स्नो ग्लासेस से एविएटर तक धूप चश्मे का सफर

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चैतन्य चंदन/

इस साल गरमी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। दिन के समय यदि घर से निकलना पड़े तो धूप से बचने के लिए धूप चश्मा (जिसे अंग्रेज़ी में सनग्लासेस या शेड भी कहा जाता है) ज़रूरी लगने लगता है। काला या रंगीन चश्मा आजकल युवाओं के लिए फ़ैशन स्टेटमेंट भी बन गया है। लेकिन क्या आपको पता है कि धूप चश्मे का चलन कब से शुरू हुआ और इसका इस्तेमाल सबसे पहले किसने किया था?

सूरज की हानिकारक किरणों से आंखों को बचाने के लिए सबसे पहले क़रीब 2000 वर्ष पूर्व उत्तरी अमेरिका के आर्कटिक क्षेत्र के लोगों (जिसे एस्कीमो कहा जाता है) ने चश्मा बनाकर पहनना शुरू किया था। इसे निगाउगेक या इग्गुअग नाम दिया गया था। वर्तमान में इसे स्नो ग्लासेस के नाम से जाना जाता है। इस चश्मे को बनाने के लिए आर्कटिक महासागर में पाए जाने वाले एक विशालकाय जीव वालरस के दांतों और लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता था।

धूप चश्मे के वर्तमान स्वरूप की बात की जाए तो ऐतिहासिक संदर्भ प्राचीन चीन और रोम में इसके इस्तेमाल की ओर इशारा करते हैं। चीन में धूप चश्मे का उपयोग 12वीं शताब्दी के आसपास शुरू हुआ था। इस धूप चश्मे के लेंस स्फटिक नामक एक पारभासक पत्थर को सपाट काटकर बनाए जाते थे।यह चश्मा भले ही सूरज की पराबैंगनी किरणों से बचाने में कामयाब न हो, लेकिन सूरज की चमकीली और आंखों में चुभने वाली धूप से बचाने में कारगर था। इसे आई ताई नाम दिया गया था, जिसका अर्थ होता है- सूरज को ढंकने वाले काले बादल। प्राचीन चीनी ग्रंथों में भी एक ऐसे चश्मे का उल्लेख मिलता है, जो क्रिस्टल से बना होता था और इसका इस्तेमाल चीन के न्यायालयों में न्यायाधीश पहनते थे, ताकि सुनवाई के दौरान उनकी भाव-भंगिमाओं को छुपाया जा सके।

रोम के शासक नीरो के बारे में कहा जाता है कि वह तलवारबाज़ी के मुक़ाबले देखने के लिए पन्ना नामक एक रत्न का उपयोग करता था। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि नीरो को दूरदृष्टि दोष था और कुछ का कहना है कि वह पन्ना का इस्तेमाल धूप से अपनी आंखों को बचाने के लिए करता था। हालांकि वास्तविक वजह अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं लगाया जा सका है।

18वीं शताब्दी के मध्य में लंदन के एक नेत्र रोग विशेषज्ञ ने कुछ दृष्टि सम्बंधी समस्याओं के निदान के लिए हरे रंग के लेंस के साथ प्रयोग शुरू किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि वास्तव में हरा रंग सूरज की किरणों से आंखों को बचाने के लिए सबसे ज़्यादा मुफ़ीद है। 19वीं और 20वीं शताब्दी में सिफ़लिस के मरीज़ों को पीले और भूरे रंग के लेंस वाले चश्मे के उपयोग की सलाह दी जाती थी, क्योंकि सिफ़लिस के मरीज़ों की आंखें तेज़ प्रकाश के प्रति बेहद संवेदनशील हो जाती हैं।

20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में धूप चश्मे का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ने लगा। हॉलीवुड के फ़िल्मी सितारों ने इसे लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1929 में सैम फ़ॉस्टर नामक व्यक्ति ने अमेरिका में सस्ते धूप चश्मे का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया। फ़ॉस्टर अपने बनाए धूप चश्मों को अटलांटिक सिटी, न्यू जर्सी में समुद्र के किनारे बेचते थे। ये चश्मे लोगों की आंखों को धूप से बचाने के लिए बनाए गए थे। इस चश्मे को बनाने के लिए इंजेक्शन मोडयूलिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। फ़ॉस्टर ने चश्मे को सस्ता बनाने के लिए लेंस के लिए कांच की जगह सेल्यूलॉयड का इस्तेमाल किया। सैम फ़ॉस्टर द्वारा बनाए गए इस धूप चश्मे को लोकप्रिय बनाने के लिए पहली बार विज्ञापनों का प्रयोग किया गया, जो बेहद सफल साबित हुआ। वर्ष 1936 में जब एडविन एच लैंड नामक व्यक्ति ने धूप चश्मा बनाने के लिए जब पोलोरॉयड फ़िल्टर का इस्तेमाल किया, तब पोलरायज़्ड धूप चश्मे अस्तित्व में आए। वर्ष 1970-72 में फोटोक्रोमिक लेंस वाला चश्मा बनाने में कामयाबी मिली। इस लेंस की ख़ासियत यह है कि तेज़ रोशनी और तेज़ धूप के सम्पर्क में आने पर लेंस का रंग बदल जाता है, और इस तरह से यह आंखों को नुक़सान से बचाता है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रे बन नामक चश्मा बनाने वाली कम्पनी ने एविएटर स्टाइल धूप चश्मा बनाया, जो कि तेज़ रोशनी से सैनिकों की आंखों का बचाव कर सकता था। इस चश्मे को बनाने में ध्रुवीकरण (पोलराईज़ेशन) तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। हालांकि रे बन ने जब इस चश्मे को वर्ष 1937 में उपभोक्ता बाज़ार में उतारा तो यह चश्मा बड़ी हस्तियों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ।

(लेखक दिल्ली से प्रकाशित एक अंग्रेजी पत्रिका में कार्यरत हैं और स्वतंत्र लेखन में सक्रिय हैं)

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