धूल भरी आँधी, बेबे की रोटी और मसीह

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प्रभु नारायण वर्मा/

प्रभु नारायण वर्मा

23 मार्च 1931 के दिन लाहौर के सेन्ट्रल जेल में वास्तव में क्या – क्या हुआ था; इसकी तफ़सील कहीं नहीं मिलती।

हिन्दुस्तानी अवाम के जोश, ग़ुस्से, नफ़रत और बदला लेने के डर से अंग्रेज़ी हुक़ूमत ने उन अफ़सरों के नाम छुपा कर रखे, जिन्होंने भगतसिंह की फाँसी को अन्जाम दिया।

कहीं गोली चल गई

एक महीना पहले ही दो अफ़सरों – पंजाब के गवर्नर ज्योफ़्रे साहब और पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट ख़ानबहादुर शेख़ अब्दुल अज़ीज़ की हत्या की अलग-अलग कोशिशें हो चुकी थीं, जिसमें दोनों बाल बाल बचे थे।

फाँसी की तारीख़ 24 मार्च मुकर्रर थी। इसके एक हफ़्ता पहले, 16 मार्च को लाहौर के गवर्नर हाउस में आला अफ़सरों की एक मीटिंग हुई। एजेन्डा था फाँसी के मद्देनज़र कानून-व्यवस्था। सदारत ज्योफ़्रे साहब ने की। कुछ दिन पहले ही पंजाब यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम के दौरान क्रांतिकारी हरिकिशन तलवार ने ज्योफ़्रे साहब पर गोली चलाई थी। साहब बाल-बाल बचे थे। गोली का घाव अब तक सूखा नहीं था। दर्द भी काफ़ी था। पंजाब के चीफ़ सेक्रेटरी बॉयड , होम सेक्रेटरी ऑजिलिव , पुलिस के आईजी स्टीड, जेल के आईजी बार्कर, लाहौर के डिप्टी कमिश्नर रॉबर्ट्स और सीनियर एसपी हार्डिंग साहब भी मौजूद थे। भगत सिंह की फाँसी के बाद हालात कैसे होंगे और उससे कैसे निपटा जायेगा, यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। इसकी बजाय फाँसी की तैयारी वगैरह पर चर्चा होती रही। जैसे-तैसे मीटिंग ख़त्म हुई।

धूल भरी आँधी

22 मार्च को पूरी रात पूरे लाहौर में धूल भरी आँधी चलती रही।

लाहौर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी कि जिस स्पेशल ट्रिब्यूनल ने फाँसी की सज़ा दी है, उसे सज़ा देने का कोई अधिकार ही नहीं था। लाहौर हाईकोर्ट ने इसे ख़ारिज कर दिया था। इसलिये अब यह निश्चित था कि 24 मार्च को फाँसी होगी ही।

सरकार को यह भी ख़बर थी कि बहुत ज़्यादा तादाद में लोग लाहौर आने वाले हैं। ऐसे हालात का सामना करने की बजाय यह फ़ैसला किया गया कि फाँसी एक दिन पहले ही दे दी जाय।

23 मार्च को पौ फटते तक धूल भरी आँधी भी शान्त हो गई।

लेनिन की जीवनी

जेल सुपरिन्टेन्डेन्ट मेजर पी डी चोपड़ा के कमरे में जेल के अफ़सर धीमे सुर में चर्चा कर रहे थे। माहौल में तनाव था। भगतसिंह और साथियों के मुलाकातियों के लिये सुबह दस बजे का वक़्त मुकर्रर था। दस बजे भगतसिंह के वक़ील प्राणनाथ मेहता ने उनसे मुलाक़ात की। भगतसिंह ने पहरेदारों से छिपाकर हाथ से लिखे काग़ज़ों के छोटे-छोटे चार बण्डल दिये।

वक़ील के जाते ही अफ़सरों का एक दल भगतसिंह की कोठरी में घुसा। अफ़सरों ने भगतसिंह को सलाह दी कि अगर वे बर्तानवी हुक़ूमत से माफ़ी माँगने को तैयार हों, तो अभी भी वे बच सकते हैं। भगतसिंह ने उन्हें रूखे स्वर में टका सा जवाब देकर लौटा दिया।

जेल के सीनियर वार्डन छत्तर सिंह को ये ज़िम्मेदारी दी गई कि वो भगतसिंह और साथियों को इत्तिला कर दे कि उन्हें एक दिन पहले ही फाँसी दी जायेगी। छत्तर सिंह बड़ा दुखी और परेशान हुआ। उसने भगतसिंह को ख़बर दी, और यह सलाह भी कि आख़िरी घड़ी में भगवान का सुमिरन करना चाहिए। भगतसिंह लेनिन की जीवनी पढ़ने में डूबे हुए थे। उन्होंने छत्तर सिंह को टाल दिया।

