फिलेडेल्फिया में हुआ एक चमत्कार: जो आज हमसब को जानना बेहद जरुरी है

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साभार: कम्पैशन कनाडा

थोम बांड/

अनुवाद: विवेक

थोम बांड

कुछ सालों पहले मेरी जीवनसाथी को विरासत में कुछ फर्नीचर मिला, अपनी एक आंटी से जो फिलेडेल्फिया में रहती थी. कुछ सोचविचार के बाद हमनें तय किया कि हम खुद एक ट्रक किराये पे लेकर वहां से फर्नीचर लेकर आयेंगे.

फैसला यह हुआ कि मैं और मेरा बड़ा बेटा मिलकर इस काम को अंजाम देंगे. एक रविवार की सुबह हम फिलेडेल्फिया के लिए निकल लिए. हमारे घर से फिलेडेल्फिया काफी दूर था पर खिली धूप वाले एक सुन्दर दिन होने की वजह से हम दोनों बड़े जोश में थे.

हमने अपने किराये के ट्रक के अन्दर रेडियो चलाया, संगीत सुना और यात्रा के दौरान खूब मजे किये. चार घंटे बाद हम फिलेडेल्फिया शहर के अन्दर थे.  शहर में हम जितना अन्दर जा रहे थे हमें और संकरी सड़के मिल रही थीं. जब हम अपने गंतव्य के करीब पहुचे तो पाया कि  हमारे बड़े ट्रक के मुकाबले सड़क काफी संकरी थी.

जब मैंने पर्ल स्ट्रीट में अंतिम मोड़ लिया, कोलिन और मैंने एक दुसरे की तरफ चिंता भरी नजरो से देखा, क्योकि हमें एहसास हो गया था कि अब ये सड़क इतनी संकरी है कि वापस मोड़ने का कोई रास्ता नहीं है. हमारे पास इन संकरी गलियों  और उसमें खड़ी कारो के बीच से गुजरने के सिवा कोई चारा नहीं था.

तकरीबन 100 फीट आगे बढ़ने के बाद हम एक ऐसी जगह पर पहुंचे जहां हम अपने ट्रक के साथ लगभग रेंग रहे रहे थे. मेरे बेटे ने अपना सर  ट्रक के बायीं तरफ लटकाया हुआ था और मैं दायी तरफ सतर्कता से देखते हुए बढ़ रहा था.

जब सबसे तंग जगह पहुचे, मैंने उससे पूछा – “सब ठीक है?”

उसने अपना हाथ आगे-पीछे हिलाया और मुझे लगा कि वो कह रहा है – “आगे बढ़ो!”

और मैंने जैसे ही गाड़ी आगे बढाई, प्लास्टिक के टूटने और कांच के चकनाचूर होने की जोरदार आवाज आई. उस क्षण मुझे एहसास हुआ कि मेरे बेटे के इशारे का मतलब था – “रास्ता नहीं हैं”.

हमने वहां खड़ी एक कार के साइड के शीशे पूरी तरह तोड़ दिए थे.

ये पता लगने के बाद नई हालात से निपटने के लिए मैंने ट्रक किनारे रोक दिया. मैंने जैसे ही ट्रक का दरवाजा खोला, न जाने कहाँ से एक दाढ़ी वाला भीमकाय आदमी आ गया. वो बड़े ही गुस्से में था. उसने मेरी शर्ट पकड़ के मुझे ट्रक के बाहर घसीट लिया और सड़क के किनारे ले आया. मैं उसकी पकड़ से छूटने के लिए जेद्दोजेह्द कर ही रहा था कि वो मुझे घसीट के सड़क के बीच में ले आया. मेरा बेटा एकदम डरा हुआ था और सहमी आँखों से यह सब देख रहा था.

उस विशालकाय आदमी ने मेरे मुंह पर ताबड़तोड़ घूंसे बरसाने शुरु कर दिए. चारो तरफ एक भीड़ इकठ्ठा हो गयी और सब के सब उसको और मारने के लिए प्रोत्साहित करने लगे. उसने मारना जारी रखा, मेरा खून मेरी भौंह से रिसता हुआ मेरी आँखों के अंदर जा रहा था और मैं बेहोश सा होने लगा. मुझे ऐसा लगा कि मेरे बेटे की आँखों के सामने मुझे पीट-पीट कर मार दिया जायेगा.

उसी क्षण अचानक मुझे याद आया कि मेरा फोन मेरी जेब में हैं. मैं किसी तरह उसकी पकड़ से निकला और सड़क पर भागते हुए मैंने  911 डायल कर दिया. मुड़ कर ट्रक में बैठे अपने बेटे की ओर भागते हुए मैंने ओपरेटर से मदद मांगी. भीड़ डरी हुई चिड़ियों के झुण्ड सी तितर-बितर हो गयी और मैं कूद के अपने ट्रक में बैठ गया. मेरा बेटा मेरा इंतज़ार कर रहा था…डर के मारे निशब्द.

