कैसा रहेगा कब्रों के बीच नाश्ता, अहमदाबाद का एक अनोखा रेस्तरां

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अहमदाबाद का लकी रेस्तरां

शिखा कौशिक/

भारत विविधताओं का देश है, पर कभी-कभी तो इतनी विविधिता देखने को मिलती है कि एक बार को भरोसा ही न हो. ऐसा ही एक उदाहरण आपको गुजरात के अहमदाबाद शहर में मिलेगा. कब्रों के बीच एक होटल जिसमें लोग खूब मजे से खाते-पीते मिलेंगे.

जी हाँ! असली कब्र. सामान्यतः कब्रिस्तान की तरफ से अकेले गुजरने में लोग एक बार सोचते हैं. लेकिन इस कब्रिस्तान में जहाँ एक दो नहीं कई कब्रें हैं वहाँ आपको लोग एकदम निश्चिंत होकर खाते-पीते हुए मिलेंगे औरपरोसने वाले भी उसी भाव में निर्लिप्त दिखते हैं.

यह रेस्तरां अहमदाबाद शहर में काफी प्रसिद्ध है. कहीं भी किसी ऑटो वाले से पूछिए कि लाल दरवाजा जाना है और वो आपसे पूछ बैठेगा कि वहीँ न जहाँ मस्कबंद और चाय मिलती है.

कुल 26 कब्रों के बीच खड़ा यह खाने-पीने का ठिकाना लकी रेस्तरां के नाम से प्रसिद्ध है. यह पूछने पर कि इन कब्रों की वजह से लोग यहाँ आने से कतराते तो नहीं है, इसके वर्तमान मालिक राजीव नायर कहते हैं कि स्थितिइसके बिलकुल विपरीत है. कई लोग तो इसी की वजह से यहाँ खाने के लिए आते हैं. इन कब्रों को हमारे परिवार में शुभ माना जाता है.

एम एफ हुसैन द्वारा बनायी गयी पेंटिंग

देखने से भी पता चलता है कि यहाँ स्थित कब्रों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता है. ये कब्र लोहे के की छड़ों से घेर दिए गए हैं. कहते हैं कि ये कब्र सोलहवीं शताब्दी के सूफी संत के चेलों की हैं. इस सूफी संत का मकबराभी इस रेस्तरां के पास में ही है.

रोज सुबह जब लोग इस रेस्तरां को खोलने आते हैं तो बड़ी शिद्दत और ध्यान से इन कब्रों की साफ़-सफाई की जाती है. उनको फूल-माला से सजाया जाता है.

राजीव बताते  हैं कि कब्रिस्तान में पहले मस्काबंद और चाय की रेहड़ी शुरू हुई. यह करीब 65 साल पहले की बात है. चालीस साल पहले लोगों की भीड़ देखते हुए इसे एक बढ़िया खाने-पीने के होटल के तौर पर विकसितकिया गया. ये लोग केरल के रहने वाले हैं. यूँ तो माना जाता है कि राजीव नायर के पिता कृष्णन कुट्टी ने ही कब्रिस्तान में यह होटल खोली थी, पर राजीव बताते हैं कि मामला यह नहीं है. ऐसे होटल का विचार और फिर इसकासंपूर्ण विकास केएच मोहम्मद नाम के एक शख्स ने किया है. कृष्णन कुट्टी इनके मित्र हुआ करते थे और इस होटल में उनके पार्टनर थे.

लोग बताते हैं कि इस होटल में कभी एम ऍफ़ हुसैन भी आया करते थे. राजीव बताते हैं कि हुसैन जब भी अहमदाबाद आते थे उनके इस होटल में आना नहीं भूलते थे. यहीं बैठकर चाय पीते थे. यह 2014 की बात है जब एकबार हुसैन वहाँ पहुंचे. उसी होटल में चाय पीते-पीते उन्होंने एक बढ़िया पेंटिंग बनाई और होटल के मालिक को तोहफे में दे दिया. यह पेंटिंग आज भी इस होटल की शोभा बढ़ा रही है.

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