सदा आनन्द रहे एहि द्वारे: सबका आनंद चाहने वाली वह होली गायब हो रही है

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श्रीधर दूबे/

आज मन फिर झुरुकती पुरुआ के लय पर विहरते-विहरते उस अमराई की ओर चला गया जो गाँव के ठीक पूरब लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर था। मार्च के बाद की स्कूली परिक्षायें ख़त्म होने के बाद से आम के पकने तक का समय उसी

श्रीधर दूबे

बाग में ओल्हा-पाती (पेड़ की टहनियों पर खेले जाने वाला खेल, चिक्का-कबड्डी आदि देशी खेल खेलते बीतता था। आम का वह बाग इतना बड़ा था की पूरब से उगता हुआ सूरज बाग के उस पार से ही उगता हुआ जान पडता था। उगते दिन के बाद दोपहर कब होती और कब दोपहर से साँझ हो जाती, खेल-खेल में इसका अन्दाजा भी नहीं लगता। उन दिनों जेठ की तपती धूप और लू के थपेड़े भी सह्य थे। बाग में ही खेलते-खेलते प्यास के मारे कँठ सूख जाता और सूखे कँठ को बाग के बलग में बने कुए के जल से तर किया जाता।

मेरे और मेरे गवई दोस्तों को फागुन के आने की असल सूचना उसी बाग के पेडों पर मँजरित आम्र-मँजरियों से मिलती थी। कभी-कभी तो आम में मँजरियाँ जिन्हें हम लोग अपनी गवई भाषा में बौर कहते थे, वो इस तरह से आते की उन बौरो से आम की पत्तियाँ तक ढँक जातीं। उन्हीं बौरों से भीनी हुई गन्ध से सारा बाग महकता रहता। ऐसे ही किसी बाग की सुषमा पर कवि महेन्दर मिसिर का मन भी रीझा होगा और रीझ-रीझकर गाया होगा।

अमवा मउरि गईले।

नेहिया बउरि गईले॥

बगिया भईल लरकोर हो रामा।

चईत महिनवा॥

फागुन और चैत के महीने बड़े विरही महीने होते थे। मन उन्मन उन्मन रहता। चित्त की दशा भी किसी विरहन जैसी ही बेदशा हुई रहती। भीतर ही भीतर कुछ टूटता रहता पर उस टूटने की असल वजह पता नही लगती। असल कहें तो उस समय में  मन की दशा अपनी नाभि में छिपे कस्तूरी गँध से अकुलाये मृग जैसी ही होती थी। पेड़ों के पुराने पत्ते आहिस्ते आहिस्ते झरने लगते और पेड नग्न होकर फिर से नई नई फुँनगियों से लद-बद होने की तैयारी में जुट जाते। आम और महुए की सँगत में फगुनहट बयार गवँई रिश्तों में नया रँग भर देती थी। वही रँग होली या फाग का असल रँग होता था। उसी रँग में डूबकर बूढ़ी औरतें भी अपने देवरों सँग हँसी ठीठोली कर यौवन के स्पर्श से पुनः अतिरँजित हो लेती थीं। होली की हुडदँग से सुबह से शाम तक गाँव में चाँचर मची रहती।

एक समय था जब गाँव में बसंत पँचमी के बाद से ही फगुआ का चटख रँग दिखने लगता था। उस रँग से सिर्फ देह ही नहीं मन भी रँग जाता था। गाँव में रिश्ते की भौजाईयों की हँसी-ठीठोली से कभी-कभी तो झेप जाना पड़ता था। जगह-जगह होली के गीत सुनाई देते। उस महीने में होली की जो खुमारी लोगों पर चढ़ती थी वह गँवई रिश्तों को भी उनका खोया हुआ रँग वापस दे देती थी। आपस के सारे मन-मुटाव व रँजिशों को भुलाकर घर-घर होली गाई जाती। फगुआ गाने वालों की मँडली गाँव के हर घर के दरवाजे-दरवाजे  जाकर फगुआ गाती और हर दरवाजे पर सदा आनन्द रहने की मँगलकामना करती।