मैं भागने के लिए ट्रक स्टार्ट करने को जैसे ही मुड़ा, मैंने देखा की गाड़ी की चाभी नदारद थी…हम फंस चुके थे. मैंने सामने देखा, सारी सड़के खाली थी. अचानक पूरा आस-पड़ोस भूतिया लगने लगा…कहीं एक जीव भी नजर में नहीं था.

हमने अगले 15 मिनट तक वहीँ इंतज़ार किया…शायद मेरी ज़िन्दगी के सबसे लम्बे 15 मिनट !

वहां बैठे-बैठे हमने बचने की एक योजना बनाई, अगर वो हमलावर वापस आ गया तो. मैं उसका ध्यान खीचने के लिए सड़क पर भागूँगा और मेरा बेटा पास के एक कूड़े के डब्बे के पीछे छिप जायेगा. मैंने अपना फ़ोन अपने बेटे को दे दिया और सुनसान सड़क को देखते हुए हम इंतज़ार कर रहे थे. वहां उस गहन चुप्पी के बीच मुझे ख्याल आया कि ये कितना खूबसूरत और गर्म दिन है पर मैं किस तरह कि हालात में हूँ.

अचानक, बिना खिडकियों की, ग्राफिती से सजी हुई एक वैन तेज़ रफ़्तार में फिसलते हुए सड़क के अंत में जा के खड़ी हो गयी. हम बच के भागने के लिए तैयार हो गए. जब उस वैन का पिछला दरवाजा खुला, हमारा डर तुरंत आश्चर्य में बदल गया. आठ पुलिस ऑफिसर, हथियारों से बिलकुल लैस, वैन से बाहर निकले और सड़क को बिलकुल मिलट्री की तरह घेर लिया. हम डर और राहत के बीच उन्हें देखते रहे. उनमें से एक ऑफिसर ने उधर से इशारा किया कि हम नीचे झुक जाएँ और ट्रक में ही बैठे रहें. उसके बाद दो ऑफिसर वही रुके और बाकी कहीं चले गये. हम इंतजार करते रहे और इस अविश्वश्नीय घटना क्रम को देखते रहे.

पांच लम्बे मिनट के बाद, दो ऑफिसर अपने बीच हथकड़ियों में बंधे उस हमलावर को लेकर लौटे. तीसरा ऑफिसर मेरे पास आया और उसने बताया की मैंने जिस कार को टक्कर मारी थी वो उसी आदमी की थी…असल में, उसके पास बस वही एक संपत्ति थी…असल में वो एक बेघर इंसान था और उसी कार में सोता था. ऑफिसर ने ये भी बताया की वो कार चलती भी नहीं है, उसका कोई पंजीकरण नहीं था, कोई बीमा भी नहीं था. उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं हमलावर पर केस करना चाहता हूँ.

मैंने ऑफिसर के कंधे की ओट से उस आदमी को देखा जिसने मुझे पीटा था. हालांकि उस वक़्त उसके गुस्से का जवाब और ज्यादा गुस्से से देना एक स्वाभाविक बात थी, लेकिन जो हुआ वो पूरी तरह से उम्मीद के विपरीत था.

मुझे सिर्फ उसकी तकलीफ दिखी. दो तगड़े पुलिसवालों से घिरा हुआ, जमीन की ओर देखता हुआ वो बिलकुल निराश लग रहा था. मैं सिर्फ उसके चेहरे पर वर्षो की दुर्गति देख पा रहा था, वो दुःख-दर्द देख पा रहा था जो उसने झेला था…और, ठीक उस क्षण, मैं उस इन्सान को समझ पाया…कैसे उस कार को टूटता हुआ देखकर, जो उसकी सुरक्षा का प्रतीक थी और इस पूरी दुनिया में उसकी अकेली संपत्ति थी, वह अपना आपा खो बैठा होगा.

हाँ, मुझे बहुत बुरी तरह पीटा गया था लेकिन मैं सुरक्षित था. मेरा बेटा सुरक्षित था. मैं अपने घर-परिवार के पास वापस चला जाऊंगा और मेरी जिंदगी फिर से सामान्य हो जाएगी. मेरे घाव भर जायेंगे.

सड़क पर खड़े, हथकड़ियों में बंधे इस इन्सान को देखकर, अचानक से कई चीजें मुझे स्पष्ट दिखने लगी. उसका गुस्सा और उसका दर्द. इतना अधिक दर्द कि वह उस शख्स से होते हुए मुझ तक पहुँच गया और इतना अधिक गुस्सा जिससे उसकी जिंदगी अब और तबाह हो जाने वाली थी.मैंने तय किया कि मैं अब इस गुस्से और तकलीफ की अगली कड़ी का हिस्सा नहीं बनूँगा.

मैंने पुलिस ऑफिसर से कहा कि मैं उस आदमी से बात करना चाहता हूँ.

