जगजीत सिंह पुण्यतिथि विशेष: मेरे दुःख की कोई दवा न करो

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प्रस्तुति- प्रभात रंजन

(प्रभात रंजन प्रतिष्ठित कथाकार हैं।  नई संवाद तकनीकों के जरिए साहित्य प्रसार के हिमायती। लोकप्रिय साहित्य के प्रबल पक्षधर। हिंदी की कुछ चर्चित एवं सफल वेबसाइट में से एक जानकीपुल के मॉडरेटर हैं।)

मेरे दुःख की कोई दवा न करो

मुझको मुझसे अभी जुदा न करो

1992 में चित्रा और जगजीत सिंह का एक नया एल्बम रिलीज हुआ. उसका नाम था ‘समवन समव्हेयर’ यह एल्बम छोटा था, इसमें महज 8 ग़ज़लें थी. उनके पिछले एलबम्स की तरह कवर पर जगजीत और चित्रा सिंह की तस्वीरें नहीं थी. उसका कवर रहस्यमय था, जिसमें दो जोड़ी आँखें संभावित सुनने वालों को देख रही थी.

‘कवर के लिए यह एक अस्वाभाविक सा विचार था. एचएमवी को बहुत समझाना पड़ा तब जाकर वे इस डिजाइन को उपयोग को लेकर तैयार हुए’, कोहली ने याद करते हुए कहा. ‘खतरा बहुत बड़ा था, क्योंकि एल्बम में कोई लोगो नहीं था, न ही कवर पर गायक-गायिका के नाम थे. सभी सूचनाएँ प्रचार-प्रसार के माध्यम से ही दी जाने वाली थी.’

इसे बावजूद एल्बम की अच्छी बिक्री हुई. सिंह दम्पति को बाजार में एल्बम रिलीज किये दो साल हो चुके थे, और जैसा कि जगजीत ने पहले इस बात की भविष्यवाणी की थी, इस ख़ामोशी की वजह से लोगों में ग़ज़ल के बादशाह से नया कुछ सुनने की चाह बढ़ गई थी. डीलर ने अपना काम किया, उन्होंने स्टोर में एल्बम का प्रचार किया. लोग उसके ऊपर टूट पड़े.

शायद यह सोचकर कि यह जगजीत और चित्रा सिंह का आखिरी एल्बम रिलीज हो और जिसकी वजह से प्रेरित होकर एचएमवी ने कवर को लेकर अपना नियम तोड़ दिया था, और लोग अपनी अपनी प्रति लेने के लिए दुकानों में जैसे टूट पड़े. असल में, यह बात सही भी साबित होने वाली थी.

अगर यह ख्वाहिश न रही होती कि अपने बेटे को श्रद्धांजलि देते हुए एक एल्बम रिलीज किया जाए तो ‘समवन समव्हेयर’ कभी रिलीज न हो पाई होती.

सिंह दम्पति गहरे शोक में थे. संगीत की दुनिया के लिए यह पहला संकेत था कि दोनों में से कम से कम एक दुनिया का सामना फिर से करना चाहता था.

चित्रा 28 जुलाई 1990 की रात को कभी नहीं भूल पाएंगी.

यह वह रात थी जब सिंह परिवार की दुनिया हमेशा के लिए बदल गई. वह फिर कभी वैसी नहीं हो पाई.

चित्रा ने उस रात को और उसके बाद के घटनाक्रम को जैसे दृश्यात्मक रूप से याद किया.

“ ‘उस रात पापा गा रहे थे, मेरे ख़याल से वह अंजू महेन्द्रू की पार्टी थी. मैं घर में थी, मुझे वायरल हो गया था. वैसे भी, शायद मुझे बुलाया नहीं गया था; यह अक्सर होता था. जहाँगीर और मिनी उस समय हमारे साथ थे क्योंकि तब उनका बेटा महज नौ महीने का ही था. मेरी माँ उसकी देखभाल के लिए उस रात उसके कमरे में थी.

