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रजनीश जे जैन/

ताकझांक करना स्वाभाविक मानवीय कमजोरी है। किसी पर नजर रखना रोमांचक होता है। परन्तु दूसरों की जिंदगी में झांकना एक अशिष्ट आचरण माना जाता है। आवरण के पीछे का सच जानना कौतुहल पैदा करता है।  किसी के निजी पलों की तहकीकात करने का स्वभाव लगभग हर तीसरे व्यक्ति की आदत होती है। शिक्षा, संस्कृति और भौगोलिक विविधताओं  के बावजूद यह मनोविकार हर आयु वर्ग के लोगों में पाया जाता है। कहीं थोड़ा – कही ज्यादा। रियलिटी टीवी शोज ने दर्शकों के मन में खींची निजता लांघने की लक्ष्मण रेखा को विलीन कर दिया है। यह अब सहज स्वीकार्य संस्कृति बन चुकी है।

रजनीश जे जैन
हिंदी अंग्रेजी के प्रमुख अख़बारों ने एक नए चलन की शुरुआत की है। फ़िल्मी गपशप के साथ ये अखबार अब सेलिब्रिटी के एयरपोर्ट पर आने जाने के फोटो प्रकाशित करने लगे हैं। सूचना और समाचार का कौन सा उद्देश्य इस निजता के उल्लंघन से सार्थक हो रहा है? शायद वे ही इसका बेहतर जवाब दे सकते हैं। लोकप्रिय और प्रसिद्ध व्यक्ति के छुप कर लिए फोटो अखबार के पाठक के अवचेतन में सुप्त पड़े ताका झांकी के भाव को हवा देने का ही काम करते हैं।  हॉलीवुड ने इस मानवीय कमजोरी को अवसर में बदलने का काम किया है। ताकझांक ने टेलीविज़न और वेबसाइट के पोर्टल्स को एक नए बाजार से परिचित कराया है। अमेरिका का टी एम् जी टीवी चैनल सिर्फ ताकझांक और गॉसिप के बल पर इस विधा का सिरमौर बना हुआ है। पॉप स्टार माइकल जैकसन की मृत्यु की खबर सबसे पहले इसी ने प्रसारित कर दुनिया में हंगामा मचा दिया था।

सन् 1949 में ब्रिटिश लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने अपने राजनैतिक उपन्यास ‘1984’ (नाइनटीन एटी फोर) में एक ऐसे देश का व्यंगात्मक वर्णन किया था जहाँ शासक अपनी अवाम की हरेक गतिविधि पर नजर रखता है। शासक को लोग ‘बिग ब्रदर’ के नाम से जानते है। देश का कोई भी व्यक्ति अपने तयशुदा व्यवहार से भटकता है तो उसके साथी उसे सचेत करते है ‘सावधान! बिग ब्रदर तुम्हें देख रहा है.’ इस उपन्यास से प्रेरित होकर अमेरिकी टीवी चैनल सीबीएस ने सन् 2000 में पहला रियलिटी टीवी शो ‘बिग ब्रदर’ प्रसारित किया था। शो के प्रतियोगियों को एक घर में रखा जाता है। इस घर में अखबार, टीवी, इंटरनेट और फ़ोन जैसी सुविधाएं नहीं होतीं। घर के हरेक हिस्से को हाई रिजोल्यूशन कैमरा की जद में ला दिया जाता है। प्रतियोगियों की समस्त हरकत- चीखना चिल्लाना, गाली, गुस्सा, साज़िश कैमरे पर रेकॉर्ड होती रहती है जिसे बाद में टीवी पर प्रसारित कर दिया जाता है। ‘बिग ब्रदर’ सत्रह वर्षों में उन्नीस बार टेलीविज़न पर दिखाया जा चुका है। इसका 20वां सीजन 2018 में आरम्भ होगा।

बिग ब्रदर की प्रेरणा से भारत में ‘बिग बॉस’ अस्तित्व में आया है। बिग बॉस की लोकप्रियता में समय समय पर उतार चढ़ाव आते रहे हैं। वर्तमान में इसका ग्यारवां सीजन ‘कलर्स टीवी’ पर चल रहा है। मौजूदा समय में ‘नकारात्मकता’ की मांग कुछ इस कदर बढ़ रही है कि बिग बॉस को क्षेत्रीय भाषाओ में भी बनाया जा रहा है। यह अकेला ऐसा शो है जहाँ प्रतियोगी जितनी घटिया और निम्न स्तरीय हरकत करते हैं उतना ज्यादा बिग बॉस की लोकप्रियता में  उछाल आता है!

 

ताकझांक को केंद्र में रखकर ‘मास्टर ऑफ़ सस्पेंस’ अल्फ्रेड हिचकॉक ने एक मास्टरपीस फिल्म ‘रियर विंडो’ बनाई थी। सन् 1954 में बनी इस टेक्नीकलर फिल्म का नायक जेफ़ (जेम्स स्टुअर्ट)  प्रोफेशनल फोटोग्राफर है। एक दुर्घटना में वह अपनी टांग तुड़वा बैठा है। फिलवक्त प्लास्टर बंधा होने से वह अपने अपार्टमेंट में कैद है। जेफ़ की सुंदर प्रेमिका लिसा (ग्रेस केली) उससे अक्सर मिलने आती है। जेफ़ खाली वक्त में अपने कैमरे से सामने वाले अपार्टमेंट में ताकझांक करता रहता है। रोज-रोज यही करते हुए वह एक अपराध के होने की संभावना भांप लेता है। 1942 में एक जासूसी पत्रिका में छपी इस कहानी ने हिचकॉक को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने इसके लेखक को ढूंढकर पंद्रह हजार डॉलर में कहानी खरीद ली। ‘रियर विंडो ‘ आज भी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ 100 फिल्मों में 42वें क्रम पर आती है।

भले ही सभ्य समाज में ताकाझांकी अब भी निम्न स्तरीय आदत मानी जाती हो परन्तु इस तथ्य को भी स्वीकारना ही पड़ेगा कि इसकी वजह से सिनेमा, साहित्य और टेलीविज़न को एक अनूठा विषय मिला है।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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