केन्या के क्रन्तिकारी लेखक नगुगी वा थिओंगो ने टॉयलेट पेपर पर ही पूरी किताब लिख दी

0

विवेक/

वर्ष 1986 में इनकी रचना ‘मतिगरी’ प्रकाशित हुई. इसका नायक न्याय की तलाश में देश के विभिन्न इलाकों में घूम रहा है. इस किरदार की सफलता ऐसी रही कि वहाँ के स्थानीय सरकार ने इस मतिगरी को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया.

मतिगरी को कुछ महीने तलाशने के बाद सरकार को अपनी चरम मूर्खता का एहसास हुआ. उन्हें पता चला कि प्रशासन जिसकी तलाश में इधर उधर भटक रहा है वह हर जगह मौजूद होने के बाद भी कहीं मौजूद नहीं है.

अपनी मूर्खता से हताश और एक लेखक के इस प्रभाव से तिलमिलायी सरकार ने इस पुस्तक पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया.

इस उदाहरण से केन्या के क्रांतिकारी-लेखक नगुगी वा थिओंगो के लेखन के प्रभाव को समझा जा सकता है.

लेखन के प्रति इस लेखक की दिवानगी का की हद यह थी कि सरकार ने इन्हें जेल में डाला और सख्ती की. उस दरम्यान भी इन्होंने कुछ ऐसा किया जो सुनकर बड़े बड़े हैरान हो जाएँ.

उन्होंने 1977 में दो रचनाएं लिखी. एक ‘पेटल्स ऑफ़ ब्लड’ जिसमें इन्होंने अंग्रेजों के जाने के बाद के केन्या पर तल्ख़ टिपण्णी की थी. उसी साल उन्होंने एक नाटक लिखा. इस नाटक का नाम ‘Ngaahika Ndeenda (मैं जब चाहूँगा तभी शादी करूँगा). यह नाटक लिमुरु शहर के एक खुले थिएटर में खेला गया. इसमें असमानता और अन्याय जैसे मुद्दे को उठाया गया था.

इस नाटक से वहाँ की सत्ता इतनी आहत हुई कि राष्ट्रपति जोमो केन्यात्ता ने उस थिएटर को ध्वस्त करने का आदेश दे दिया. साथ ही इस लेखक को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

सिर्फ एक नाटक के लिए नगुगी वा थिओंगो को एक साल तक जेल में रहना पड़ा. जेल में कैदियों को प्रताड़ित करने के लिए बहुत सख्त टॉयलेट पेपर दिए जाते थे. लेकिन इस जुझारू लेखक नगुगी ने इसका भी इस्तेमाल कर लिया. और उसी टॉयलेट पेपर पर एक नहीं दो-दो रचनाएं रच डाली. पहली रचना थी ‘डेविल ओन द क्रॉस’ जिसमें चोर आपस में प्रतियोगिता करते हैं कि कौन बेहतर तरीके से लूट सकता है. दूसरी रचना थी ‘डीटेनड: अ राइटरस प्रिजन डायरी’.

यह लेखन भी अपने आप में क्रांतिकारी कदम था. अब तक अंग्रेजी में अपना लेखन करने वाले इस लेखक ने इन रचनाओं के लिए स्थानीय भाषा गिकियु भाषा का इस्तेमाल किया. इस तरह उन्होंने अपने स्थानीय भाषा में पहला उपन्यास लिख दिया. जेल से बाहर आने के बाद उन्हें देश निकाला दे दिया गया और 22 साल अपनी मात्रभूमि से दूर रहना पड़ा.

एक किसान के घर 1938 में पैदा हुए इस लेखक का बचपन मुश्किल भरा गुजरा. उस समय केन्या में अंग्रेजो का शासन था.

एक किसान के घर 1938 में पैदा हुए इस लेखक का बचपन मुश्किल भरा गुजरा. उस समय केन्या में अंग्रेजो का शासन था. इनका बचपन उसी जमीन पर मजदूरी करते गुजरा जो कभी इनके पूर्वज का रहा था. यह लेखक उसी जमीन पर मजदूरी  शोषण और अत्याचार की जड़ों पर वार करने वाले इस लेखक पास अपनी भाषा में पढने के लिए किताबें तक उपलब्ध नहीं थी. जब हाईस्कूल में पहली बार नगुगी ने लाइब्रेरी देखी तो वो चाहते थे की पूरी दुनिया की किताबे पढ़ लें. उनकी लिखी किताबें आज दुनिया भर में मशहूर हैं और तमाम भाषाओँ में अनुवादित हुई हैं.

नगुगी के बचपन का काल वही था जब वहाँ मौ मौ विद्रोह हुआ था और चर्चिल की सरकार ने करीब डेढ़ लाख लोगों को एक कैंप में बंद कर उन्हें तरह तरह से यातनाएं दे रही थी. उन्हें बिजली का झटका दिया जाता, कोड़े बरसाए जाते थे और उन्हें भूखे मरने के लिए छोड़ दिया जाता था. इन सब का जिक्र इस लेखक की पुस्तक ‘वीप नॉट, चाइल्ड’ इत्यादि में मिलता है.

नाइजीरिया के लेखक चिनुआ अचेबे को अपना आदर्श मानने वाले नगुगी वा थिओंगो इस समय कैलिफोर्निया युनिवेर्सिटी में प्रोफेसर हैं. इनका कहना है, “समाज में औरतों की स्थिति किसी भी देश की प्रगति का असली मापदंड हैं !”

(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा पूरी कर विवेक आजकल दिल्ली में रहते हैं. विवेक एम्स में कार्यरत है और नॉन वायलेंट कम्युनिकेशन पर कार्य कर रहे हैं. आप सामजिक मुद्दों से गहरे जुड़े हैं.)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here