मी और जे: जहां जीवन कैनवास और अनुभव रंग बन बैठे हों

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उमंग कुमार/

ढूंढता रहता हूँ ए ‘इकबाल’ अपने आप को, आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंजिल हूँ मैं.’  खुद को ढूँढने का कौन सा रास्ता अलामा इकबाल ने चुना था इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है. पर मीनाक्षी जे (मी) और जे सुशील (जे) ने इसके लिए कला को ही साधन चुना है. जोश और कुछ नया करने की बेचैनी से लबरेज यह युगल मिलने पर आपके अन्दर पॉजिटिव उर्जा का संचार तो करता ही है पर साथ ही आप को इनसे रश्क भी होने लगता है. कला की साधना से इन्होंने अपने लिए जो जीवन तैयार किया है उससे आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते.

हाल ही में इंडिया हैबिटेट सेंटर में इनके परफोर्मेटिव आर्ट्स की प्रदर्शनी लगी थी. दीवारों पर टंगी तस्वीरों में विभिन्न रूप में मौजूद मी और जे को देखकर लोगों को अपने व्यक्तित्व के तहखानों में झाँकने का मौका मिला. इस दरम्यान यह बात बड़ी शिद्दत से दिमाग में उमड़ती रही कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान क्या इनके भीतर, निजी तौर पर और बतौर दंपति भी, कोई परिवर्तन आया होगा!  इस पूरी प्रक्रिया से गुजरने के बाद क्या ये दोनों लोग पहले जैसे रह गए होंगे?

शायद ऐसा इसलिए भी होता रहा होगा क्योंकि कहीं न कहीं दर्शकों को भी वहां अपने व्यक्तित्व के कुछ अनछुए और भूले पहलु की झलक मिल रही थी.

इस सवाल के जवाब में मी और जे कहते हैं कि जब इनलोगों इस ‘आई इन टुगेदरनेस’ की सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर शुरुआत की, तो पाया कि इसकी तैयारी में इनके अपने व्यक्तित्व की कई सारी परतें खुल रहीं हैं.  बताते चलें कि इंडिया हैबिटेट सेंटर में लगी प्रदर्शनी फेसबुक पर लागातार 52 सप्ताह तक चले ‘आई इन टुगेदरनेस’ श्रृंखला से कुछ चुनिन्दा तस्वीरों का ही प्रदर्शन था. इस श्रृंखला में मी और जे बॉडी आर्ट्स के माध्यम से खुद को अपने दांपत्य जीवन में तलाशते रहे. इस प्रयास को सोशल मीडिया पर काफी सराहा गया.

खैर, तो सवाल था कि क्या इस पूरी प्रक्रिया से गुजरने के बाद ये लोग पहले जैसे रह गए होंगे, इस पर इनका कहना है कि इस पूरे प्रक्रिया के दरम्यान इन्हें इसका भान हुआ कि ये अपने व्यक्तित्व के बड़े हिस्से से परिचित नहीं है. “प्रत्येक सप्ताह हमलोगों को तैयारी करनी होती थी. इस तैयारी में हमलोग अपने डर, ख़ुशी, कमजोरियां और व्यवहार इत्यादि के बारे में ढेर सारी बातें किया करते थे. इसी बातचीत से हमें खुद को और बेहतर समझने का मौका मिला. जैसे कि हमारे व्यक्तित्व का कुछ हिस्सा हमारे बचपन के अच्छे-बुरे अनुभवों का नतीजा है. ऐसी ढेर सारी चीज़ें निकल कर आयीं अमूमन जिनपर नज़र नहीं जाती थी.  इस दरम्यान ऐसे ढेर सारे अनुभव हुए, अपने व्यक्तित्व को समझने का मौका मिला और  शायद उसपर काम करने का भी.”