ऑफिसर ने मुझे अविश्वसनीय नजरो से देखते हुए कहा –

“नहीं, तुम बिलकुल ऐसा करना नहीं चाहते हो!”

मैंने एक गहरी साँस ली, उससे नजरे मिला कर के कहा –

“मैं सच में उससे मिलकर कुछ बात करना चाहता हूँ!”

उस अधिकारी ने अपने कंधे उचकाये और अपने साथी अधिकारी के पास गया, कुछ देर चर्चा करने के बाद वो चारो मुड़े और मेरी तरफ चले आये. मैंने अपने हमलावर से बात की और वो सड़क के किनारे की ओर देख रहा था.

“मुझे इस बात का दुःख है कि मैंने तुम्हारी कार को टक्कर मारी. मेरे पास बीमा है, मैं तुम्हारी कार की मरम्मत करा दूंगा.”

उसने धीरे से अपना सर ऊपर उठाया और पहली बार हमारी नजरें मिली. उसने एक पल के लिए मुझे समझने की कोशिश की और आख़िरकार बोला –

“मुझे दुःख है कि मैंने तुम्हे मारा.”

उसने हथकड़ी में बंधे हाथ मुझसे मिलाने के लिए ऊपर उठाये. पुलिस ऑफिसर्स अवाक् होकर देखते रहे और मैं उससे हाथ मिला कर बोला –

“मैं समझ सकता हूँ.”

आज जब मैं उस दिन के बारे में सोचता हूँ तो ये एहसाह होता है कि उस दिन दर्द का एक पूरा चक्र तोड़ा गया था, कम से कम उस लम्हे में तो यकीनन.  वह चक्र मुझे अपने बस में कर सकता था और उसे बर्बाद कर सकता था. मैं सजा देने वाले न्याय के इंजन का एक हिस्सा बन जाता…बयान, कोर्ट में पेशी, गवाही…हर चीज उस इन्सान को जेल में डाल के सजा देने के लिए. वो गिरफ्तार किया जाता, मुकदमा चला के उसे जेल में डाला जाता और उसकी ज़िन्दगी में जो बची-खुची आज़ादी और मर्यादा थी, उससे भी उसको अलग कर दिया जाता.

लेकिन इसके बदले में उस क्षण में जिस तरीके से मुझे ये सब साफ़ दिखा, उसने सब वही खत्म कर दिया…न कोई फैसला, न कोई सजा, न कोई गुस्सा, न कोई नफरत…ऐसी दुनिया जहाँ मैं रहना चाहता हूँ.

हम पुलिस के संरक्षण में वापस लौटे. उस जगह से बाहर निकल के हम चौड़ी सड़क पर आ गए और कुछ ही देर में पुलिस की टुकड़ी ने हमें अलविदा कह दिया. मैं और मेरा बेटा थोड़ी देर तक एक दूसरे को चुपचाप देखते रहे ये सोचते हुए कि जो भी हुआ उसका अंत हम सबके लिए कितना अलग हो सकता था. फिर हम दोनों फूट-फूट कर रोने लगे. वो आंसू राहत, दुःख और कृतज्ञता के थे.

हमने ट्रक में संगीत फिर से चला दिया !

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यह थोम बांड का संस्मरण है जो उनकी लिखी पुस्तक The Compassion Course में प्रकाशित हुआ है. बांड द न्यूयार्क सेंटर फॉर नॉन वैओलेंट कम्युनिकेशन के निदेशक हैं. थोम पिछले 34 साल से एक लेखक, वक्ता और ट्रेनर के रूप में सक्रिय हैं. तकरीबन 15 साल से वो मार्शल रोजेनबर्ग से मिली नॉनवायलेंट कम्युनिकेशन (NVC) के तोहफे को बाँट रहे हैं और उनके The Compassion Course को अब तक 19000 लोग अपने जीवन में शामिल कर चुके हैं. यह कोर्स ऑनलाइन करने के लिए http://www.compassioncourse.org/ पर संपर्क किया जा सकता है.

इस उम्दा लेख का अनुवाद विवेक ने किया है. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा पूरी कर विवेक आजकल दिल्ली में रहते हैं. विवेक एम्स में कार्यरत है और नॉन वायलेंट कम्युनिकेशन पर कार्य कर रहे हैं. आप सामजिक मुद्दों से गहरे जुड़े हैं.

2 COMMENTS

  1. बेहद सुंदर कहानी
    सौतुक को शुभकामनाएँ की इतने कम समय में आप इतने सुंदर साहित्य को अपने पाठकों तक पहुँचा पा रहे हैं। ढेरों बधाई

  2. प्रेरणदायक इस कहानी ने मेरा नजरिया बदला है और व्यक्ति को समस्या से अलग कर के समझने में सहायता की है…
    बहुत-बहुत धन्यवाद विवेक भाई

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