घोड़ों की लीद से निपटने के लिए हुआ था दुनिया का पहला अंतर्राष्ट्रीय शहरी नियोजन (अर्बन प्लानिंग) सम्मेलन

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उमंग कुमार/

आज सरकारें इससे परेशान हैं कि सड़कों पर गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है औरे साथ में प्रदूषण भी. हर दिन इससे निपटने के नए-नए तरीके खोजे जा रहे हैं. लेकिन आज से तकरीबन सौ साल पहले यही गाड़ियां विश्व समुदाय के लिए वरदान बनकर आईं थी.

उस समय के प्रभावशाली मुल्क बड़े पशोपेश में थे कि सड़कों पर लोग अब चलेंगे कैसे! समस्या यह थी कि घोड़ों की संख्यां बढ़ती जा रही थी. इसके साथ ही सडकों पर इन घोड़ों के मल-मूत्र जमा होते जा रहे थे.

उदाहरणस्वरूप लन्दन को ही ले. वर्ष 1900 में इस शहर में करीब 11,000 हंसोम कैब थी. यह एक तरह की घोड़ागाड़ी होती है जिसका आविष्कार 1834 में जोसफ हंसोम ने किया था. उन्ही के नाम पर इस घोड़ागाड़ी को हंसोम कैब बुलाया जाता था. उस शहर में इसके अतिरिक्त कई हजार, घोड़े से चलने वाली बसें भी थी. इस बस को चलाने के लिए एक बार में 12 घोड़ों कि आवश्यकता होती थी. इसके अतिरिक्त और भी कई छोटी घोड़ा गाड़ियाँ चलती थीं जो माल वाहक का काम करती थीं.

इन सबकों मिलाकर लन्दन की सड़कों पर रोज 50,000 से अधिक घोड़े दौड़ते थे. आप अनुमान लगा सकते हैं कि जिस सड़क पर घोड़े इतनी संख्या में मौजूद हों उस शहर के सड़क का क्या हाल होगा. लोगों का सड़कों पर चलना मुहाल हो गया और इस तरह बड़ी मात्रा में सड़कों पर पड़ी लीद, नीति-निर्माताओं के लिए भारी सिरदर्द बन चुका था.
आंकड़े बताते हैं कि एक घोड़ा प्रति दिन औसतन  6 किलो से लेकर 15 किलो के बीच लीद करता है. अगर अधिकतम से तुलना की जाए तो लन्दन की सड़कों पर रोजाना करीब साढ़े सात हजार क्विंटल लीद जमा हो रही थी. इससे आपको अनुमान लगाने में थोड़ी और मदद मिलेगी. इतनी मात्रा में पड़ी लीद लोगों को सड़क पर चलने में जो दिक्कत देती थो सो तो एक, दूसरे कई बीमारियाँ जैसे टाइफाइड बुखार या ऐसे अन्य बीमारियाँ भी शहरी समाज को परेशान किये हुए था.

यदि प्रत्येक घोड़े ने प्रति दिन एक लीटर मूत्र भी विसर्जित किया तो यह पहले से सड़क पर पड़े लीद के साथ मिलकर स्थिति को बदतर बनाने के लिए काफी था. इतना ही नहीं इस विषय पर लिखी गई जोर्ज ई वारिंग की किताब स्ट्रीट क्लीनिंग से यह भी पता चलता है कि घोड़ों के काम करने कि आयु औसतन तीन साल होती थी. सड़कों पर घोड़ों का शव मिलना आम बात थी. कुल मिलाकर यह कि लंदन की सडकें अपने ही लोगों में ज़हर फ़ैलाने का काम करने लगीं थी.

स्थिति इतनी बदतर हुई कि टाइम्स ऑफ़ लन्दन ने 1894 में एक लेखा छापा और चेतावनी दी कि अगर बिगड़ती स्थिति पर तुरंत काबू पाने के प्रयास नहीं किये गए तो लन्दन की सड़कों पर अगले 50 वर्षों में गोबर के 9 फीट ऊँचे ढेर लगे होंगे. इसे 1894 का ‘ग्रेट हॉर्स मैनोर क्राइसिस’ के नाम से जाना जाता है

यह तो रहा लन्दन का हाल. दुनिया के अन्य बड़े शहरों की स्थिति इससे जुदा नहीं थी. मसलन, न्यूयॉर्क को ही ले लीजिये. इस शहर में घोड़ों की संख्या तकरीबन एक लाख थी माने लंदन से दुगुना. इन आंकड़ों के साथ वहां की स्थिति का अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा.

ऐसी स्थिति के मद्देनजर वर्ष 1898 में दुनिया भर से विभिन्न देशों के प्रतिनिधि अपने शहरों कि सबसे बड़ी समस्या का हल ढूंढने के लिए न्यूयार्क में एकत्रित हुए. यह था दुनिया का पहला अंतर्राष्ट्रीय शहरी नियोजन सम्मेलन. तमाम देश से जमा हुए इन दिग्गजों को यह चिंता सता रही थी कि कैसे सड़क पर जमा हो रहे लीद से छुटकारा पाया जाए.

इस भयानक स्थिति पर बहस तो खूब हुई, पर इसका समाधान नहीं निकल पाया. लोग तो यहाँ तक सोचने लगे थे कि अब शहरी सभ्यता बर्बाद ही हो जायेगी.

लेकिन जैसा कि कहा जाता है, आवश्यकता आविष्कार की जननी है, वैज्ञानिकों ने मोटर गाडी का अविष्कार किया. हेनरी फोर्ड नामक कंपनी ने मोटर कारों को सस्ते दाम पर उपलब्ध कराना शुरू क्या और इस तरह बड़े बड़े शहरों क सड़क धीरे धीरे घोड़ों से मुक्त हुए.

वर्ष 1912 आते आते सड़कों का दृश्य बदल चूका था. अब मोटर वाहन ही परिवहन के मुख्य स्रोत थे. मजेदार यह कि सौ साल भी नहीं हुए थे इस परिवर्तन को कि लोगों का लगने लगा कि यह समाधान भी स्थाई नहीं है. इन गाड़ियों से निकलने वाला धुंआ अब कईयों की जान ले रहा है और सरकारें फिर से इससे निजात पाने के रास्ते ढूंढ रहीं हैं.

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