सौतुक संगीत: या मुझे अफ़सर-ए-शाहाना बनाया होता

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सौतुक संगीत यादों का पिटारा रहेगा. वहाँ ग़ज़लों की महफ़िलें होंगी, उनके गाने वाले होंगे, उन पर झूमने वाले भी होंगे. अतीत से भविष्य तक

बहादुर शाह जफ़र

के लंबे सफर में बजती हुई अमर धुनें होंगी, सिनेमा के गाने होंगे, उसके भी गाने वाले होंगे और चाहने वाले होंगे. उन सब पर बातें होंगी. रु-ब-रु मुलाकातें या रूहानी यादें होंगी. भजन वाली भोर होगी तो लोकगीत के रौनक वाली दुपहरें होंगी. इनके गाने वालों और उन सब की मेहरबानी होगी जो इन अमर संगीत गीतों को अनथक परिश्रम से जमा करते रहते होंगे.

 
मेहदी हसन

आज मेहदी हसन होंगे और उनकी गाई ग़ज़ल होगी, या तो अफसर मेरा शाहाना बनाया होता. इसे सुनते हुए आपके मन में बहादुर शाह जफ़र की स्मृतियाँ होंगी और उनकी लिखी इस ग़ज़ल को दुबारा सुनने की सदिच्छा होगी. लेकिन यह जान लेना होगा कि इसे लिखने की नौबत क्यों आई होगी? बहादुर शाह जफ़र रंगून में क़ैद रहे होंगे. वहाँ अंग्रेज़ों ने एक तोहफा दिया होगा. थाल में सजा कर दिया होगा. और उस थाल में जफ़र के बेटों का सिर रहा होगा.

 
इस ग़ज़ल को सुनना उस अनंत तक फैली हुई चीख को सुनना होगा जो जफ़र की आत्मा में अंधड़ की तरह उठी होगी। पढ़िए, सुनिए, गुनिए.
 

 

या मुझे अफ़सर-ए-शाहाना बनाया होता

या मिरा ताज गदायाना बनाया होता

 

अपना दीवाना बनाया मुझे होता तू ने

क्यूँ ख़िरद-मंद बनाया न बनाया होता

 

ख़ाकसारी के लिए गरचे बनाया था मुझे

काश ख़ाक-ए-दर-ए-जानाना बनाया होता

 

नश्शा-ए-इश्क़ का गर ज़र्फ़ दिया था मुझ को

उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता

 

दिल-ए-सद-चाक बनाया तो बला से लेकिन

ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीं का तिरे शाना बनाया होता

 

सूफ़ियों के जो न था लायक़-ए-सोहबत तो मुझे

क़ाबिल-ए-जलसा-ए-रिंदाना बनाया होता

 

था जलाना ही अगर दूरी-ए-साक़ी से मुझे

तो चराग़-ए-दर-ए-मय-ख़ाना बनाया होता

 

शोला-ए-हुस्न चमन में न दिखाया उस ने

वर्ना बुलबुल को भी परवाना बनाया होता

 

रोज़ मामूरा-ए-दुनिया में ख़राबी है 'ज़फ़र'

ऐसी बस्ती को तो वीराना बनाया होता

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