रैनी चढ़ी रसूल की सो रंग मौला के हाथ..!

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अम्बुज पाण्डेय/

अम्बुज पाण्डेय

अज्ञेय कहते हैं, “ईश्वर भी उन्माद से बचने के लिए सृष्टि करता है।” …यदि वह ऐसा न करे तो शायद उन्मादी हो जाय। लेकिन लगता है उससे उन्माद में भी कुछ सृजन हो जाया करता होगा, वरना यह सृष्टि इतनी विश्रृंखल क्यों होती ?

मन में सैकड़ों आवृत्तियां आती रहती हैं। कुछ पढा, कुछ अनपढा। कुछ प्रेरित, कुछ अहैतुक। ऐसे हीं एक दिन सिकंदर और फिर दशरथ माझी की याद आने लगी। लगा कितना पराक्रम था दशरथ माझी में। शायद सिकंदर महान से भी ज्यादा। कहां पैदा हुआ हिंस्र सिकंदर महान ..मुल्कों, महाद्वीपों को लांघता हुआ भारत तक आ पहुंचा था। और दशरथ माझी के पैरों में प्रेम की ऐसी बेड़ियां पड़ी कि वह दस मील भी आगे न जा सका।

1 – सिकंदर 

सिकंदर अपनी मां से नफरत करता था। इतनी नफरत की उससे भागते-भागते वह विश्वविजेता बन बैठा। घोड़े की कसी हुई जीन, रफ़्तार, मद और चीख-पुकार उसके मन को असीम तोष देते थे।

उसमें क्रूरतम हिंसा थी। वह पहाड़ों और समुद्रों को नर-मुंडों से पाट देना चाहता था। नदियों को लोहित देखना चाहता था। लेकिन बाहर से गर्वोन्मत्त सिकंदर ‘महान’, प्रेमतत्व से एकदम खाली था। उसके भीतर युयुत्सा ज्वालामुखी की तरह फूटती थी। युद्धभंजित साम्राज्यों और नतशीश नरेशों, सुल्तानों को देखकर उसका ह्रदय कुछ पल के ठंडा हो जाता था। लेकिन यह ठंडापन उसके मन को ज्यादा देर तक चैन नहीं दे पाता। अगले हीं पल मुरझाते एड्रेनल रश के लिए व्याकुल वह दूसरी विजयों के लिए कूच कर देता।

एलेक्ज़ैंडर फ़िल्म का एक दृश्य है …सिकंदर अपनी भारी-भरकम सेना लेकर हिन्दु कुश पर्वत की चोटी पर खड़ा होकर सैनिकों को स्त्रातजी समझा रहा है। सैनिकों में धीरे-धीरे फुसफुसाहट मुखर होने लगी और सबने विद्रोही स्वर बुलंद कर दिया। एक बूढा सैनिक चिल्लाता है …सिकंदर हम तुम्हारे पिता के साथ युद्ध लड़े …तुम्हारे साथ अनगिनत लड़ाइयां लड़ीं … हम बूढे हो गये हैं। हमारे बच्चे जवान हो गये ..लेकिन उन्हें देखे ज़माना बीत गया। …याद रखो सिकंदर …हमारे देवता तुम्हें कभी माफ़ नहीं करेंगे …अभी भी ख़ैरियत है …अपने मुल्क वापस लौट चलो ..!!

तने हुए लौहस्तंभ की तरह खड़े सिकंदर की मुखाकृति पर धवल तुषारकण उड़ रहे हैं …वह क्षण भर कुछ सोचता है। फिर एक लंबा संबोधन देता है और अंत में कहता है- तुम किन देवताओं की बात करते हो ? आज सिकंदर महान जहां तुम्हें लेकर आया है, वहां तक तुम्हारे बलवान देवता कभी नहीं पहुंच पाए थे।

कहते हैं हमारे यहां से युद्ध करके लौटते समय रास्ते में उसकी मृत्यु हो गयी। यह एक तरह से ठीक भी था। इसके बाद सिकंदर के लिए कुछ शेष न रहा।

जिस उम्र में हम पढाई पूरी करके जबीं का पसीना पोछते, जॉब तलाशते हैं, उस उम्र में सिकंदर विश्वविजय करके परलोक जा चुका था। यह उसकी खुद की प्रेरणा और गति थी। न जाने एक राजा के साथ, राजा जैसा व्यवहार करने वाला उन्मादी सिकंदर महान कैसे हो गया?

