कंप्यूटर विज्ञान के जनक समलैंगिक थे और उन्हें जो सज़ा मिली उसने मानवता को शर्मसार किया

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शिखा कौशिक/

अभी देश-दुनिया में इसकी खुमारी चल रही है कि भारत ने इंडियन पीनल कोड के धारा 377 के बर्बर रूप को ख़ारिज कर दिया. इस फैसले में इस पर काफी जोर दिया गया कि बहुसंख्यक नजरिया और नैतिकिता के आधार पर संवैधानिक अधिकार तय नहीं किया जा सकता और इस तरह समलैंगिकता अपराध की श्रेणी से बाहर हो गया.

भारत में अंग्रेजी हूकुमत के दौरान आई इस धारा ने लोगों की निजता को कैसे भंग किया इसको लेकर श्रीनिवास रामचंद्र सिरस का जिक्र होता रहता है. सिरस अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बतौर प्रोफेसर नियुक्त थे और उन्होंने 2010 में आत्महत्या कर ली थी. वजह यह थी कि एक रिक्शेवाले से इनका सम्बन्ध उजागर हो गया था. समाज ने तो जो किया वह किया पर कानून ने भी इनका साथ नहीं दिया.

अंग्रेजो ने अपने बनाए इस कानून से तो कब का निजात पा लिया था पर इसका दंश भारत में लोग झेलते आ रहे थे. हालांकि निजात पाने की यह कहानी भी काफी दर्दनाक है.

सिरस की तरह या कहें ब्रिटिश समाज में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गणितज्ञ एलन टूरिंग को महज 42 साल की उम्र में ही आत्महत्या करनी पड़ी. भारत में पिता की नौकरी होने की वजह से टूरिंग का शुरूआती चौदह साल (1912 से लेकर 1926 तक) यहीं पर गुजरा.

आज के कंप्यूटर की खोज इन्होंने ही की. वर्ष 1936 में टूरिंग ने एक परचा प्रकाशित किया जिसे आज के कंप्यूटर विज्ञान का आधार माना जाता है. आज जिस आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस की चर्चा जोरों पर है इसकी जमीन टूरिंग ने ही तैयार की थी.

दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी मित्र राष्ट्रों पर भारी पड़ रहा था. इसकी वजह थी जर्मनी में बने एनिग्मा कोड. जर्मनी ने एक ऐसी पद्धति विकसित की जिसके तहत सूचना, कोड में तब्दील कर के एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाई जाती थी. इस पद्धति की वजह से मित्र राष्ट्र दूसरे विश्वयुद्ध में पिछड़ने लगे थे. उसी समय में एलन टूरिंग ने एक ऐसी मशीन तैयार की कि अंग्रेजों को इस कोड को तोड़ने में मदद मिली. इस तरह दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी का एक सबसे मजबूत हथियार निष्क्रिय कर दिया गया.

यह तो एलन टूरिंग की उपलब्धियां थी जो उन्होंने पूरी मानवता को और खासकर अंग्रेजी समाज को दिया. इसके बदले में उन्हें जो मिला वह उतना ही शर्मसार करने वाला है.

टूरिंग गे यानि समलैंगिक थे और इसको लेकर उन्होंने कोई अपराध-बोध नहीं था. अपने इस समलैंगिक प्रवृत्ति  को वह खुल के स्वीकार करते थे. उन्होंने जॉन क्लार्क नाम की एक लड़की से शादी का प्रस्ताव रखा और वह तैयार भी हो गई. पर टूरिंग ने खुद अपने समलैंगिक होने की बात उसे बताई और किनारा कर लिया.

टूरिंग ने जॉन क्लार्क नाम की एक लड़की से शादी का प्रस्ताव रखा और वह तैयार भी हो गई. पर टूरिंग ने खुद अपने समलैंगिक होने की बात उसे बताई और किनारा कर लिया.

लेकिन जब अंग्रेज सत्ता को 1952 में टूरिंग के समलैंगिक होने की बात पता चली तो सबकुछ बदल गया. ब्रिटेन में सोलहवीं शताब्दी से  एक कानून था ‘द बगरी एक्ट’. इसके तहत समलैंगिकता को ‘घिनौना’ कृत्य माना जाता था. धीरे-धीरे इसने समलैंगिकता के खिलाफ कानून  बनाने में मदद की और इसी कानून के साथ समलैंगिकता के खिलाफ के लिए सजा भी तय होने लगी. टूरिंग के समय में आते आते समलैंगिकता की सजा में जेल जाना, आर्थिक मुआवजा देना और एक ऐसी थेरेपी के तहत गुजरना होता था जिसमें लोगों के सेक्स सम्बन्धी झुकाव को सही करने की कोशिश की जाती थी.

ब्रिटिश हुकूमत को जब एलन टूरिंग के समलैंगिक होने का पता चला तो इनकी सजा तय हुई. टूरिंग ने जेल की बजाय हार्मोन के द्वारा इलाज का रास्ता चुना. उनको एस्ट्रोजेन इंजेक्शन दिया जाने लगा ताकि इनके व्यक्तित्व में जरुरी और ‘सही’ परिवर्तन लाया जा सके. कहते हैं इस इंजेक्शन को लागातार दिए जाने की वजह से टूरिंग नपुंसक हो गए. धीरे-धीरे उनके शरीर में स्तन का विकास होने लगा. इसे गाईनेकोमस्टिया कहते हैं.

लेकिन जिंदादिल टूरिंग ने निर्बाध रूप से अपना काम जारी रखा. वह अपने इस सजा का और बेतुके अंग्रेजी कानून का मजाक उड़ाते रहे. उनके एक मित्र ने कभी मीडिया को बताया था कि यह सजा आसान नहीं थी पर टूरिंग ने हार नहीं मानी. उनके देश की सरकार ने उनको दी गई सुरक्षा वापस ले ली थी और इस तरह कोड ब्रेकिंग डिपार्टमेंट के साथ चल रहा उनका काम रुक गया. उन्होंने इस आदेश को चुनौती देने के लिए कुछ देश जैसे नॉर्वे, ग्रीस इत्यादि की यात्रा भी की.

लेकिन इस समस्या का अब कोई अंत नहीं था. वहाँ की सुरक्षा एजेंसी उन्हें समाज के लिए खतरनाक मानकर जब तब परेशान करने लगी. उनके विदेश यात्रा पर पाबंदी लगा ही दी गई थी. इन सबसे परेशान होकर इस वैज्ञानिक ने आखिरकार आत्महत्या का रास्ता चुना. 8 जून 1954 को जब काम करने वाली उनके घर आई तो टूरिंग को मृत पाया. उन्होंने सेब के साथ साइनाइड खा कर अपना जीवन ख़त्म कर लिया था.

करीब 55 साल बाद उनके पक्ष में एक मुहीम चली जिसमें स्टेफेन हव्किंग्स और रिचर्ड डावकिंस जैसे लोगों ने समर्थन दिया और चार साल बाद वर्ष 2013 में उनकी सरकार को उस सजा को वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी. खैर इन सबसे उस वैज्ञानिक को तो कोई राहत नहीं मिली लेकिन दुनिया भर के समलैंगिक लोगों को समाज को आईना दिखाने में मदद जरुर मिली. इनके जीवन पर 2014 में एक फिल्म बनी ‘द थ्योरी ऑफ़ एव्रीथिंग’ जो 2015 के ऑस्कर के दौड़ में भी शामिल रही.

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