यानुस कोरजैक: एक महान शिक्षक जिसने मौत की राह पर भी नहीं छोड़ा बच्चो का हाथ

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बोधिसत्व विवेक/

बोधिसत्व विवेक

इंसान चाहे तो हैवानियत की इतनी हदें पार कर दे कि यकीन करना मुश्किल हो जाये लेकिन यही इंसान चाहे तो बड़े से बड़े दुःख, यातना और दरिंदगी के सामने भी करुणा, साहस और शांति कीऐसी मिसाल कायम कर दे जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अकल्पनीय हो. ऐसा ही कुछ हुआ द्वितीय विश्वयुद्ध के यहूदी नरसंहार या होलोकास्ट के दौरान. हिटलर, अईचमन, गोइब्ल्स जैसे लोगों ने एकबड़े समुदाय के अंदर घृणा और हिंसा ऐसे भर दी कि उस दौरान जैसे जुल्म और कत्लेआम हुए उससे तो इंसानियत से भरोसा ही उठ जाये. लेकिन उसी वक़्त ऐसे अनगिनत नायक उभरे जिन्होंने ऐसाहोने नहीं दिया. इनमें से कितनों की कहानियाँ उन तक ही रह गईं. मगर एन फ्रैंक और विक्टर फ्रैंकल जैसे लोगो की कहानियाँ बाहर आयीं और आज तक सुनी जा रही हैं. इन्हीं नायकों में से एकयानुस कोरजैक भी था जो शायद होलोकास्ट ही नहीं इतिहास के किसी भी अध्याय में अद्वितीय है.

यानुस कोरजैक का जन्म 1878  में पोलैंड की राजधानी वारसा के एक यहूदी परिवार में हुआ था. उनका असली नाम हेन्नरिक था जो बाद में, लेखक के तौर पर उन्होंने बदल कर यानुस कोरजैक रखलिया. कोरजैक के बचपन में ही उनके पिता का निधन हो जाने पर उनके उपर परिवार की जिम्मेदारी आ पड़ी और छोटी उम्र में ही वो ट्यूशन पढ़ाने लगे. 18 साल की उम्र से उन्होंने शिक्षा पद्धतिऔर बच्चों के पालन-पोषण के बारे में लिखना शुरू कर दिया. बहुत से पोलिश अखबारों में लिखते हुए उन्होंने वारसा विश्वविद्यालय से मेडिसिन की पढाई की और बाल-रोग विशेषज्ञ बने. उन्होंनेवहां बच्चों के एक अस्पताल में काम करना शुरू कर दिया और युद्ध के समय कुछ समय फौज में भी डॉक्टर रहे.

यानुस कोरजैक ने करीब 20 किताबें लिखीं जिसमें बच्चों के लिए नाटक और कहानियाँ थीं और बच्चों के अधिकारों के समर्थन में लिखे लेख थे. उन्होंने सैकड़ों लेख बच्चों को सम्मान और प्रेम से पालनेको लेकर लिखे जो आज तक मार्गदर्शन कर रहे हैं. उनके लिखे कुछ नाटक, लेख और कहानियाँ अनगिनत भाषाओं में अनुवादित होकर दुनिया के कोने-कोने में पढ़ी जा रही हैं. उन्होंने अपने लेखनमें चुनौतीपूर्ण स्थिति में भी बच्चो से प्रेमपूर्वक व्यवहार करने का समर्थन किया और किसी भी प्रकार की कड़ी सजा को गलत कहा. उनका लेख ‘बच्चे को कैसे प्यार दे’ आज भी बहुत प्रसिद्द है. बच्चों केलिए उनका अथाह प्यार उनके लेखन में साफ़ था और उन्होंने बच्चो के लिए कुछ ऐसी कहानियाँ लिखीं जो परी-कथा जैसी होते हुए भी मुश्किल परिस्थितियों से जूझना सिखाती हैं और प्रेरणा देतीहैं. उनकी किताब ‘किंग मैट द फर्स्ट’ में एक बच्चा अचानक राजा बना दिया जाता है और अपनी गलतियों से सीखता है. यह किताब अपने आप में नायब है और बच्चों के लिए लिखी गयीलेकिन वयस्कों को सीख देती दुनिया की सबसे बेहतरीन किताबों में से एक है. इस किताब के पहले पन्ने पर कोरजैक ने अपने बचपन की तस्वीर लगाई और बच्चो को संबोधित करके लिखा कि येजरुरी है कि तुम जानो कि मैं तब कैसा दिखता था जब मैं खुद राजा बनना चाहता था, अब नहीं जब मैं इस राजा की कहानी लिख रहा हूँ. ये बेहतर है कि हम राजाओं, महान यात्रियों और लेखकों केबचपन की तस्वीर देखें जब उन्होंने कोई मुकाम हासिल नहीं किया था वरना हमें लगेगा कि वो शुरू से ही सबकुछ जानते थे और हम उनके जैसा नहीं बन सकते.