2- दशरथ माझी

स्वर्गवासी पत्नी का प्रेम उसके ह्रदय में मशाल की तरह जल रहा था। यदि बीवी की त्रासद और असामयिक मृत्यु न हुई होती तो वह भी एक गुमनाम मज़दूर की तरह जिन्दगी के षटकर्म पूरा करके बिदा हो जाता। एक दिन लकड़ी काटते पति को कलेवा लेकर जाते समय बीवी की मौत हो गयी। मौत दर्दनाक थी ..वह फिसलकर पहाड़ी दर्रे में फंस गयी और इहलीला समाप्त हो गयी। उसे बचाया न जा सका। कहते है ..घर से हाॅस्पिटल दूरस्थ और दुर्गम था।

पत्नी की मृत्यु ने दशरथ माझी को इस्पाती बना दिया। वह एक प्रतिशोधी की तरह पहाड़ का सीना चीरने लगा। ऋतुएं बदलती, उत्सव त्यौहार आते और प्रकृति भी पुराने चोले को बदलकर नया धारण कर लेती। धरती अपने अक्ष पर घूमती रही, सूरज भी हर चार पहर बाद शीतल होता रहा लेकिन दशरथ माझी आठों याम दहकता रहा। अक्षांश-देशांतरों को धकेलने जैसा उसका दुर्धर्ष संघर्ष जारी रहा। पहाड़ों को छेनी, हथौड़े से काटता माझी जीविका के लिए पत्थरों को बेच दिया करता ..लोग ताने मारते और शिकायत भी करते, लेकिन वह इन सबसे बेपरवाह अपनी धुन में रमा रहा।

भगवान राम का चौदह वर्ष बाद वनवास खत्म हो गया था। महाभारत का युद्ध भी अठारह दिन बाद समाप्त हो गया था। लेकिन दशरथ माझी बाईस वर्ष तक पहाड़ को बौना करता रहा। यह न तो कोई स्वैर कल्पना है न हीं देवासुर संग्रामों की लोमहर्षक गाथा। यह स्वातंत्रोत्तर भारत की हक़ीकत है। उस वक़्त हमारे यहां रायबहादुर लोगों ने पंचवर्षीय योजनाओं के अश्व दौड़ाने शुरू कर दिए थे।

बाईस वर्षों के अनथक परिश्रम में दशरथ माझी ने पचपन किलोमीटर को चिपटा करके पंद्रह किलोमीटर में तब्दील कर दिया था। यह एकाकी उद्यम था जनहित के लिए। या यों कहें यह सच्चे प्रेम की इबारत थी, जो एक खुदगर्ज़ के ख़ून-पसीने से लिखी गयी थी।

उसके ललाट की झुर्रियों और बेतरतीब दाढी में कोई रहस्य-रोमांच नहीं था। यह सबाल्टर्न इतिहास का सबसे ताजा अध्याय है जिस पर शायद बड़े कवि या इतिहासकार की नज़र नहीं पड़ी है। या पड़ी हो तो मैं हीं बेख़बर हूं।

जिस उम्र में थके-हारे लोग हाथ पर हाथ रखे मौत की आहट के लिए कान लगाए रहते हैं ..उस उम्र में दशरथ माझी पहाड़ तोड़ रहे थे। यह दास्तां नफ़रत नहीं मोहब्बत की है ..भले वो महान न हो।

ये इश्क़ नहीं आसां इतना तो समझ लीजिए।

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