एक ऐसा शायर जो ताउम्र आग से खेलता रहा

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नज़्म सुभाष/

नज्म सुभाष

17 अक्टूबर 1884 को अजीमाबाद (पटना) में जन्मे मशहूर शायर मिर्जा वाजिद हुसैन “आस अजीमाबादी” शायरी के क्षेत्र की एक ऐसी आग थे जिसमें उनके समकालीन शायर तो झुलसे ही यहां तक कि मिर्जा गालिब भी न बच सके। मगर इस आग की लपटों ने उन्हें भी न बख्शा और यही वजह रही कि उनका साहित्यिक और सामाजिक दोनों तरह से बहिष्कार कर दिया गया। मगर यह जिंदगी भर अपनी खुद्दारी और सचबयानी से कभी न डिगे और जिंदगी भर इसकी कीमत भी चुकाते रहे। टूटे बिखरे मगर झुके नहीं।

हुसैन साहब के अब्बा जान यूं तो कोई जमींदार न थे मगर उनका रहन-सहन किसी जमींदार से कम भी न था। उन्होंने वाजिद हुसैन की शिक्षा का बेहतर प्रबंध किया अंग्रेजी, अरबी फारसी, उर्दू का उन्हें अच्छा ज्ञान था।

सन 1905 में वह अजीमाबाद से लखनऊ आए और यहीं पर उनकी शादी हो गई। चूंकि खुद्दार किस्म के प्राणी थे लिहाजा रोजी रोटी के लिए इन्हें हमेशा संघर्ष करना पड़ा कभी लाहौर तो कभी इटारसी तो कभी हैदराबाद मगर ज्यादा दिनों तक इनकी कहीं न निभ सकी। लखनऊ के चर्चित प्रेस मुंशी नवल किशोर प्रेस लखनऊ में भी ये मुलाजिम रहे।

चूंकि ये चंगेज खां के वंशज थे लिहाजा लखनऊ में इन्होंने अपना नाम “आस अजीमाबादी” से  बदल कर “यगाना चंगेजी” रख लिया। यह शायरी के साथ शायरी के आलोचक भी रहे और आलोचक भी इस कदर कि उन्होंने अपने समकालीन सफी लखनवी, साकिब लखनवी और अजीज लखनवी जोकि उस दौर की लखनऊ में मशहूर तिगड़ी थी, की शायरी की कटु आलोचना की। लखनवी साहित्यिक समाज इस कदर की तीखी आलोचना का अभ्यस्त न था लिहाजा बिलबिला उठा।

दरअसल बात यह थी कि यह तीनों शायर गालिब के प्रशंसक थे और उन्हीं की परम्परा को निभाते हुए शायरी कर रहे थे। जिससे इन्हें चिढ़ थी इनका मानना था कि गालिब की प्रशंसा में गालिब प्रेमियों ने इतनी ऊंची दीवार उठा दी कि और शायरों के लिए इस दीवार को लांघना मुश्किल हो गया। इनका मत था कि गालिब एक नंबर के बदचलन, जुआंरी और शराबी होने के साथ साथ रीढ़विहीन आदमी थे। देशप्रेम तो उन्हें रत्तीभर न छू गया था। अन्यथा जिस समय बहादुर शाह जफर को रंगून में कैद किया जा चुका था यह बजाय बादशाह के लिए जिसका ताउम्र नमक खाया, कुछ करने के अपनी पेंशन के लिए कोलकाता जा जाकर कंपनी बहादुर के आगे एड़िया रगड़ रहे थे।

उन्होंने इसी बात को लेकर दो रुबाइयां लिखीं –

खासा न सही बला से खुरचन है बहुत

तन ढकने को साहब की उतरन है बहुत

रंगून में दम तोड़ता है शाहे जफर

नौशा” के लिए खिलअते पेंशन है बहुत

 

(नौशा गालिब का ही दूसरा नाम था)

तलवार से कुछ काम न खांडे से गरज

मोमिन से सरोकार न टांडे से गरज

दिल्ली की सल्तनत गयी, ठेंगे से अपने

गालिब को है हलवे मांडे से गरज

 

हकीकत तो यह भी थी कि ग़ालिब से ज्यादा उनके प्रशंसकों से आजिज थे और इसीलिए वो ऐसे प्रशंसकों को जूते की नोक पर रखते थे…मगर समस्या ये थी कि साहित्यिक आलोचना कब व्यक्तिगत आलोचना बन जाती थी या तो ये समझते न थे या फिर समझकर अनदेखा कर रहे थे….हालांकि साहित्यिक समाज का दोमुंहापन आज का नही है ये तब भी था और उन्हें इससे ही नफरत थी..आदमी होता कुछ था लिखता कुछ था दिखना कुछ और चाहता था।..कुछ भी हो मगर इसका असर तो पड़ना ही था।