कोरजैक ने यह भी लिखा कि वयस्कों को ये किताब नहीं पढनी चाहिए क्योंकि वो इसे ठीक से समझ नहीं पाएंगे लेकिन फिर भी वो चाहें तो कोशिश कर सकते हैं.

उनकी एक और किताब, कज्तुस द विज़ार्ड, में हैरी पॉटर जैसा किरदार 1933 में ही आ गया था जिसके पास जादू सीखने के लिए कोई स्कूल नहीं था. कोरजैक ने बच्चों को प्रेरित करने के लिए महानवैज्ञानिक लुईस पाश्चर की जीवनी भी सरल शब्दों में लिखी और बताया कि कैसे पाश्चर ने गरीबी और कठिनाइयों से हार न मानते हुए दुनिया में नाम कमाया.

बच्चों की शिक्षा के बारे में उनका मानना था कि आपसी संवाद इसका सबसे जरुरी हिस्सा है और बच्चों के हाथ में उनसे जुड़े फैसले लेने की ताकत होनी चाहिए और यही उन्हें सशक्त करेगा. उनके इन्हीं विचारों के कारण कुछ लोग उनको ‘बच्चों का कार्ल-मार्क्स’ भी कहते हैं.

एकयानुस कोरजैक का झंडा

सन् 1909 में एक संस्था के लिए काम करते हुए उनकी मुलाकात स्टेफा से हुई जो खुद अनाथ बच्चों के लिए काम करने को इच्छुक थी और कुछ साल बाद उन दोनों ने वारसा में यहूदी बच्चो के एकअनाथालय – डॉम सिरोत – का जिम्मा संभाला. कोरजैक ने इस संस्था का पूरा डिजाइन खुद तैयार किया और इसमें ऐसे क्रांतिकारी प्रयोग किये जो आगे चलकर पूरी दुनिया के लिए मिसाल बने. एकतरह से वहां रहने वाले बच्चे ही उस जगह को चला रहे थे और बड़े फैसले ले रहे थे. इस अनाथालय में उन्होंने बच्चों का खुद का एक गणतंत्र स्थापित किया जिसमें उनका खुद का पार्लियामेंट था, खुदका न्यायालय था और ‘द लिटिल रिव्यु’ नामक एक न्यूज़पेपर भी था. ये अपने आप में एक अनोखा न्यूज़पेपर था जिसमें ज़्यादातर लेख खुद बच्चे लिखते थे और उनकी एक पूरी संपादन टीम थी. इसन्यूज़पेपर के पाठक सैकड़ों पत्र लिखा करते थे और कोरजैक खुद बहुत से पत्रों का जवाब लिखते थे. सन् 1930 में उन्होंने अपना एक रेडियो प्रोग्राम भी शुरू किया जिसमें बच्चों के अधिकारों की बातकी जाती थी और इस प्रोग्राम के दौरान वो ‘द ओल्ड डॉक्टर’ नाम से सन्देश देते हुए बड़े मशहूर हुए.

सन् 1939 में जब द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया तो अनाथालय में बच्चो की संख्या बढ़ गयी और बढती उम्र के बावजूद कोरजैक ने बच्चों की सेवा में रात-दिन एक कर दिया. वहां खाने और पैसे की भारीकमी थे और उनका काफी समय अमीर लोगों से अनाथालय के लिए चंदा मांगने में बीतता था. साल भर के अंदर ही नाज़ी सेना ने वारसा पे कब्ज़ा कर लिया. सारे यहूदियों को करीब 3. 4 किलोमीटरके एक इलाके में बंद कर दिया जाना था जिसे वारसा-घेटो कहा गया. कोरजैक का अनाथालय इस इलाके से बाहर आता था इसलिए अनाथालय को भी घेटो के अंदर जाने का हुक्म मिला. उस समयतक एक लेखक, डॉक्टर और शिक्षाविद के रूप में कोरजैक बहुत मशहूर हो चुके थे और उन्हें इस घेटो से बाहर रहने का प्रस्ताव मिला तो उन्होंने ठुकरा दिया और सभी बच्चों के साथ वारसा-घेटो केअंदर एक नयी बिल्डिंग में शिफ्ट होने का निर्णय लिया. उस पूरे इलाके में हर तरफ खाने की कमी थे, हर कमरे में औसत 10 लोग रह रहे थे और रोज न जाने कितने बीमारियों से मर रहे थे. ऐसीपरिस्थिति में भी कोरजैक ने अनाथालय को पहले की तरह ही चलाया और बच्चों को हिम्मत दिलाते रहे.