बेबे की रोटी

भगतसिंह ने कई दिन पहले ही जेल में काम करने वाली एक मुसलमान जमादारिन बेबे से कह रखा था कि 23 मार्च की शाम को वे उसके घर का बना खाना खायेंगे। बेबे जब खाना ले कर आई तो उसने देखा कि जेल के बाहर बहुत अफ़सर जमा हैं और पहरा बहुत सख़्त कर दिया गया है। खाना देना तो दूर रहा, उसे जेल में घुसने से भी मना कर दिया गया; और वह निराश वापस लौट गई।

शाम होते तक बहुत सारे अफ़सर जेल पहुँच गये थे। लाहौर के एडीशनल ज़िला मजिस्ट्रेट शेख़ अब्दुल हमीद, सिटी मजिस्ट्रेट रायसाहब लाला नत्थूराम, डीएसपी सुदर्शन सिंह, डीएसपी अमर सिंह और डीएसपी मॉरिस साहब के साथ-साथ सैकड़ों हथियारबन्द सिपाही जमा हुए थे। हर कोई किसी अनहोनी की आशंका से परेशान था।

जेल के भीतर भी ढेर सारे अफ़सरों का जमावड़ा था।

शाहदरा से फाँसी देने वाला जल्लाद बुलाया गया था। उसका नाम था मसीह। उसने अपने काम की पूरी तैयारी कर ली थी।

भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु को जैसे ही उनकी कोठरियों से बाहर निकाला गया, उन्होंने इंक़लाब ज़िन्दाबाद के नारे लगाना शुरू कर दिया।

जेल के बगल में ही लाहौर के ज़िला कांग्रेस के सेक्रेटरी पिण्डीदास सोढ़ी का घर था। इंक़लाब ज़िन्दाबाद के नारे उनके घर तक साफ़-साफ़ सुनाई पड़ रहे थे।

फिर जेल के सभी क़ैदी ज़ोर-ज़ोर से नारे लगाने लगे।

डिप्टी कमिश्नर रॉबर्ट्स की आदत थी कि वह हमेशा कुछ ना कुछ बोलता रहता था। जब भगतसिंह और उनके साथी फाँसी के तख़्ते तक पहुँच गये, तब भी रॉबर्ट्स उनसे बातचीत कर रहा था। भगतसिंह ने बड़े आत्मविश्वास के साथ उससे कहा कि आज़ादी के दीवाने कितनी बहादुरी के साथ अपनी मौत को गले लगाते हैं, इसे लोग जल्द ही महसूस करेंगे और हमेशा याद रखेंगे।

तीनों ने काले कपड़े से मुँह ढँकने से भी इंकार कर दिया। बल्कि भगतसिंह ने तो उस काले कपड़े को ज़िला मजिस्ट्रेट पर फेंक दिया।

तीनों साथी आख़िरी बार एक दूसरे के गले मिले। उस समय भी वे अंग्रेज़ी राज मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे।

मसीह ने फाँसी का खटका खींच दिया। पहले भगतसिंह फाँसी पर झूले, फिर राजगुरु और अन्त में सुखदेव।

लाहौर मेडिकल कॉलेज के प्रिन्सिपल लेफ़्टिनेन्ट कर्नल नेल्सन और लाहौर के सिविल सर्जन लेफ़्टिनेन्ट कर्नल सोढ़ी जेल के अन्दर ही मौजूद थे, लेकिन उन्होंने फाँसी देते समय वहाँ आने से मना कर दिया। फाँसी के बाद सोढ़ी ने तीनों को मुर्दा घोषित किया।

मौत का वक़्त 23 मार्च 1931 की शाम सात बजे।

ख़यालों की बिजलियाँ

फाँसी की ख़बर को एहतियातन बहुत गुप्त रखा गया था। फिर भी जेल के बाहर बहुत भीड़ जमा हो गई थी। रात दस बजे एक गाड़ी में डीएसपी सुदर्शन सिंह, एक में डीएसपी अमर सिंह और तीन ट्रकों में ब्लैक वाच रेजीमेन्ट के फ़ौजी जवान तीनों शहीदों की लाश लेकर जेल से निकले। सुदर्शन सिंह एक ग्रन्थी और जगदीश अचारज (आचार्य ?) नाम के एक पुजारी को लेकर आया था।

पास के ही एक गाँव गंडासिंह वालां की सरहद पर सतलज नदी के किनारे तीनों लाशें जला दी गईं। आग जल ही रही थी कि न जाने कैसे पास के फ़िरोज़पुर और दीगर गाँवों के सैकड़ों लोग वहाँ भी पहुँच गये। बहुत हल्ला-हुज्जत होने लगा।

कुछ देर बाद तीनों लाशों को अधजली हालत में ही सतलज में फेंक दिया गया।

(लेखक हिंदी के बेहतरीन कथाकार हैं। संगीत, कला, साहित्य पर इनकी समझ के मुरीद हुए बिना नहीं रहा जा सकता।)

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