सदा आनन्द रहे एहि द्वारे

मोहन खेलें होरी हो

एक ओर खेंलें कुँवर कन्हैया

एक ओर राधा गोरी हो

उड़ा गुलाल लाल भय बादल

रँग उड़े चहुओरी हो

सदा आनंद रहे एहि द्वारे

मोहन खेलें होरी हो॥

बसंत पँचमी के ही दिन से गाँव में हर रोज शाम को फगुआ गाया जाना शुरू होता और् होली आने के दिन तक पूरे एक महीने गाया जाता। हर एक दिन अलग-अलग घर के दरवाजे पर लोगों का जुटान होता और झाँझ-मँजिरे के साथ होली गाई जाती। एक-एक कर गाँव के हर घर के दरवाजे पर लोग जुटते और फगुआ गाते। किसी दुख वाले घर के अलावा कोई भी घर इससे अछूता नहीं रहता।

शिवरात्रि के बाद होली का यह रँग और भी सूर्ख हो जाता। हम सब गँवई बच्चों का उल्लास भी देखने लायक होता था। सब के सब गाँव के पूरब हर साल जलाई जाने वाली सम्मति में जलाने के लिए गाँव में घूम-घूमकर लकड़ी और गोईठी माँगते और चिल्ला-चिल्लाकर गाते।

पाँच दे पँच गोईठी दे।

अपने भतारे के मौसी दे॥

होली के ठीक एक रोज पहले जिस दिन गाँव में सम्मति जलाई जाती उस दिन नाईन घर-घर घूमकर लोगों को उबटन लगाती, और उस उबटन से उपजी हुई मैल को ले जाकर जलते सम्मति में डाल दिया जाता। उस मैल को जलाने का मतलब होता था बीते साल देह व मन पर पड़ी मैल को छुडा-छुडाकर आग में भस्म कर देना। चाहे कितनी भी पुरानी रँजिश क्यों न हो लेकिन होली के रोज ये सब भुलाकर लोग एक दूसरे के घर जाते। फगुआ की टेर में टेर लागाते और फिर अबीर-गुलाल लगाकर एक-दूसरे के गले लगते।

उस समय के कुछ लोगों को अगर आज के समय के लोगों के पासँग रखकर देखता हूँ तो वे लोग मुझे किसी और ही देश-दुनिया के लोग मालूम पडते हैं। ऐसा लगता है की उन लोगो की देह व उनका मन किसी और ही माटी-पानी का बना हुआ था कि जिस पर गँवई रँजिश व आपसी बैर की धूल पड़ती भी थी तो जमा नहीं होने पाती थी। ऐसे मौकों पर लोग आपसी बैर-भाव भूल जाते थे और एक-दूसरे के साथ हिल-मिलकर गाते बजाते हुए होली का पर्व पूरे उत्साह के साथ मनाते थे। फगुआ के रँग में रँगा हुआ चित्त अपने सारे आवरण उतारकर दूर फेक देता था और विशुद्ध लोक चित्तभर ही रह जाता था। उसी विशुद्ध लोक चित्त की पुकार ही फाग का असल राग था। इसिलिए उस पुकार में किसी एक की पुकार भर न होकर समूह की पुकार शामिल थी और उसी समूह की पुकार का स्वर था।

उड़ा गुलाल लाल भय बादल

रँग उड़े चहुओरी हो

सदा आनंद रहे एहि द्वारे

मोहन खेलें होरी हो॥

यह गीत मात्र मनोरँजक गीत भर न होकर घर-घर आनन्द रहे इसी मँगलकामाना का आवाहन् गीत था। इसिलीए इस गीत को झाँझ और मँजीरे की गूँज के साथ गा-गाकर आकाश का अनहद नाद बना दिया जाता था। उसी नाद से नादित हुआ चित्त ही विशुद्ध गँवई लोक चित्त था। उसी गँवई लोक चित्त के चित्तधारी थे मेरे पड़ोस के बासुदेव बाबा भी।

मेरी दादी बासदेव बाबा की पद में इकलौती बडी भौजाई लगती थी। हर साल होली के रोज बासदेव बाबा एक हाथ में रँग भरा लोटा और दूसरे हाथ में अबीर लिए हुए हमारे घर आते और रँग का लोटा मेरी दादी के उपर उड़ेलते और फिर अबीर लगाकर दादी का पैर छूकर वापस चले जाते।

