अब इश्कहकीकी वाले नहीं मजाजी वाले होते हैं फकीर

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अम्बुज पाण्डेय/

अम्बुज पाण्डेय

हमारे यहां पुराने समय में बहुत फकीर हुआ करते थे। मांगने से जो मिला खा लिए, धरती पर सो गये और आसमान को ओढ लिया। उस समय अन्न कम उपजता था, बड़ी विपन्नता थी। उसी तरह के फकीर भी होते थे। एकदम संतोषी वृत्ति वाले।

आधुनिक युग में फकीरों की बाढ आ गयी। ढेर से फकीर होने लगे। राजनीति से लेकर बिजनेस- व्यापार तक, नेशनल-इंटरनेशनल तमाम फकीर। यदि आप चोरी-छिपे दारू लेने जा रहे हैं, जुआ खेल रहे हैं तो चार-छः फकीर आपसे मिल जाएंगे। कई फकीरों के यहां तो तमाम सीए नौकरी करके रोजी-रोटी चलाते हैं, पुलिस के बड़े अफसर सैल्यूट मारते हैं। ये सब इश्कहकीकी वाले नहीं ..मजाजी वाले फकीर हैं। कोई झोला उठाकर जाने वाला, तो कोई फटी जेब में हाथ डालकर दिखाने वाला।

आधुनिक युग में फकीरों की बाढ आ गयी

ऐसी हीं दो जनश्रुतियां है। सिकंदर जब भारत में आया तो किसी संत को समाधिस्थ देखकर जिज्ञासु हो उठा। उसने जानना चाहा कि यह व्यक्ति क्या चाहता है ? लोगों ने समझाया कि ईश्वरीय आराधना की यह एक विधि है। लोग अपनी मनोकामना या मोक्ष प्राप्ति के लिए ऐसी साधना करते हैं। सिकंदर ने उनकी समाधि को भंग कर दिया और बोला, मैं विश्वविजेता सिकंदर हूं। क्या चाहिए ?  संत ने ऊपर से नीचे तक सिकंदर को देखा और बोले ..इतनी अच्छी धूप लग रही थी। आपके खड़े हो जाने से वह अवरूद्ध हो गयी है। कृपा करके हट जाइए, मुझे कुछ नहीं चाहिए।

इस घटना ने सिकंदर को हतबुद्धि कर दिया और वह आगे बढ गया।

अकबर बहुत कलाप्रेमी था। उसे कवियों, कलाकारों और संगीतज्ञों से अथाह स्नेह था। वह सदा इनके बीच रहना चाहता था। इसीलिए उसने तमाम गुनीजनों को संरक्षण दे रखा था। कहते हैं अकबर ने महात्मा सूरदास की गायकी के बारे में बहुत सुन रखा था। वह उन्हें सदा अपने दरबार में देखना चाहना था। एकबार उसने अपने अनुचरों को भेजकर सूरदास को बुलवाया। सूरदास को देखकर वह उनकी प्रशंसा करने लगा और बोला कि कोई गीत-भजन सुनाइए। सूरदास ने नकार दिया। वे बोले मेरा शाहंशाह एक हीं है और मैं उसी की आज्ञा शिरोधार्य करता हूं। बड़े अनुनय-विनय के बाद सूरदास राजी हुए और एक भजन गाया। भजन सुनकर अकबर तन्द्रालस मूर्छना में चला गया। होश आने पर सूरदास को दरबार में रहने का प्रस्ताव दिया। सूरदास के नकार देने के बाद भी वह कुछ देने को आतुर था। उसका हठ देखकर सूरदास बोले ..आप दे नहीं पाएंगें। यह हिकारत शाहंशाह अकबर के लिए तौहीन और चुनौती थी। उसने धैर्य रखते हुए कहा …आप निःशंक मांगिए, आपको मिलेगा। सूरदास ने कह दिया -आज के बाद मेरे सामने मत पड़िएगा !

…अकबर ने अभय दे दिया।

इससे हमें ज्ञान मिलता है कि पुराने संत और फकीर सिंहासन को लात मार देते थे।

भले जान जोखिम में पड़ जाय। उन्हें किसी की परवाह नहीं होती थी। आज के संत और पेशेवर फकीर बिना सिंहासन और राज्याश्रय के कोई चमत्कार नहीं कर सकते।

वर्तमान फकीरों, मुल्ला-मौलवियों और साधु-संतों के चरणों में कोटि-कोटि परनाम। क्योंकि सब में एक हीं सर्वव्यापी सत्ता मुखर हो रही है। किसी का अपमान ऊपरवाले का अपमान हो सकता है। उसी ने सबको बनाया है।

(अम्बुज पाण्डेय पेशे से शिक्षक हैं और उनके पास भाषा की वो रवानी और नज़र है जो विरले ही कहीं देखने को मिलता है.)

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