मेघालय का गाता हुआ गाँव जहाँ संगीत एक भाषा है और सभी के अपने तराने हैं

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शिखा कौशिक/

भारत विविधताओं का देश है. बोल-चाल, खाने पीने से लेकर पहनावे तक में थोड़ी सी दूरी पर बदलाव देखने को मिल जाता है. इतना ही नहीं, यदि हम रीति-रिवाज़ और संस्कृति की बात करें, तो पता चलता है कि अपने ही देश के कई अद्भुत पहलुओं से हम अब तक अनभिज्ञ हैं. आज हम आपको बताएंगे मेघालय के एक गाँव के बारे में जो कि अपनी भाषा के मामले में एकदम अनोखा है.

कोंग्थोंग मेघालय का एक दूरस्थ गाँव है जो कि सीटियों और चहचाहट की आवाज़ से गूंजता रहता है, पर यह कोई चिड़ियों का संगीत नहीं है बल्कि यह एक अनोखी परंपरा है, जिसमें स्थानीय लोग एक दूसरे को संगीत के माध्यम से बुलाते हैं। यहाँ मेघालय की घुमावदार पहाड़ियों के रसताल में बसे, कोंग्थोंग की माताएं और कुछ दूरस्थ गाँव के लोग वहां हर एक बच्चे के लिए एक विशेष राग बनाते हैं।

गाँव में रहने वाले सभी लोग जो कि मुख्यत:खासी हैं एक दूसरे को इस छोटी सी धुन से संबोधित करते हैं. वैसे तो उनके पास परंपरागत ‘असल’ नाम भी हैं , लेकिन इनका उपयोग शायद ही कभी किया जाता है।

इसी परिप्रेक्ष्य में एक सामुदायिक नेता रोथल खोंगसिट बताते हैं,“लेकिन अगर मेरे बेटे ने कुछ गलत किया है , अगर मैं उससे नाराज़ हूँ, तो उसने मेरे दिल को तोड़ दिया, उस पल में मैं उसे प्यार से गाकर बुलाने के बजाए उसे उसके वास्तविक नाम से बुलाउंगा”

प्रकृति के साथ सद्भाव

कोंग्थोंग बहुत लम्बे अरसे से बाकी दुनिया से दूर रहा है, निकटतम शहर तक पहुँचने के लिए भी कई घंटो की कठिन यात्रा करनी पड़ती है , यहाँ बिजली सन् 2000 में पहुची है जबकि धूल से भरी कच्ची सड़के सन् 2013 में।

यहाँ बोरस घास काटने में ही लोगों के पूरे दिन निकल जाते हैं क्योंकि यही उनकी आय का मुख्य स्त्रोत है , कुछ बच्चों को छोड़कर गाँव के लगभग सभी लोग काम करने जंगलों में चले जाते हैं।

गाँव में रहने वाले सभी लोग जो कि मुख्यत:खासी हैं एक दूसरे को इस छोटी सी धुन से संबोधित करते हैं. वैसे तो उनके पास परंपरागत ‘असल’ नाम भी हैं , लेकिन इनका उपयोग शायद ही कभी किया जाता है

जंगल में रहते हुए एक दूसरे से बातचीत करने के लिए, ग्रामीण लोग एक दूसरे को उसके संगीतमय नाम से बुलाते हैं जो कि आस पास फैली हुई प्रकृति की आवाज़ से प्रेरित होते हैं, यह प्रक्रिया लगभग ३० सेकंड तक चलती है ।

“जीवों की अपनी पहचान है .पक्षी, इतने सारे जानवर ,उनके पास एक दूसरे को बुलाये जाने के तरीके हैं ।” इस परंपरा को “जिन्ग्र्वाई लाव्बेई” के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है “ कबीले की पहली महिला का गीत” जो की खासी लोगों की पौराणिक मूल माँ(देवी) के सन्दर्भ में कहा जाता है। भारत के बांकि पितृसत्तात्मक राज्यों के लिए यह एक असमान्य बात हो सकती है कि यह एक मातृसत्तात्मक समाज है।जहाँ सम्पति और जमीन माँ से बेटी तक जाती है. यहाँ जबकि पति अपनी पत्नी के पास जाते हैं और उसका उपनाम धारण करता है। यहाँ के लोगों का मानना है कि माँ परिवार की देवी होती है क्योंकि एक माँ ही एक परिवार की देखभाल करती है. यह इन्हें पूर्वजों से विरासत में मिला है।

आधनिक दुनिया

बच्चों की देखभाल करना महिलाओं की जिम्मेदारी है. वहीँ राज्य से जुड़े हुए सारे कार्य पुरुषों की ज़िम्मेदारी हैं।    “जिन्ग्र्वाई लाव्बेई” परम्परा की उत्पत्ति ज्ञात नहीं है,लेकिन स्थानीय लोगों का मानना है कि यह गाँव जितना ही लगभग पांच शताब्दी पुरानी परंपरा है। इस परंपरा के इतिहास को अंको में गिना जा सकता है, हालाँकि, आधुनिक दुनिया  टीवी और मोबाइल के आकर में कोंग्थोंग गाँव में जाती है। गाँव में अब बॉलीवुड से प्रेरित कुछ नए संगीतमय नाम भी हैं। और युवा अपने दोस्तों को सुन्दर नामों से गाते हुए आगे बढ़ रहे हैं, वे उन्हें फ़ोन करने के बजाए उन्हें उनके संगीतमय नाम से पुकारना ज्यादा पसंद करते हैं ।

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