कोरजैक दयालु होने के साथ-साथ बड़े ही साहसी और जुझारू थे. उस समय हर यहूदी को पहचान के लिए अपनी बाँह पर एक पीला सितारा पहनना होता था और नहीं पहनने वालो को बड़ी कड़ीसजा मिलती थी, लेकिन कोरजैक और उनके अनाथालय के सभी बच्चों ने वो सितारा पहनने से इनकार कर दिया. यही नहीं उन सबने मिलकर अपना खुद का झंडा बनाया जो बच्चों के अधिकारों औरआज़ादी का प्रतीक था और इस हरे रंग के झंडे को लेकर घेटो के अंदर साहसिक रैली भी निकाली.  घेटो के अंदर भी उन्हें फिर से नयी बिल्डिंग में शिफ्ट करने को कहा गया और उन्होंने फिर नयीजगह सबकुछ स्थापित किया. ऐसे निर्मम समय में भी बच्चे अपनी आस न छोड़ें इसलिए कोरजैक उन्हें रचनात्मक गतिविधियों में भी लगाये रखते थे. उनके निर्देशन में उन्ही दिनों बच्चो ने वहांरविन्द्रनाथ टैगोर के प्रसिद्द नाटक पोस्ट-ऑफिस का मंचन भी किया जिसकी कहानी उनकी जिंदगी से मिलती जुलती थी.

साल 1942 में जर्मन सेना का हुक्म आया कि सभी बच्चों को त्रेबेलिंका कैम्प में जाना होगा. ये कैम्प यहूदियों को मारने की लिए ही बनाया गया था, इस कैम्प में गैस-चैम्बर थे और वहां भेजे जाने कामतलब साफ़ था कि अब उन सबको मार दिया जायेगा. उस वक़्त पोलैंड की गुप्तचर संस्था ने भी कोरजैक से संपर्क किया और उन्हें वहां से निकालने की पेशकश की लेकिन उन्होंने साफ़ जवाब दिया की वो अपने बच्चो को छोडकर कहीं नहीं जायेंगे और अगर वो बच्चो को बचा नहीं सकते तो कम से कम अंतिम साँस तक उनका ख्याल तो रख सकते हैं. कोरजैक के प्रशंसको और चाहने वालो ने उन्हें बाहर निकालने के लिए लगातार संपर्क किया लेकिन वो अपने निर्णय पर अडिग रहे.

6 अगस्त 1942 को जब त्रेबेलिंका कैम्प ले जाने के लिए जर्मन सेना आई तो उन्होंने खुद 192 बच्चो को तैयार किया और उनसे कहा की वो अपने सबसे अच्छे कपड़े पहने. जब बच्चे बाहर आये तो सबके पास एक नीले रंग का बस्ता था और हाथ में उनकी पसंदीदा किताब या खिलौना. उन्हें अनाथालय से चल के उस जगह जाकर रुकना था जहां से ट्रेन उन्हें म्रत्यु-शिविर की तरफ ले जाएगी. जानुस कोरजैक एक बच्चे को गोद में लिए सर झुकाए सबसे आगे चल रहे थे, उनके पीछे दो-दो की लाइन बनाये, एक दूसरे का हाथ पकड़े उनके प्यारे बच्चे चल रहे थे. सबसे बड़ा बच्चा तकरीबन 13 साल का था. उनके साथ उनका बनाया हुआ झंडा भी लहराता हुआ जा रहा था. सारे बच्चे बिलकुल प्रसन्न थे क्योंकि कोरजैक ने सबको बताया था कि हम सब शहर से दूर जा रहे हैं, ऐसी जगह जहाँ तंग दीवारों की जगह फूलो से भरे मैदान होंगे, झरने होंगे जहाँ सब नहा सकेंगे और पेड़ो पर खाने के लिए बेरी और मशरूम लदे होंगे.

अनाथालय के कई कर्मचारी और कोरजैक की सबसे करीबी सहयोगी स्टेफा भी उनके साथ थी. जब ट्रेन पकड़ने के लिए सब एकसाथ खड़े थे तो वहां एक जर्मन ऑफिसर ने कोरजैक को पहचान लिया क्योंकि वो उसके पसंदीदा लेखक थे. उसने उन्हें बच निकलने के लिए मदद देनी चाही लेकिन उन्होंने फिर से मना कर दिया और कहा – “हम जब किसी बीमार बच्चे को रात में अकेला नहीं छोड़ते फिर ऐसे समय में इन बच्चो को कैसे छोड़ सकता हैं?”. वो सब ट्रेन में बैठ वहां से रवाना हो गए और उस दिन के बाद जानुस कोरजैक और उन बच्चो के बारे में कोई खबर नहीं आई. ये जाहिर था कि उन सबको त्रेबेलिंका कैम्प पहुचने के बाद गैस-चैम्बर में मार दिया गया.

