सबरीमाला: केरल में महिलाओं को अपना स्तन ढंकने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा था

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अनिमेष नाथ/

एक मंदिर में महिलायें प्रवेश करेंगी कि नहीं इसको लेकर केरल की राजनीति गरमाई हुई है. देश के सर्वोच्च न्यायालय ने महिलाओं के प्रवेश को जायज ठहराया है. इस आदेश के आदेश के बाद सबरीमाला मंदिर का दरवाजा बुधवार को पहली बार खुला. जब कुछ महिलाओं ने प्रवेश करने की कोशिश की तो न केवल उन्हें प्रवेश करने से रोका गया बल्कि उनके साथ जोर- जबरदस्ती की गई. महिलायें सबरीमाला मंदिर में प्रवेश न करें इसको लेकर वहाँ भारतीय जनता पार्टी सक्रिय है. इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखते हुए मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन कहा कि इस राज्य में एक दफे महिलाओं को अपना स्तन ढकने तक के लिए संघर्ष करना पड़ा था. आज इन्हें मंदिर में प्रवेश करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. यह स्तन-कर क्या मामला है आईये इसकी पड़ताल करते हैं.

आज से लगभग तीन सौ साल पहले केरल के दक्षिणी क्षेत्रों में कुछेक जातियों की महिलाओं को स्तन ढकने की मनाही थी. ऐसा करने की स्थिति में इन महिलाओं को कर देना होता था. खासकर कमजोर जाति की महिलाओं को. वैसे स्तन नहीं ढकने की अनिवार्यता विभिन्न रूप में लगभग सभी जातियों की महिलाओं के लिए था. जैसे नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी कुछ ख़ास मौकों के लिए ऐसा नियम था कि वे अपना स्तन नहीं ढक सकती थी. नंबूदिरी औरतों को मंदिर में जाते वक्त ऊपरी वस्त्र खोलकर ही प्रवेश करना होता था. नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था.

लेकिन सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की छूट नहीं थी. अगर इन महिलाओं ने ऐसा किया तो उन्हें इसकी आर्थिक कीमत चुकानी होती थी. अधिकारी घर-घर जाकर दलित महिलाओं से स्तन-कर वसूलते थे. इस कर को स्थानीय भाषा में ‘मुलाक्करम’ कहते थे.

लेकिन सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की छूट नहीं थी. अगर इन महिलाओं ने ऐसा किया तो उन्हें इसकी आर्थिक कीमत चुकानी होती थी.

एक किवदंती है कि आलाप्पूषा के चेर्थला में एक उत्साही और सुन्दर महिला रहती थी. उसका नाम नेंजेली था. एक बार उसके घर एक अधिकारी कर वसूलने आया. नेंजेली ने उसका स्वागत किया. उसने उस अधिकारी के सामने एक पत्ता रखा और एक दिया जलाया. उसी दिए के रौशनी में उस सुन्दर महिला ने अपने स्तनों को काटकर उस अधिकारी के सामने रख दिया. वह स्तन नहीं ढकने देने की इस प्रथा से खिन्न थी. बहुत खून बह जाने के कारण नेंजेली की मृत्यु हो गई. लेकिन उसका यह विरोध कमजोर जाति के लोगों के लिए प्रतिरोध का प्रतीक बन गया. कहते हैं कि उसका पति इस घटना के समय मौजूद नहीं था. जब वह वापस लौटा तो नेंजेली का अंतिम संस्कार हो रहा था. उस पुरुष ने भी उसी चिता में कूदकर अपनी जान दे दी.

यह स्वाभाविक है कि ऐतिहासिक दस्तावेजों में इस घटना का कोई जिक्र नहीं मिलता. पर यह कहानी केरल में काफी मशहूर है. शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े  हुए कई लोग इस घटना के बारे में और अधिक जानकारी इकट्ठा करने के लिए आज भी संघर्ष कर रहे हैं.

इस बर्बर सामाजिक प्रथा के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने वाली नेंजेली पहली महिला नहीं थी. 1813 से 1859 के बीच, नादर समुदाय की महिलाओं ने सवर्ण महिलाओं की तरह अपने वक्ष ढंकने के अधिकार पाने के लिए जबरदस्त लड़ाई लड़ी. इस लड़ाई को चन्नार विद्रोह के नाम से जाना जाता है.

आन्दोलनरत ये महिलायें नायर समाज की महिलाओं के बराबर अधिकार की मांग कर रहीं थीं.

इस मुद्दे को लेकर ईसाई मिशनरियों ने नादर महिलों का साथ दिया और इसके फलस्वरूप कई नादर महिलाओं ने ईसाई धर्म अपना लिया.

एक अंग्रेजी वेबसाइट से बात करते हुए इतिहासविद डॉ. गोपालकुट्टी कहते हैं कि “यह कुप्रथा 20वीं शताब्दी तक चलती रही. कपड़ा इत्यादि समाज की स्थिति बयान करती है. इसी वजह से सामाजिक लड़ाई में ब्लाउज ने एक प्रतीक का रूप ले लिया.”

उन दिनों केरल में स्तन ढकने के नाम पर लगने वाला अकेला बेतुका कर नहीं था. ऐसे कई अजीब और दमनकारी कर उस दौर में लगाये गए, जैसे- दलित महिलाओं पर गहना पहनने पर कर, दलित समुदाय के पुरुषों पर मूंछें उगाने पर कर इत्यादि.

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