युवा कवि सोमेश शुक्ल की दस कविताएँ

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आगरे के रहने वाले सोमेश शुक्ल आजकल दिल्ली में रहते हैं. पढ़ाई और रोजगार के जद्दोजहद से समय मिलता है तो कविताओं के साथ साथ पेंटिंग भी करते हैं. इसके पहले इनकी कवितायें कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. इनसे इनके ईमेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.

सोमेश शुक्ल

1-

एक स्वप्न के स्वप्न में खड़ा हूँ
एक स्वप्न जितना ही अकेला
एक मौन जितना भीतरी
एक अदृश्य जितना स्पष्ट

बिना हिले, एक ही जगह पर खड़ी हो रही है बार-बार
एक खाली जगह,

एक स्पेस जो हमारे बीच पसरा है
और मैं तुम्हें चाहता हूँ
तुम्हें चाहे बिना भी।

****

2-

मैं स्पेस पढ़ते हुऐ शब्दों को फलांग जाता हूँ
कहानी में
पेड़ और उसके हरे के बीच में भी एक दुरी होती है
एक अंतराल, ध्वनि और उसके आन्दोलन के बीच में भी होता है

दो मध्य के मध्य एक स्मृति घुटती रहती है
कालांतर में एक नदी बहती रहती है अपने
पानी के बिना भी

अंधी आंखें मुंदी हों जैसे

कुछ नहीं सोचकर मैं
अपने शून्यचित में मुस्कुराता रहता हूँ

दिखता सब है देखता कुछ नहीं

दृश्टि अपने आप, पता नहीं कहां तक चली जाती है
पता नहीं क्या क्या देख आती है
मुझे अंतराल लुभाता है
वहां कोई विन्यास नहीं है

****

3-

मेरे लिये मेरी वस्तुऐं
सिर्फ वहां नहीं हैं जहां पर वह हैं

वे देखने से हमेशा
किसी अतिरिक्त जगह पर पहुँच जाती हैं

अति रिक्तता से भरी हुईं।

****

4-

छुपकर मैं कहीं जाना चाहता हूँ, लेकिन
दरवाजे पर बाहर खड़ा है
कभी से,
बिना अवधि का कोई अंतराल
एक रिक्त स्वप्न की तरह
थामे हुऐ है मेरे छूने को

‘चलने के लिये’ चलता हूँ
तो चलता ही जाता हूँ
ऐसी अविरल यात्रा
जैसे गली का आखरी कोना गली से दूर चला जाता है

किसी की प्रतीक्षा में नहीं
अपने आप के विलुप्त होने में
मैं पाता हूँ कि तरह तरह का कितना कुछ नहीं है जो मेरे इर्द गिर्द बिखरा पड़ा है
बाहर की निस्तब्ध दस्तक तोड़ती है समय की नीरवता
“मानो भीतर बाहर सब एक होना चाहता हो”

छोड़ी हुई इलास्टिक का तरह, मेरा ‘यहां-वहां’ सब सिमटकर
‘कहीं’ पर जा लगना चाहता है।

****

5-

गिरने से अधिक मैं गहराई से डरता हूँ
मरने से अधिक पिस्तौल से

सबसे अधिक डराते हैं छेद
वे किसी अनंत अंधेरे का चेहरा होते हैं
चेहरे आगे-आगे रहते हैं दिखने में

और बहुत कुछ डराता है
जैसे फुलस्टॉप,
वे बात के अंत में बात को रोक देते हैं

व आंखों के भीतर गहरे बैठी अनिश्चितता
अनिश्चितता जो दृष्टि के आगे-आगे चलती है

मैं गिरना देखता हूँ
और गिरने से बच जाता हूँ

मैं अपने जीवन के सबसे ऊपरी माले से कूद चुका हूँ
एक सतह जितनी इच्छा लिये

चाह वह सतह है जो बहुत कम है
अपने में सिकुड़ी हुई
अपने ही वर्णन में संसार की तरह ओझल होती हुई