इस प्रदर्शनी का ख़याल कैसे आया इस पर ये लोग कहते हैं, “हमलोगों आपस में बात करते थे. किसी एक विषय का चयन कर के उसको कलात्मक तरीके से मौजूं बनाते थे फिर सोशल मीडिया में लोगों के सामने रख देते थे. लोगों ने इसे काफी सराहा. इसी दौरान प्रदर्शनी का विचार बना.”

वैसे तो इनका कहना है कि बॉडी आर्ट्स भारत में भी कहीं न कहीं मौजूद होगा पर जिस तरह से इन लोगों ने इस कला को सामान्य लोगों के बीच मौजूं बनाया है वह मानीखेज है. खासकर उन भारतीय लोगों के लिए जिनका बाहरी खासकर पश्चिमी दुनिया से बहुत वास्ता नहीं है.

ये ऐसे दंपति  हैं जिनके जीवन के हर हिस्से में रंग है, कला है, यात्राएं हैं, साहस है और एक कहानी है.  बॉडी आर्ट्स के अतिरिक्त ये लोग दूसरे के घरों को रंग से सजाने का भी शौक रखते हैं. इसके लिए दूर-दूर की यात्राएं करते हैं.  ये यात्राएं देश में सामान्यतः हरी-भरी और केसरिया (बुलेट) के सहयोग से होती हैं. अभी तक इनलोगों ने करीब 70 हज़ार किलोमीटर की यात्रा कर ली है.  इस दौरान 19 राज्यों में कम से कम सत्तर परिवारों के साथ दीवार पर रंगों से खूबसूरत भावनाओं के उकेरने का कार्य किया है.

इन दीवारों में जहां सुदूर क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों की दीवार शामिल हैं तो वहीँ मुम्बई और गोवा के शहरी दीवार भी इनके ब्रश से खूबसूरत हुए हैं. अनाथलय और जेल में भी जाकर इनलोगों ने बच्चों और कैदियों के साथ मिलकर रंगों की छटा बिखेरी है और वहाँ रह रहे लोगों के निराश जीवन में रौनक लाई है.

इस प्रयास में दीवारें, घर तो खूबसूरत हुए ही लेकिन लोगों के शामिल होने से उन्हें भी रंगों से खेलने का साहस मिला. घूम- घूम कर किये गए इस कलात्मक प्रदर्शन को मी और जे ने नाम दिया हुआ है –आर्टोलॉग. इसी नाम से वेबसाइट भी मौजूद है जहां आपको इनके कलाकारी दुनिया से परिचित होने का मौका मिलेगा.

यह आर्टोलॉग पिछले कुछ सालों में एक अद्भुत प्रोजेक्ट के रूप में उभरा है. इसकी शुरुआत भी कुछ संयोग जैसी ही है. मी को अकेले होने से डर लगता है. जबकि जे को गरीब होने से. मी ने जे से जुड़ने से पहले कोई यात्रा नहीं की थी जबकि जे ने यात्राएं तो खूब की थी और आगे करना भी चाहते थे. पर इन यात्राओं को सार्थक बनाना इनकी चुनौती थी.

दोनों की अधूरी कहानी कुछ इस तरह आगे बढ़ी कि यहाँ वहाँ घुमते-फिरते, खट्टे-मीठे अनुभव लेते एक शाम दोनों ने तय किया कि यात्रा और कला को एक साथ जोड़ा जाए. मी को यात्रा करने का मौका मिला और जे को अपनी यात्रा को सार्थक बनाने का.

आजकल मी और जे सेंट लुइस, मिसौरी, यूएसए में हैं. मी सेंट लुइस में वाशिंगटन विश्वविद्यालय से मैकडॉनेल स्कॉलर के तौर पर एमएफए (मास्टर ऑफ़ फाइन आर्ट्स) की पढाई कर रही हैं. जे ने फिलहाल अपनी बीबीसी नौकरी से ब्रेक लिया है और अपने परिवार के नन्हे मेहमान की देखभाल करने में मी की मदद करते हैं.

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