“ ‘जब फोन की घंटी बजी, तो दूसरी तरफ पुलिस की आवाज थी. उन्होंने कहा कि बाबू अस्पताल में है, क्या आप आ सकती हैं. मुझे लगा जैसे मेरा दिल घबराहट के मारे बैठ रहा हो. मैंने जहाँगीर को जगाया, और जगजीत को फोन करने की कोशिश की. हम यह पता नहीं लगा पाए कि वह कहाँ थे, क्योंकि तब मोबाइल फोन नहीं होते थे. मैंने तत्काल जहाँगीर को कुछ पैसे दिए कि कहीं अस्पताल में देने की जरुरत पड़ गई तो, और उसको अस्पताल भेज दिया. [spacer height=”20px”][spacer height=”20px”]

“ ‘जहाँगीर के जाने के कुछ मिनट के बाद ही दरवाजे की घंटी बज गई. ‘तैयार हो जाइये, हम आपको लेने आये हैं…’ मैं और मिनी जितनी जल्दी हो सकता था तैयार हो गए, सोये बच्चे अरमान को भी हमने उठाया और अपने साथ लेकर अस्पताल की तरफ चल पड़े. हमें बहुत देर हो चुकी थी. बाबू हमें हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुका था.

“ ‘जहाँगीर घर में लगातार फोन करता रहा. आखिरकार, करीब 5 बजे सुबह जगजीत ने फोन उठाया.

“ ‘जब वह वहां पहुंचे और उनको यह पता चला कि बाबू हमें छोड़ कर जा चुका था, तो वे गिर पड़े. अंदर नर्स ने उनके गिरने की आवाज सुनी और वह मदद के लिए बाहर आई. वह कुछ संभले. उसके आबाद उन्होंने मुझे ऐसे देखा जैसे कि मेरा उससे कुछ लेना देना ही न हो. फिर उन्होंने मुझे एक तरफ ऐसे हटा दिया जैसे मेरा कोई वजूद ही न हो, और फिर उस कमरे में घुसे जिसमें बाबू लेटा हुआ था. मुझे बहुत बुरा लगा. मैं माँ थी, और मैं भी टूट गई थी, लेकिन पापा को ऐसा लगा जैसे उनके लिए बेटा पैदा करने के बाद मेरा काम पूरा हो चुका था. उसके बाद वे थे और वह लड़का था! अब चूँकि वह लड़का इस दुनिया से जा चुका था, तो उनके लिए मेरा वजूद ही नहीं था.”

‘बियोंड टाइम्स’ ने उस दुर्भाग्य भरे दिन की घटनाओं को उस तरह से याद किया जिस तरह से उनको उनका अनुभव हुआ. “उस शाम मैं एक पंजाबी फिल्म के लिए बैकग्राउंड संगीत तैयार कर रहा था. उसके बाद मैं एक एक कार्यक्रम में गाने के लिए चला गया जिसका आयोजन दुबई के अब्दुल रहमान बुखातिर ने किया था जो उस समय शहर में आये हुए थे. रात के करीब 2 बजे मैं गायन ख़त्म करके घर आ गया. मैं अपने कपड़े बदल रहा था कि फोन आया. चित्रा और परिवार के बाकी लोग पहले से ही अस्पताल में थे. वह फोन मोनिका के पति जहाँगीर ने किया था. उसने बताया कि कोई दुर्घटना हो गई थी.

“क्या हुआ?क्या हुआ? मैंने पूछा. बाबू कैसा है? ‘वह नहीं रहा’, उसने कहा.”

“बस मैं चल पड़ा, कुछ पूछने की जरुरत नहीं थी. वह अजब बेचैनी का पल था, वैसे मैंने अपने ऊपर जितना जल्दी हो सकता था काबू किया: एक पुरुष अपनी बेचैनी में किसी हद तक जा सकता है. मुझे अब भी याद है कि जल्दबाजी में मैंने उल्टा पायजामा पहन लिया था.”

विवेक सिंह उस समय 18 साल का था और जिस वक्त उसकी सड़क दुर्घटना हुई थी उस वक्त वह अपने 19 वीं साल से महज एक महीने दूर था. जब किसी सड़क दुर्घटना में किसी मशहूर हस्ती का नाम जुड़ा होता है तो वह अपने आप खबर बन जाती है. अखबारों में विवेक की मौत से जुड़ी ख़बरों में इस तरह की बातें भरपूर थी: अमीरजादा, अमीर का बर्बाद बेटा. पार्टी, शराब… आदि… आदि…

जबकि हुआ यह था कि विवेक और कुछ और लड़के, जिनमें साइराज बहुतुले भी था, जो उसका नजदीकी दोस्त था और क्रिकेट खिलाड़ी भी, मरीन ड्राइव पर गाड़ी चला रहे थे.