मेरे और बासदेव बाबा दोनों ही घरों की आपसी रँजिश का असर बाबा पर कभी नहीं पडा। जब नई पीढी की आपसी रँजिश की वजह से दोंनों घरों का खान-पान व शादी-ब्याह में भी आना जाना और निमँत्रण आदि भी बन्द हो गये तब भी बासदेव बाबा  एक हाथ में लोटा भरा रँग और दूसरे हाथ में अबीर लिये हुए तब-तक आते रहे जब तक मेरी दादी जीवित रही।

इसी क्रम में दूसरा नाम था कैलास काका का। कैलाश काका बस ह्मारे गाँव में ही नहीं बल्कि दूर-दराज के गाँवों में भी अपनी गायकी के लिए मशहूर थे। कीर्तन गाने और फगुआ गाने में बडे बडे गवैया उनको अपना गुरू मानते थे।

कैलाश काका ही मेरे गाँव की फगुआ मँडली के नायक थे। बडा सुरीला कँठ था काका का। उन्हीं के नेतृत्व में ही फगुआ मँडली गाँव के एक छोर से दूसरे छोर तक एक-एक घर फगुआ गाते हुए पूरा गाँव घूमती थी। फगुआ का पहला बोल काका कढाते (गाते)फिर बाकी के लोग उसी को दोहराते। गीत का बोल आहिस्ते-आहिस्ते से शुरू होकर अंत तक गगन भेदी हो उठता था। गीत के लहरदार आवाज के साथ साथ झाँझ-मँजीरे की उन्नत ध्वनि भी आकाश गूँजाने वाली हो जाती थी।

गाँव में अपने बाद की और समकालीन पीढी के कईयों ने फगुआ गाने की कला कैलाश काका  से ही सीखी थी। उनके कई शागिर्द थे उन्हीं शागिर्दों में एक थे लाली काका और दूसरे थे नेबुल भाई। नेबुल भाई उमर मे मुझसे इतने बडे थी की मेरे पिताजी के ही समकालीन थे लेकिन गाँव के रिश्ते से भाई का पद पडता था और हम लोग उन्हें नेबुल भाई कहकर बुलाते थे।

कैलाश काका जैसा जीवट आदमी तो अब ढूँढे भी नही मिलेगा। उनके रहने तक पँचायती राज की जहरीली राजनीति गाँव में घुलने नहीं पाई, उस राजनीति का असर फगुआ पर कभी नहीं होने पाया। बहुत दबाव पडने पर भी फगुहरों की एक टोली से दूसरी टोली नहीं बनने नहीं दी उन्होने। अपने होने तक उन्होंने एक ही गाँव में दो दलों का अलग अलग सम्मति जलाने के प्रस्ताव पर अमल नहीं होने दिया। कहते थे कि अपने जीते जी मैं इस गाँव में ये नहीं होने दुंगा।

काका के गुजरने के बाद उनके शगिर्द लाली काका और नेबुल भाई ने भी काका के उस परम्परा को चलाते रहने की पुरजोर कोशिश की पर सफल नही हुए। देखते ही देखते चुनावी रँजिश में गाँव दो हिस्सों में बट गया। फगुहरों के भी दो दल बन गये और एक ही गाँव में दो अलग-अलग सम्म्ति भी जलने लगी। जो होली पुरानी रँजिश को भुलाकर रिश्तों को नया रँग देती थी वही होली अब पुरानी रँजिश का बदला लेने का उचित समय और माध्यम हो गई है।

(गोरखपुर के रहने वाले श्रीधर दूबे अपने व्यक्तित्व में ही लोक कवि हैं . आजकल नोएडा में कार्यरत हैं. इन्होंने कुछ ऐसी कवितायेँ लिखी हैं जो हम सब के रोजमर्रा के संघर्ष को बयाँ करती हैं. भोजपुरी के लोक गीत संगीत पर इनकी पकड़ गजब है. उनसे इस नम्बर (8050743616) पर संपर्क किया जाता है.)

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