युवा कवि विहाग वैभव की कवितायें

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तस्वीर- गार्गी मिश्रा
विहाग वैभव

विहाग वैभव काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातक तथा परास्नातक की शिक्षा पूरी कर वर्तमान में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से एम.फिल कर रहे हैं। विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं और वेबसाइट पर इनकी कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं।  इनके कुछ कविताओं का मराठी और अंग्रेजी में अनुवाद भी हो चुका है। विहाग की कवितायें आश्वस्त करती हैं।

खुल रहे ग्रहों के दरवाजे

मैंने जिस मेज पर रखा अपना स्पर्श
उसी से आने लगी दो खरगोशों के सिसकने की आवाज़
हाथ से होकर शिराओं में दौड़ने लगी गिलहरियाँ

मैंने जिस भी कमरे में किया प्रवेश
उसी से आयी
कामगार पिताओं वाले बच्चों की जर्जर खिलखिलाहट

जिस हवा को पिया मैंने अभी कभी
उसी में आती रही मुझे पूर्वजों की पसिनाई गंध

होंठ के रंग को करते हुए कत्थई से लाल
जिस भी चुम्बन को जिया मैंने
उसी में बिलखती रही भगत सिंह की प्रेमिका

जिस भी फूल को चुना मैंने
तुम्हारे गर्वीले जूड़े में टाँकने के लिए
वही पकड़कर हाथ मेरा पहुँच गए मुर्दाघर

मैंने जिस भी शब्द को चुना
किसी से लड़ने के लिए
वही जुड़े हाथ  कहने लगे मुझसे
क्षमा ! क्षमा ! क्षमा !

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लड़ने के लिए चाहिए

लड़ने के लिए चाहिए
थोड़ी सी सनक , थोड़ा सा पागलपन
और एक आवाज को बुलंद करते हुए
मुफ्त में मर जाने का हुनर

बहुत समझदार और सुलझे हुए लोग
नहीं लड़ सकते कोई लड़ाई
नहीं कर सकते कोई क्रांति

जब घर मे लगी हो भीषण आग
आग की जद में हों बहनें और बेटियाँ
तो आग के सीने पर पाँव रखकर
बढ़कर आगे उन्हें बचा लेने के लिए
नहीं चाहिए कोई दर्शन या कोई महान विचार

चाहिए तो बस
थोड़ी सी सनक , थोड़ा सा पागलपन
और एक खिलखिलाहट को बचाते हुए
बेवजह झुलस जाने का हुनर

जब मनुष्यता डूब रही हो
बहुत काली आत्माओं के पाटों के बीच बहने वाली नदी , तो
नहीं चाहिए कोई तैराकी का कौशल-ज्ञान

साँसों को छाती के बीच रोक
नदी में लगाकर छलाँग
डूबते हुए को बचा लेने के लिए
चाहिए तो बस

थोड़ी सी सनक , थोड़ा सा पागलपन
और एक आवाज की पुकार पर
बेवजह डूब जाने का हुनर ।

बहुत समझदार और सुलझे हुए लोग
नहीं सोख सकते कोई नदी
नहीं हर सकते कोई आग
नहीं लड़ सकते कोई लड़ाई ।

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बलात्कार और उसके बाद

कई दिनों तक लड़की रोयी , बस्ती रही उदास
कई दिनों तक बड़की भाभी सोयी उसके पास
कई दिनों तक माँ की हालत रही बेतरह पस्त
कई दिनों  तक बाबा दुअरे  देते रह गये गस्त

निर्णय आया लोकतंत्र में कई दिनों के बाद
बरी हो गया ये भी अन्त में कई दिनों के बाद
हवशी हैं मुसकाकर झाँकें कई दिनों के बाद
फफक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद

( बाबा तुम खुशनसीब थे कि ‘अकाल और उसके बाद ‘ लिखना पड़ा , ‘बलात्कार और उसके बाद ‘ नहीं । )

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इस देश की नागरिकता की नयी अहर्ताएँ

अपनी आत्मा को खूब सुखा दो पहले
फिर अपनी रीढ़ की हड्डी निकालकर सौंप आओ
हत्यारों ,आतताइयों और धार्मिक उन्मादियों के हाथ

अपने मस्तिष्क में धर्म का धुआँ भर लो इस कदर कि
तुम अपनी बेटियों , पत्नियों और माँओं के लिए
कुतिया , रंडी , और छिनाल जैसे सम्बोधनों का समर्थन कर सको
और सोच सको कि
मेरा प्रधानमंत्री इसके समर्थन में  है
तो अवश्य ही अपूर्व गौरव की बात है

अपने हृदय को
फूल से बच्चों की जली लाश की राख से लीप लो
कर लो बिल्कुल मृत्यु सा काले रंग में
और इन बच्चों की हड्डियों में
वह रंग विशेष का झण्डा लहराकर
पूरे हृदय से भारत माता को करो याद

