क्या ईश्वर का अस्तित्व है ?

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विवेक/

एक बार की बात है, गौतम बुद्ध सुबह-सुबह एक बड़ी सभा में बैठे हुए थे. एक व्यक्ति वहां आया और एक पेड़ की छाँव में खड़ा हो गया. इस व्यक्ति की ईश्वर में बहुत आस्था थी. लेकिन अब काफी उम्र बीत जाने के बाद थोड़ी सी शंका मन में घर कर गयी थी. उसे पता था कि ईश्वर है लेकिन फिर भी थोड़ी सी शंका मन में आ गयी कि मान लो कोई ईश्वर न हुआ तो? इसका मतलब तो मेरी पूरी जिंदगी तो भगवान का नाम जपते व्यर्थ हो गयी!

जो लोग रोज के सिर्फ पांच-दस मिनट भगवान की पूजा कर निवृत हो जाते हैं उनके मन में शंका नहीं आती लेकिन जिसने पूरा जीवन आस्था को समर्पित कर दिया, हो सकता है उसके मन में कभी ऐसी शंका आ भी जाये.

अब जब बुद्ध सामने थे तो उस व्यक्ति ने सोचा क्यों न अपनी आस्था की पुष्टि कर ली जाये. लेकिन ये पूछ पाना आसान भी नहीं था क्योंकि वो कोई साधारण आस्तिक नहीं था, वह सिर्फ रोज मंदिर जाता ही नहीं था बल्कि उसने तो खुद सैकड़ों मंदिर बनवाए थे. अब जीवन के इस पड़ाव पर, अपनी आस्था में इतना कुछ निवेश करने के बाद ये पूछना की ईश्वर है या नहीं. ये बड़ा मुश्किल था. इसलिए वो सभा से थोड़ी दूर खड़ा रहा, एक पेड़ की छाँव में.

लेकिन थोड़ी देर बाद हिम्मत जुटा कर उसने गौतम बुद्ध से पूछ ही लिया –

“क्या कोई भगवान है?”

बुद्ध ने उस व्यक्ति की तरफ देखा और बिलकुल स्पष्ट जवाब दिया –

“नहीं !”

वहाँ सभा में बुद्ध के सारे शिष्य बैठे हुए थे जो हमेशा इस सवाल से जूझते रहे कि भगवान है या नहीं. पूरी सभा ने अब राहत की साँस ली क्योंकि अब तक जितनी बार भी उन्होंने बुद्ध से ये सवाल पूछा कि भगवान हैं या नहीं, बुद्ध ने कुछ न कहा और बस मौन धारण कर लिया. लेकिन उस दिन पहली बार उन्होंने एक सीधा जवाब दिया – भगवान नहीं है!

पूरी सभा में अब हर्ष की लहर थी; इतने दिनों की जद्दोजेह्द ख़त्म हुई, व्याकुलता और भ्रम ख़त्म हुआ जब खुद बुद्ध ने घोषणा कर दी. पूरे नगर में ये संदेश फ़ैल गया और सारे दिन इस बात का उत्सव मनाया गया.

उसी दिन शाम को फिर से सभा हुई. एक दूसरा व्यक्ति आया जो उसी पेड़ की छाँव में खड़ा था. ये व्यक्ति परम नास्तिक था. ऐसा नास्तिक जो दस मिनट में किसी आस्तिक के सामने ये साबित कर दे कि भगवान नहीं है, और उसने हजारों लोगों को अपने तर्क से नास्तिक बनाया भी था. लेकिन अब काफी उम्र बीत जाने के बाद थोड़ी सी शंका मन में घर कर गयी थी कि मान लो अगर कोई भगवान सच में हुआ तो? मरने के बाद क्या वो मुझे माफ़ करेगा? और लोग तो ये भी कहते हैं कि उसके पास यातना देने के बड़े साधन हैं! मैंने तो कितने लोगों को नास्तिक बना दिया, मुझे तो और ज़्यादा यातना देगा!