उस दिन बच्चो को ट्रेन की ओर ले जाते हुए कोरजैक को जिसने भी देखा, जिंदगी भर के लिए वो तस्वीर उसके साथ रह गयी. ये वो पल था जब सारी नफरत और हिंसा एक इंसान के सामने बौनी साबित हुई, उसका त्याग और समर्पण सर झुकाते हुए भी जीत गया.

यानुस कोरजैक की पहली पुस्तक किंग मैट का कवर

कोरजैक ने अपने जीवनकाल में अनगिनत बच्चों की जिंदगी बचाई और संवारी. इजराइल के प्रसिद्द पेंटर आइजैक बेल्फर ने अपना बचपन उसी अनाथालय में गुजारा और बड़े होने पर अपने परिवार की आर्थिक सहायता करने वापस चले गए. आज भी वो नम आँखों से उस पल को याद करते हैं जब उनकी माँ आर्थिक तंगी के कारण उन्हें कोरजैक के पास छोड़ने गयी थी और वो उस डॉक्टर की गोद में बैठे हुए उसकी दाढ़ी और चश्में से खेलते हुए दोस्त बन गए. वो बताते हैं की कोरजैक के लिए बच्चो के वही अधिकार थे जो किसी व्यस्क के पास थे और उन्हें हर चीज के लिए प्रोत्साहन दिया जाता था. वहीँ से आइजैक ने पेंटिंग की प्रेरणा ली और उनके जीवन को नयी दिशा मिली. विश्व युद्ध खत्म होने के बाद जब आइजैक वापस उस अनाथालय को देखने गये तो वहां सिर्फ कहानियाँ ही बची थी.

90 साल से उपर के आइजैक कहते हैं कि आज भी वो यानुस कोरजैक के साथ रहने वाले एक छोटे से बच्चे हैं और अनाथालय से म्रत्यु कैम्प ले जाने वाला रास्ता उनके जेहन में बार-बार आता रहेगा. उनकी पेंटिंग्स में कई जगह वही मंजर दिखाई देता है. आइजैक बेल्फर के जैसे सैकड़ो बच्चो को उस शिक्षक ने बेशुमार प्यार दिया और जीवन भर उनके अधिकारों की वकालत की.

कुछ लोग इंसानियत से हमारा भरोसा कभी नहीं उठने देंगे, जरुरी है की उनकी कहानी बार-बार दोहराई जाये. आज के इस दौर में जब हिंसा और घृणा को तमाम देशो और समुदायों में संरक्षण मिल रहा है और उसे तर्कसंगत बताया जा रहा है, हमें आने वाली पीढ़ी को उन नायको के बारे में बताना है जो इतने ताकतवर थे की मरते दम तक उन्होंने नफरत को गले नहीं लगाया. अपने ही अंदर करुणा और हिंसा के दोनों चेहरे लिए जब कभी हम अपने भीतर के इंसान को जिन्दा रखने के लिए संघर्ष करते हों तो क्या पता उस वक़्त शायद यानुस कोरजैक की कहानी एक मशाल की तरह हमारे रास्तों को रोशन कर दे.

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(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से समाजकार्य की शिक्षा पूरी कर विवेक आजकल दिल्ली में रहते हैं. विवेक एम्स होस्पिटल में कार्यरत है और भारत में नॉन वायलेंट कम्युनिकेशन के कौशल को विकसित करके प्रसार करने पर भी कार्य कर रहे हैं. बच्चो और युवाओ के साथ और उनके लिए काम करना इन्हें बेहद पसंद है और ये वाराणसी में 15 वर्षो से बच्चो के लिए कार्य कर रही कुटुम्ब संस्था के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. आप सामजिक मुद्दों, साहित्य और सिनेमा से गहरा जुड़ाव रखते हैं. इनसे मोबाईल नंबर 9999024748 पर संपर्क किया जा सकता है)

 

3 COMMENTS

  1. इस जीवन कथा से मार्गदर्शन ज़रूर हुआ है मेरा, बहुत आभारी हूं विवेक भाई का कि आपने यह जीवनी प्रस्तुत की है।
    मुझे पहले ना पड़ने का मन था किंतु फिर रुचि बढ़ती गई। ज़रूर ऐसे लोगों के बारे में जानना अच्छा है

  2. A very emotional tale in a tough time, the man truly had a heart of gold and was bold like a lion. The story provides a vivid description of the situation and truly makes my eyes water…

  3. Very painful journey…..Lekin ye kuchh matr hi log hote h jo Bhagwan ka asli roop hote h, jo me , mera me Vishwas nahi rakhte…..jo spiritual power se less hote h, drud Sankalp k sath..jinki rag rag me insaniyat, pyaar or tyaag hota h…..Dil Ko chhu gayi, sach me……
    Me ab jyada lekh padh nahi pata…..Lekin tumhare lekhan ne bahut aakrshit Kiya h…. shukriya

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