अपने कानों में ठूँस लो हत्या समर्थन के सभी तर्क-पुराण
और उन गला सुजाकर रोती माँओं की चीख को
भजन या राष्ट्रगान की तरह सुनो
जिनके ईश्वर जैसे बच्चे
स्कूल और अस्पताल से नहीं लौटे आज की शाम

जुबान को काटकर रख आओ सत्ता के पैरों पर
आँखों का पानी बेच आओ सम्प्रदाय की दुकान में
आने के पहले थोड़ा लाश हो जाओ
थोड़ा-थोड़ा हो जाओ पत्थर

फिर तो स्वागत है तुम्हारा इस देश में
एक देशभक्त और सम्मानित नागरिक की तरह ।

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 जिन लड़कियों के प्रेमी मर जाते हैं

 पहले तो उन्हें इस खबर पर विश्वास नहीं होता
कि धरती को किसी अजगर ने निगल लिया है
सूरज आज काम पर नहीं लौटेगा
आज की रात एक साल की होगी

फिर जैसे तैसे घर के किसी कोने में दफ़्न हो जाती हैं
और अपनी ही कब्र में
बिलखकर रोती हैं
मुँह बिसोरकर रोती हैं
तड़पकर रोती हैं
तब तक रोती हैं कि होश जाता नहीं रहता
और गले के भीतरी हिस्से
कोई गहरा घाव नहीं बन जाता

उन्हें बहुत कुछ याद आता है बिलखते बखत
इतना कुछ कि किसी कविता में दर्ज कर पाने की कोशिश
अनेक स्मृतियों की हत्या का अपराध होगा

जैसा कि हर बार रो लेने के बाद
या कोई भारी दुख झेलने के बाद
हम तनिक अधिक कठोर मनुष्य हो जाते हैं

ऐसे ही वे लड़कियाँ महीनों बाद
देह से मृत्यु का भय झाड़कर निकलतीं हैं घर से बाहर
एक बार फिर , पहली बार जैसी

हर दृश्य को देखतीं हैं नवजात आंखों से
वे लड़कियाँ फिर से हँसना सीखती हैं
और उनके कमरे का अंधेरा आत्महत्या कर लेता है ।
तरोताजा हो जाती है दीवारों की महक

जैसा कि मुनासिब भी है
वे लड़कियाँ एक बार फिर
शुरू से करती हैं शुरुआत
( यह एक आंदोलनकारी घटना होती है )

ऐसी लड़कियाँ
अपनी आत्मा के पवित्र कोने में रख देती हैं
पहले प्रेमी के साथ का मौसम
और संभावनाओं से भरे इस विशाल दुनियाँ में से
फिर से चुनती हैं एक प्रेमी

इस बार भी वही पवित्र भावनाएँ जन्मती हैं
उनके  दिल के गर्भ से
वही बारिश से धुले आकाश सा होता है मन

जिन लड़कियों के प्रेमी मर जाते हैं
वे लड़कियाँ
दुबारा प्रेम करके भी बदचलन नहीं होतीं ।

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सात पंखों वाला अजगर और तुम्हारा फोन 

कभी कभी मुझे साँझ का सूरज
मरे हुए लड़के की एक आँख से अधिक
कुछ नहीं लगता

कभी कभी भोर का सूरज
लोहे की बाल्टी में भरा
किसी निर्दोष बच्चे का
ताजा गाढ़ा खून होता है

कभी कभी लगता है
मुझे मृत्यु सी नींद सोते छोड़
सभी चले गए हैं
दूसरे ग्रह पर मेला देखने

तब मैं शून्य जितने गहरे
पाताल के कुएँ में पैर लटकाए
कूदने ही वाला होता हूँ मेरी जान

मगर तभी तुम्हारा फोन आ जाता है ।

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 राख तले आग तो नहीं होगी

उन्होंने पहले मुझे धक्का दिया
मैंनें माफी माँगी
बगल हुआ और चुप रहा

फिर उन्होंने मुझपर पत्थर फेंके
मैं खड़ा रहा और चुप रहा

फिर उन्होंने मेरे सहयात्री की नागरिकता छीन ली
मैं आँखों में चिलकती धूप भरकर
उनकी तरफ घूरते हुए सोचने लगा

अब वे भयानक रूप से डरे हुए हैं कि
मैं चुप हूँ
और सोच रहा हूँ ।

 

 

3 COMMENTS

  1. मेरा सौभाग्य हैं कि में विहाग के साथ कुछ पल बीता रहा हूँ।समकालीन विद्रूपताओं पर आपकी बेबाक लेखनी आगे भी जारी रहेगी।आपको बहुत शुभकामनाएं।

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