भीतर से उसे पता था कि ईश्वर नहीं है लेकिन फिर भी थोड़ी सी शंका मन में आ ही गयी और अब जब बुद्ध सामने थे तो उस व्यक्ति ने सोचा क्यों न अपनी शंका दूर कर ली जाये. तो इस व्यक्ति ने भी हिम्मत जुटा कर आखिर पूछ ही लिया –

“क्या कोई भगवान है?”

बुद्ध ने उस व्यक्ति की तरफ देखा और बिलकुल स्पष्ट जवाब दिया –

“हाँ !”

अब इस बार फिर से सभा में एकदम बेचैनी और हलचल मच गयी. अभी सुबह ही बुद्ध ने कहा था कि भगवान है, लेकिन अब शाम को कह रहे हैं कि भगवान नहीं है. जो जिज्ञासा शांत हो चुकी थी वो फिर से और भी ज़्यादा व्याकुल और गहरी हो गयी !

गौतम बुद्ध ने ऐसा क्यों किया?

अगर आप विश्वास करते हैं कि कोई भगवान है या ये मानते हैं कि कोई भगवान नहीं हैं, चाहे आप आस्तिक हैं या नास्तिक…आप एक ही नाव में सवार हैं. आप किसी ऐसी चीज पर विश्वास करते हैं जिसे आप नहीं जानते हैं. फिर इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या मानते हैं. इस तरह तो कोई भी जो मर्ज़ी चाहे मान ले, जरुरी नहीं कि इसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध हो.

लेकिन जब आपको ये एहसास होता है कि –मैं नहीं जानता!

तब जानने की व्याकुलता जन्म लेती है और इस व्याकुलता से जन्म होता है एक खोज का, एक तलाश का.जिसके जीवन में जानने की व्याकुलता है, एक तलाश है…उसी के जीवन में सम्भावना है ज्ञान की, बोध की, बुद्ध होने की !!!

(सदगुरू जग्गी वासुदेव की वार्ता ‘डज़ गॉड एक्सिस्ट’ से अनुवादित और प्रेरित)

(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा पूरी कर विवेक आजकल दिल्ली में रहते हैं. विवेक एम्स में कार्यरत है और नॉन वायलेंट कम्युनिकेशन पर कार्य कर रहे हैं. आप सामजिक मुद्दों से गहरे जुड़े हैं.)

4 COMMENTS

  1. बहुत आसान सी बात है समझने के लिए अगर मन में पहले ही से ‘है’ या ‘नहीं’ वाली धारणा ने गहरा वास् न कर रखा हो…
    और फर्क क्या है कि वह है भी या नहीं । मैं आस्तिक या नास्तिक बने रहने के वास्ते अगर दूसरे इंसान के साथ भेदभाव करूँ तो क्या फर्क…देखा तो है नहीं उसे किसी ने…हाँ अगर देखा है तो वो है इंसान जो जरूरतों को लेकर जूझ रहा है, कुछ सामाजिक बराबरी के लिए और कुछ स्वयं के व्यय के लिए…और जो इनसे ज़रूरतों को भी पार कर गये, वो सबसे बड़ी और सबकी समस्याओं को सुलझाने के लिए लोगों में जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे हैं गाहे बगाहे …
    मैं भी शायद हूँ उनमे कहीं…

  2. बड़ी समस्याओं से मेरा मतलब है विश्वव्यापी समस्याएं जैसे ग्लोबल वार्मिंग और नदियों का सूखना…हरियाली का कम हो जाना…ज़बरदस्ती करना किसी के साथ… वगेरह वगेरह…

  3. Both,,, thiest n athiest believe in the same concept…. The only difference is…. First accept n second denies it…. How can you deny anything which Don, t exist at first hand… In that way ,an athiest is the one who believes more bin the existence of God,,, by denying it ….

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