और ऐसे मेरा सतह-दर-सतह एक गिरना जारी है
लेकिन गिरने में कम से कम अकेला नहीं हूँ
सबकुछ एक साथ गिरा जा रहा है

****

6-

सबसे अधिक करीब आकर
चीजें गुम जाती हैं

एक हमेशा दूसरे में लौटना चाहता है

मेरा विश्वास अब तक देखे गये आकारों से बड़ा है

कुछ है जो आसमान को पृथ्वी तक झुकाता है
जो हर बात में आता है
ध्वनि में मौन के उत्सव की तरह

वह अंधेरों की तरह अपनी जगह से प्रेम करता है
और लौटना भूल जाता है

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7-

मैं सारे रास्तों से बचकर भागा था
मेरा जीवन, जीवित होने का आश्चर्य था
जो कुछ स्मृति में नहीं भी होता था
वह भी स्मृति हो जाता
एक अभाव मेरे होने में मेरे होने का बना ही रहा।

****

8-

जो आया नहीं उसे जाते हुऐ देखने में सबसे अधिक पीड़ा है
भूली हुई बातों का सबसे अधिक अर्थ है

मैं देखते हुऐ देखता हूँ कि
देखती हुई से दीखती हुई आँखें अधिक सुंदर हैं

कैसे अंदर-ही-अंदर टूटकर एक अंदर
अंदर से अलग हो जाता है

मैं खुदको एक तराजू की तरह महसूस करता हूँ
मैं स्वंय न जीना चाहता हूँ न मरना

मैं लेटने में खड़ा हुआ एक आदमी हूँ
मेरा स्वंय न बैठना चाहता है न लेटना न खड़े होना

मैं कमरे में रखी तमाम वस्तुओं की देहों में मेरे
मरने का इन्तजार देखता हूँ

जब मैं कहीं कुछ नहीं देखता हूँ तो मुझे ईश्वर दिखाई देता है

****

9-

तारीखें भूल जाना लेकिन दिन पहचान लेना
बिखरी हुई अनिच्छाओं के बीच बैठे रहना
महसूसने से पहले व छूने के बाद के समय में
बैठकर, न खड़े होने में सारा समय बिताना
और अपने आप को बताने में कहना भूल जाना

ये सब मेरे होने के वे द्रश्य हैं जो मुझे मेरे दिखने के पीछे छुपाये रखते हैं

मैं अपना असहनीय भार लेकर भागा नहीं हूँ
मैं तो वह कहानी हूँ जो भाषा निकाला भोगती है

****

10

हमसे संबंधित हमारा एक हिस्सा हमेशा ही
अदृश्य रहता है
बहुत कुछ है इस घटने में जो ‘न होकर’ ही घट रहा है

हमारा सच हमारे भीतर हमारे ही विपरीत
खड़ा होता है

मैं रास्ते पर अपने होने से आगे-आगे चलता हूँ
जीवन से उकताहट ने मुझे जीवन के मूल में लाकर दफना दिया है
मृत्यु और जीवन का आगाज़ एक साथ ही तो होता है
होना, न होने का ही तो संकेत है,
मैं वस्तुओं की तरफ देखता हुआ उन्हें कभी नहीं सोचता
क्योंकि वे पीछे-पीछे चल देती हैं

हमारा अतीत हमें ढूंढता हुआ वहां तक जाता है जहां अंत में हम नहीं होते
वह आपकी वहीं प्रतीक्षा करता है, कल्प बनकर
ऐसे अतीतों से भरे इस संसार को मैं बंद आंखो से भी देख सकता हूँ

हर जगह, किसी न किसी के अतीत में सिकुड़ रही है
जैसे इस कमरे की दीवारें
निरंतरता में मेरी तरफ बड़ रही हैं
ठीक उसी रफ्तार में, मैं अपनी तरफ लौट रहा हूँ
बीच में, एक दूरी निश्चित होकर गतिवान है।

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