलकाता से राजकमल सारथी नाम के एक फिल्म निर्माता दशरथ मांझी को खोजते हुए उनके गांव पहुंचे। वे उनपर फिल्म बनाना चाहते थे। दशरथ उन्हें लिए हुए पटना चले आये। वे करीब दो वर्षों तक इस प्रयास में जुटे रहे। वे पटना के जिस होटल में ठहरते, दिन भर कलाकारों का जमघट लगा रहता। वहां स्वर्गीया नूर फातिमा और स्वर्गीया रत्ना भट्टाचार्य भी होती थीं। रत्ना ने बाद में पटना दूरदर्शन द्वारा दशरथ मांझी पर बनाये गए डाक्यूमेंट्री में उनकी पत्नी फागुनी का अभिनय भी किया था। करीब दो वर्षों के बाद उस फ़िल्म निर्माता का आना बंद हो गया।

उस दिन की भेंट आखिरी भेंट होगी, यह मुझे पता नहीं था। बुद्धमार्ग पर एक चाय की दूकान पर वह दिखे। वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से जनता दरबार में मिल कर आ रहे थे। वे बहुत प्रसन्न दिख रहे थे। मुख्यमंत्री ने उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठा कर सम्मानित किया था। बताने लगे – मुख्यमंत्री जी ने रास्ते पर सड़क बनाने की अनुमति दे दी है। अस्पताल भी बनेगा। जल्दी ही शिलान्यास के लिए चलेंगे। उनकी छोटी छोटी ऑंखें खुशी से चमक रही थी।

इसके कुछ ही दिनों के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पत्नी का देहांत हो गया। दशरथ उनके गांव कल्याणबिगहा पैदल ही ले गए। (एक बार वह दिल्ली भी पैदल चले गए थे। कहा था, ‘लोग कहते हैं कि दिल्ली दूर है। हमने भी सोचा, चलो देखते हैं, दिल्ली कितनी दूर है। सो हम पैदल ही दिल्ली चले गए।’) लौट कर आये तो कुछ दिनों के बाद बीमार हो गए। पता चला उन्हें कैंसर है। कुछ दिनों के बाद उनका निधन हो गया।

बाद के दिनों में दशरथ मांझी कबीरपंथी हो गए थे। वे चाहते थे कि लोग उन्हें दशरथ दास कहें। उन्होंने एक टोपी भी बनवाई थी, जिस पर उनका नाम दशरथ दास लिखा था। लेकिन अज्ञात कारणों से लोग उन्हें मांझी ही कहते रहे।
दशरथ मांझी अद्भुत जीवट वाले व्यक्ति थे। मैंने कभी उन्हें खाली नहीं देखा। वे एक ऐसी मोमबत्ती थे जो दोनों सिरों से जल कर रौशनी बिखेर रहे थे। उन्हें पेड़, पौधे लगाने का भी बहुत शौक था। उनके लगाये न जाने कितने पौधे अब पेड़ बन गए होंगे। कभी उन्हें अपने इलाके में चापाकल लगवाने की चिंता होती, तो कभी अस्पताल बनवाने की। कभी पुल बनवाने की बात करते तो कभी बिजली पहुँचाने की। अपने परिजनों की चिंता में घुलते मैंने उन्हें कभी नहीं देखा। यद्यपि उनका एक मात्र बेटा अपंग है और बेटी विधवा।

दशरथ जी नहीं रहे। उनके सपने अब भी हैं। मरते वक्त भी उन्हें अपने सपनों की ही चिंता रही होगी। दशरथ जी से जब मैं पहली बार मिला था तो एक जिज्ञासा हुई थी – क्या दशरथ इतिहास में दर्ज हो सकेंगे ! इसका उत्तर मुझे मिल गया। दशरथ जनश्रुतियों का हिस्सा बन गए हैं। बरसों बाद जब भी कोई दशरथ मांझी की चर्चा करेगा तो मैं भी कह सकूंगा हां, मैं उस महामानव से मिल चुका हूं।

(अरुण सिंह, हिन्दी खोजी पत्रकारिता की एक बहुत ही प्रतिबद्ध आवाज हैं. उन्होंने यह पोस्ट फेसबुक पर लिखा था.)

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