लौंडा नाच के सामानांतर गोंड नाच भी लोक का एक हिस्सा है

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आशुतोष कुमार पाण्डेय/

लौंडा नाच वैसे तो अपने विस्तार के अनुरूप पढ़े-लिखे लोगों के बीच चर्चा का हिस्सा नहीं हो पाता. फिर भी इतना जरुर है कि लोग इसे जानते समझते हैं. लेकिन इसी तर्ज पर एक गोंड नाच भी है जो इसी से मिलता-जुलता है पर लौंडा नाच के बनिस्बत इसकी चर्चा तो लगभग नदारद है.

हाल ही में मुझे इससे रू-ब-रू होने का मौका मिला. इसको देखने समझने के बाद यह ख़याल और पुख्ता हुआ कि विविध लोकाचार और उत्सवधर्मी भारतीय समाज अपने अन्दर कितना कुछ समाये रहा है. प्रत्येक समाज के अपने खान-पान के बाद जीवन-यापन के भी अलग ही तरीके होते हैं. हजारों जातियों-उपजातियों वाले भारत की सबसे बड़ी जनजाति गोंड पूरे देश विभिन्न हिस्सों में फैली हुई है, मगर इनकी लगभग 60 प्रतिशत आबादी मध्य प्रदेश में पायी जाती है. इन जनजातियों की एक अलग नृत्य शैली भी होती है जिसे बिहार में गोंड का नाच कहा जाता है.

इस नाच में भी लौंडा नाच के समानांतर ही बहुत सारे मौकों के लिए अलग-अलग नृत्य पद्धति है. दशहरा-दुर्गापूजा, शादी-विवाह के साथ बच्चे के जन्म लेने जैसे शुभ अवसर पर लोग इनको अपने यहाँ बुलाते हैं और इनके नाच-गाने का आयोजन करवाते हैं. इस नाच में घुरुका और झाल नामक दो ही वाद्य यंत्र बजाये जाते हैं. झाल तो वैसे जाना-पहचाना नाम है पर घुरुका को समझने के लिए हम इसे डमरू के बनावट की कल्पना कर सकते हैं.

बक्सर जिले में पड़ने वाले मेरे गाँव पांडेयपुर में हाल ही में एक ऐसे ही आयोजन पर ‘हलचल गोंड़ नाच पार्टी’ आई हुई थी. अरक नामक गांव से जुड़े इस नाच पार्टी से सवाल-जवाब करने पर इनके बारे में बहुत कुछ जानने-समझने को मिला.

सामान्य से बड़ी मूंछें रखे और सर पर लाल गमछा बांधे लगभग 50-वर्षीय रामशंकर गोंड़ हुरुका बज़ा रहे थे. मैंने उनसे पूछा कि यह हुरुका क्या होता है. पहले तो वे संदेह की नज़र से देखते रहे फिर इसका मतलब जानने का प्रयोजन पूछ बैठे. मैंने कहा कि मेरा उद्देश्य इस नृत्य-कला को समझना भर है. मेरे जवाब से संतुष्ट होने के बाद उन्होंने बताया कि हुरुका शंकर भगवान का डमरू है. फिर आगे बताया कि “आपको यह डमरू से बड़ा दिखाई दे रहा है न, तो समझिए कि सच में शंकर भगवान का डमरू है”.

अलबत्ता उन्होंने स्पष्ट किया कि यह उनका खानदानी पेशा नहीं है, बल्कि वे संगत और जैसे-तैसे पैसा कमाने  के चक्कर में इस विधा से जुड़ गए. इनके दो लड़के हैं और अब यह सुनिश्चित कर रहे है कि दोनों अच्छी पढाई कर के कहीं इज्जत वाली नौकरी कर लें. रमाशंकर गोंड के विचार इस मामले में स्पष्ट हैं कि इस नाच में न तो इज्जत है और न ही पैसा.

नाच-गान का कार्यक्रम ईश्वर की स्तुति यानी सुमिरन से शुरू होता है.

करीब 87 साल के पार्टी मैनेजर शिव कुमार गोंड शंकर भगवान को गोहराते हुए सुमिरन गाते है, “सीरी बरमेसर नाथ कृपाल दयाल दयानिधि संकट हारो, आनंद कंद मंगल राशि सदा सुख पाओ.” इसके साथ ही दो जोकर मंच पर उतरते हैं और पूर्व निर्धारित सवाल-जवाब का सिलसिला शुरू हो जाता है.

कार्यक्रम जैसे जैसे आगे बढ़ा वैसे-वैसे भोजपुरी लोकाचार वाली गाली-गालौज़ शुरू हो गई. अपने कार्यक्रम के बीच थोड़ी देर के आराम के लिए बैठे जोकर बने 50 -वर्षीय मुन्नीलाल गोंड से जब मैंने पूछा कि इस नाच-गान में सिर्फ़ गाली-गलौज़ ही होता है?

थोड़ा ठहरकर उन्होंने बताया कि जो लोग साटा करते है उनकी फरमाईश हम पूरी करते हैं.  “हमसे ऐसा करने के लिए कहा जाता है. वरना हम शंकर भगवान वाले ही भजन गाते हैं.”

हलचल गोंड नाच पार्टी के मैनेज़र  शिव कुमार गोंड और मालिक श्रीकिशुन गोंड आसपास बैठे हुये थे. जब मैंने दोनों से प्रश्न किया कि मनोरंजन के विभिन्न तरीके आ जाने से आपलोगों का पेशे पर कितना प्रभाव पड़ा. किशुन गोंड ने अपने चेहरे पर उत्साह लेकर बताया, “इस आने वाले लगन के लिए हमने बाइस साटा लिखा है। आप पता कर लीजियेगा किसी भी नाच वाले से ज्यादा साटा हमारा ही हुआ है.”

इसी बीच मैनेज़र शिव कुमार गोंड ने वह डायरी दिखाई जिसमें हिंदी महीने के खरमास के बाद 22 साटा यानि बुकिंग दर्ज़ की गयी थी. तब तक लगभग 45 साल के गुलाबी साड़ी पहनकर नाचने वाले कमलेश गोंड आ गये. बीच में ही तपाक से बोल उठे 13, 000 से कम हम साटा नही लिखते. हमारी पार्टी में 13 लोग हैं.

(आशुतोष कुमार पाण्डेय बक्सर जिले के रहने वाले हैं और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सामाजिक मुद्दों को लेकर काफी सक्रिय हैं)

 

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