इनकी कलम ने जब इस तरह से आग उगलना शुरू किया तो इनका साहित्यिक बहिष्कार कर दिया गया। इनके दोस्त यार करीबी सब किनाराकशी कर गये यहाँ तक कि लखनऊ में कोई मुशायरा होता तो इन्हें पूछा न जाता…इन्हें खराब लगता। ऐसे में ये बिना बुलाए पहुंच जाते और तब इन्हें देखकर नौजवान शायरों की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती क्योंकि ये उस्ताद शायर तो थे ही अपने समक्ष किसी को कुछ समझते भी न थे क्योंकि शायरी वाकई में दमदार थी….खैर ये मुशायरे में गुनगुनाते-

लखनऊ की जात से, दो- दो सेहरे मेरे सर

 एक तो उस्ताद यगाना , दूसरे दामाद हूं।”

ये गालिब पर ही न रुके जिगर मुरादाबादी, जोश मलीहाबादी ,फानी बदायूंनी , असगर गोंडवी जैसे शायरों के साथ साथ सज्जाद जहीर और प्रेमचंद जैसे प्रगतिशीलों को भी न बख्शा। यह लगातार हमले करते रहे इनकी कलम तलवार की माफिक लहू उगलती रही। इसका खामियाजा यह हुआ कि ये आग उन्हें खुद जलाने लगी। लखनऊ धीरे धीरे इनसे दूर होता गया और वह दाने-दाने के मोहताज हो गए मगर इन्होंने अपनी शायरी में इसका रोना कभी न रोया।

यहां तक तो फिर भी गनीमत थी मगर यह आग अभी और भी बहुत कुछ जलाना चाहती थी अब इनकी कलम इस्लाम पर आग उगलने लगी-

समझ में ही नहीं आता पढ़े जाने से क्या हासिल

 नमाजों के हैं कुछ मानी, तो परदेसी जबां क्यों है ?”

 

सवाल यकीनन वाजिब था कि आखिर हिंदुस्तान में रहकर नमाज की भाषा विदेशी क्यों है….क्या नमाज हिंदुस्तानी जबान में नहीं हो सकती कि सभी इसके मायने जान सकें।

खैर,इस्लाम पर इन्होंने और भी बहुत कुछ लिखा। अब तो पानी सर से ऊपर जा चुका था। ज्यादातर खामोश रहने वाला और अपनी मेहमाननवाजी के लिए दुनिया भर में मशहूर लखनऊ उबल पड़ा….. फिर वो हुआ जो अबतक किसी शायर के साथ न हुआ था और न ही यगाना को उम्मीद थी।  अपने ही शहर के दामाद का मुंह काला करके गधे पर बैठाकर इनका जुलूस निकाल दिया गया।

और फिर बड़ी मुश्किलों के बाद छोड़ा।

इनकी वतनपरस्ती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब देश का बंटवारा हुआ तो इनका पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया ये अकेले रह गये मगर इन्होंने अपना देश न छोड़ा।

खैर 4 फरवरी 1956 को इन्होंने नक्खास के पास शाहगंज में अपनी अंतिम सांस ली। इन्होंने जो दोस्त भी बनाये थे आज वो दुश्मन थे…या फिर ये कहूं कि दुश्मन ही बनाए थे तो ज्यादा सही होगा लिहाजा इनके मरने की खबर को गुप्त ही रखा गया और चुपचाप हैदरगंज कर्बला में सुपुर्दे खाक कर दिया गया। डर था कि कहीं इनकी मैयत का भी बहिष्कार न कर दिया जाए। बाद में जब इनकी बेटी पूना से आई तब जाकर इनकी कब्र को पक्का कराया गया जिस पर यह शेर अंकित है-

खुद परस्ती कीजिए या हक परस्ती कीजिए

आह किसदिन के लिए नाहक परस्ती कीजिए।।”

और इस तरह पटना से निकली चिंगारी लखनऊ में आग बनकर ताउम्र जलजला लाती रही फिर यहां की मिट्टी में दफन होकर हमेशा के लिए खामोश हो गई।

(पुस्तक “आपका लखनऊ” से साभार। लेखक ग़ज़लकार हैं और स्वतंत्र लेखन में सक्रिय हैं।)

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