न्यू ईयर रिजॉल्यूशंस: तुम अपनी ही आग में ख़ुद को जला देने के लिए तैयार रहो

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जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे और डेनिश दार्शनिक किर्केगार्ड

“तुम अपनी ही आग में ख़ुद को जला देने के लिए तैयार रहो। तुम नये कैसे हो सकते हो यदि तुम राख में तब्दील नहीं हुए”-न्यू ईयर रिजॉल्यूशन्श की परंपरा पर जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे और डेनिश दार्शनिक किर्केगार्द की सलाह

 गार्गी मिश्रा/

गार्गी मिश्रा

न्यू ईयर रिजॉल्यूशंस लेने की परंपरा कम से कम 4,000 साल पुरानी है। प्राचीन बेबीलोनियंस नए साल का जश्न सूर्य देवता मर्दुक के पुनर्जन्म के रूप में मनाते थे जो वसंत में जौ बुवाई के मौसम में होता था। ‘अकीतू’ बारह दिन का उत्सव  हुआ करता था जिसमें राजा अपने कर्तव्यों की एक विस्तृत सूची को पूरा करने का वादा करता था। राजा की प्रतिबद्धता को एक प्रतिज्ञा में बदलने के लिए बड़ा पुजारी राजा को एक ज़ोर का थप्पड़ मारता था जिससे राजा की आंखों से आंसू निकल आते थे। इसे प्रमाण के रूप में देखा जाता था कि राजा अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित है। यह प्रक्रिया राजा को याद दिलाती थी कि राजा को सदा विनम्रता धारण किये रहना है। इसी उत्सव का अंग होते हुए बाक़ी की प्रजा भी राजा के साथ यह शपथ लेती थी कि वह देवताओं और राजा के प्रति निष्ठावान रहेगी और जल्द से जल्द अपने कर्ज़ चुकाएगी।

एक शोध के अनुसार हर साल अमेरिका की आधी से ज्यादा आबादी न्यू ईयर रिजॉल्यूशन्स लेती है जिनमें से 10 प्रतिशत से भी कम आबादी उन रिजॉल्यूशंस को पूरा करने में सफल होती है। आंकड़ों में कुछ कमी-बेशी के साथ यही हाल सारी दुनिया का है। पर सामान्यतः हम न्यू ईयर रिजॉल्यूशंस को सर्दी के मौसम के बीतते बीतते भूल जाते हैं। शायद ज़िंदगी हमें किसी दूसरी राह पर ले जाती है। शायद हम ध्यान देना बंद कर देते हैं। शायद हम हार जाते हैं।

न्यू ईयर रिजॉल्यूशंस का अपना एक सम्मोहन है लेकिन इससे पहले कि हम ऐसे वादे ख़ुद से करें जिसके पूरे होने की संभावना बहुत कम है क्यूं न हम कुछ अन्य उपायों के बारे में बात करें।

एक शोध के अनुसार हर साल अमेरिका की आधी से ज्यादा आबादी न्यू ईयर रिजॉल्यूशन्स लेती है जिनमें से 10 प्रतिशत से भी कम आबादी उन रिजॉल्यूशंस को पूरा करने में सफल होती है

नए साल पर लिए जाने वाले न्यू ईयर रिजॉल्यूशन को तोड़ने के लिए भी कई बार मन में इच्छा होती रहती है। कोई संकल्प न होने को लोग ऐसे तर्कों से न्यायसंगत बनाते हैं- जीवनरूपी प्रवाहमान नदी के साथ बहते जाने की इच्छा, जैसे मनुष्य हो धरा पर पड़ा ख़ुशी से बुदबुदाता कोई पत्ता इत्यादि।

लेकिन डेनिश दार्शनिक किर्केगार्ड का तर्क था कि इस तरह के रूपक भ्रामक हैं। किर्केगार्द का कहना है – “हम एक पत्थर के समान हैं जो पानी में फेंके जाने पर कुछ क्षणों के लिए डूबता उतराता है लेकिन जैसे ही पानी में कंपन बंद होती है वह तुरंत गहरे पानी में डूब जाता है।” प्रतिबद्धताओं के अभाव में एक जोख़िम साथ लगा रहता है कि कहीं हम एक अस्तित्वविहीन खाई में न गिर जाएं। एक जीवन जिसमें कोई उद्देश्य न हो वह हमें चिंताग्रस्त करता है। किर्केगार्द के अनुसार एक अर्थपूर्ण जीवन वह है जिसमें हम पूर्णता में जीने के लिए सक्रिय रूप से स्वयं को दृढ़ रखते हैं।

नए संकल्प लेना अच्छा है लेकिन उन पर कायम रहना हमेशा एक चुनौती है। जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे का कहना है कि मनुष्य को जो चीज़ जानवरों से अलग करती है वह है मनुष्य की संकल्प शक्ति। वादे करना मानवता का मूलभूत स्वभाव है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति भविष्य में बनने वाला व्यक्ति है भी और नहीं भी। यह एक हद तक भ्रामक है। कुछ ठोस बातों पर विचार करते हैं। क्या हम अगले साल भी वही व्यक्ति होंगे जो आज की तारीख़ में हैं? शायद, नहीं। शायद हमारे बाल सफेद होने लगें, झुर्रियां पड़ने लगें, आवाज़ और गहरी हो जाए, जोड़ों में दर्द उठने लगे। हो सकता है हमारी शारिरीक विशेषताएं निष्पक्ष रूप से बदलें। यह भी संभव है कि हमारी भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक पहचान भी बदल जाए। हो सकता है हमें नई नौकरी, नया दोस्त, नया शौक या नया थेरेपिस्ट मिल जाए। एक वादा एक अनिश्चित भविष्य के लिए दावा करने जैसा है। यह आने वाले वक़्त में ख़ुद को सुरक्षा के साथ प्रस्तुत करने जैसा है जिसमें हमारी प्रतिबद्धता की रक्षा असंभव हो सकती है। यह किसी की पहचान को सरंक्षित या बाध्य करने का भी साधन है। एक ‘मैं’ को बाध्य करना जो कि “मैं वादा करता हूं” में है।

जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे और डेनिश दार्शनिक किर्केगार्ड

नीत्शे पूछते हैं – क्यों एक अमानुष पशु वादे नहीं करता? अधिकांश पशुओं में यह अवधारणा नहीं होती कि उनकी ख़ुद की एक पहचान है। हां कुछ जानवरो को अपराध बोध महसूस हो सकता है लेकिन वह अपराध बोध सामान्य तौर पर एक वादे को पूरा न कर पाने या तोड़ने के बराबर नहीं होता। वादों को तोड़ने से वे शर्मसार नहीं होते। नीत्शे का सुझाव है कि हमें संकल्प लेने चाहिए, ह्रदय से, ईमानदारी से, ईश्वर को साक्षी मान कर, वरना हम मनुष्य भी जानवरों की फेहरिस्त में गिने जाएंगे।

नीत्शे यह नहीं कहते कि हमें अपने संकल्पों को पूरा करना ही चाहिए। कभी-कभी और कई बार ऐसा करना मुश्किल होता है। यदि हम बेहद दृढ़ और हठी नहीं है तो हर वादे को पूर्णता में पूरा न कर पाना सामान्य बात है जो कि अच्छा नहीं है। उदाहरण के तैर पर फर्ज़ कीजिये कि आप अपना वज़न घटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं लेकिन होता यह है कि यदि आप दो घंटे से ज्यादा भूखे रह जाएं तो आप का ब्लड प्रेशर गिरने लगता है। तो इस स्थिति में यह एक महान संकल्प नहीं था। या फिर आप लोगों से मिलने-जुलने के बजाए,अपने करियर पर ध्यान केंद्रित करने का संकल्प लेते हैं लेकिन हर सुबह आप अपने पसंदीदा कैफे में अपने प्रिय व्यक्ति के साथ पाए जाते हैं तो इस स्थिति में भी ऐसे संकल्प कमज़ोर साबित होते हैं।

नीत्शे का सुझाव है कि हमें संकल्प लेने चाहिए, ह्रदय से, ईमानदारी से, ईश्वर को साक्षी मान कर, वरना हम मनुष्य भी जानवरों की फेहरिस्त में गिने जाएंगे

नई जानकारी के साथ आप को कुछ प्रतिबद्धताओं को छोड़ने की आवश्यकता हो सकती है। इसके लिए ख़ुद को दोषी महसूस करने की ज़रूरत नहीं है। स्व का प्रकृतवादी दृष्टिकोण यही है कि हम स्वयं को उस विचार से बाध्य न करें जो अतीत में हमने अपने लिए सोचा था। स्व प्रवाहमान है। वह बढ़ रहा है और सदैव बदल रहा है। प्राकृतवादी “स्व” वह है जो बार-बार स्वयं को ख़त्म करने और फिर से ख़त्म करने के लिए तैयार है। नीत्शे के सबसे प्रसिद्ध नायक ज़रथुष्ट्र कहते हैं – “तुम अपनी ही आग में ख़ुद को जला देने के लिए तैयार रहो। तुम नये कैसे हो सकते हो यदि तुम राख में तब्दील नहीं हुए।”

एक अस्तित्ववादी के लिए, ‘अपनी ही आग में ख़ुद को जलाना’, अपने द्वारा किए गए वादे को पूरा न करना, एक बुरे विश्वास का संकेत हो सकता है। ‘बुरा विश्वास’ एक ऐसी स्थिति है जिसमें आप तत्कालिक स्वतंत्र इच्छा का त्याग करते हैं जो आपके नियंत्रण में होती है। बुरा विश्वास बुरा इसलिए है क्योंकि यह मनुष्य की कट्टरपंथी आज़ादी को नकारता है। कट्टरपंथी आज़ादी का मतलब यह है कि हम वादों को रखने और तोड़ने दोनों के लिए ज़िम्मेदार हैं। हमारे संकल्पों की भंगुरता ही उन्हें अर्थपूर्ण बनाती है।

“तो आगे बढ़ो संकल्प लो। तुम्हें संकल्प लेने का अधिकार है। और तुम्हारे पास उन संकल्पों को तोड़ने का भी अधिकार है। लेकिन तुम्हें वे संकल्प देर रात नशे में डूब कर नहीं लेने की ज़रूरत नहीं है और यही तुम्हारे बाक़ी के सुंदर जीवन के लिए है।” – नीत्शे

(यह लेख , ‘द पैरिस रिव्यू’ मैग़ज़ीन में न्यू ईयर रिज़ॉल्यूशन्स पर जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे और डेनिश दार्शनिक किर्केगार्ड के विचारों पर अधारित जॉन काग और स्काई सी क्लीयरे के लेख से प्रभावित है)

(गार्गी मिश्रा, अपने नामार्थ के अनुरुप ही, विदुषी है। विभिन्न विषयों पर लिखते हुए गार्गी नए किस्म का आस्वाद पैदा करती हैं। चीजों को उनकी सूक्ष्मता में अवलोकित करता हुआ उनका गद्य नया नजरिया भी प्रदान करता है।)

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