संयोग से गाडी बहुत तेज रफ़्तार में थी; चलाने वाले नौजवान थे, 2 बजे रात की बात थी और सड़कें खाली थी. गाड़ी विवेक ही चला रहा था, और जब तक उसे इस बात का पता चलता कि स्ट्रीट लाईट को ठीक करने के लिए म्यूनिसपैल्टी वालों ने जो सीढ़ी लगाईं थी वह दायीं तरफ लगी हुई थी, वह सबसे फ़ास्ट लेन होती है, डीवाइडर के एकदम बगल में, तब तक गाड़ी उसमें घुस चुकी थी. उस दुर्घटना में विवेक सिंह की मौत हो गई और साइराज गंभीर रूप से घायल हो गया, हालाँकि बाद में वह ठीक हो गया. माँ पापा इस दुःख में इस कदर डूब गए थे कि बहन मोनिका ने अपने मृत भाई की तरफ से बातें की.

उसे यह महसूस हुआ कि प्रेस ने उसके साथ जो किया था वह अनुचित था. वह करीब 2.49 बजे दुर्घटना होने के मिनटों के अंदर गुजर गया, लेकिन सुबह होते होते वह खबर अखबार के पन्नों पर फ़ैल चुकी थी, और मोनिका ने पाया कि वे ख़बरें परेशान करने वाली और बदनाम करने वाली थी. फोरेंसिक रिपोर्ट आठ महीने बाद आया, अखबार वालों के पास इसका कोई आधार नहीं था कि वे दुर्घटना के कारणों पर घटिया टीका टिप्पणी करें. ‘मैंने अकेले यह लड़ाई लगी, रोज आजाद मैदान जाकर कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करती थी. मैंने मरीन ड्राइव जाकर वहां के निवासियों से शपथ पत्र लिया. आखिर में उसका नाम उस बदनामी से बाहर आया. हम उसके लिए कम से कम यही कर सकते थे. मेरे माता-पिता इस हालत में नहीं थे कि कुछ कर पाते; असल में मैं भी नहीं नहीं थी, लेकिन मुझे मजबूत बनना था.’  

मोनिका अपने बच्चे को डे केयर में रखकर तब तक भागाभागी में लगी रही जब तक कि विवेक का नाम उससे बाहर नहीं हो गया. शायद उसके प्रयासों से प्रेस और उन संस्थाओं को शर्म आई हो जिन्होंने लापरवाही से सड़क की फास्ट लेन में सीढ़ी रह छोड़ी थी, उनको चित्रा की इस मांग के सामने झुकना पड़ा कि उनके घर तक आने वाली लेन और मुम्बई के दो महत्वपूर्ण सड़कों को जोड़ने वाली लेन का नाम विवेक सिंह के नाम पर रखा जाए, वह नाम आज तक है.

विवेक की मौत के बाद सिंह परिवार में सन्नाटा पसर गया. जिस संगीत को वह पसंद करता था, जिसके साथ वह बड़ा हुआ था वह शांत हो गया. चित्रा को तो इतना सदमा पहुंचा कि वह अपनी खोल में चली गई, अब वह किसी से भी बातचीत नहीं करती थी. जगजीत भी पूरी तरह से टूट गए थे, उन्होंने खुद को घर में बंद कर लिया, और उन्होंने अपने प्यारे संगीत की तरफ देखना भी छोड़ दिया. ऐसा लग रहा था मानो उनको जिंदगी ने धोखा दे दिया हो.

“मैं लोगों का सामना नहीं कर सकती थी, मैं अंदर भाग जाती थी. बाबू एक तरह से मेरा एक और पहला बच्चा था, मैंने उसके जन्म लेने से लेकर बाद तक सब कुछ किया था. मोनिका के मामले में, मेरी माँ ने उसका ध्यान रखा था. मैं उसे खो देने को कभी संभाल नहीं पाई.’ एक तरह से, दुःख के इस मौके पर सिंह दम्पति एक दूसरे पर निर्भर हो गए. ‘दुर्घटना के बाद एक तरह से वह संलग्नता पहले से मजबूत हुई, लेकिन एक तरह से उन्होंने खुद को मुझसे दूर कर लिया. पहले की तरह एक दूसरे से वह रिश्ता नहीं रह गया.

“उन्होंने बाहर बहुत सारे दोस्त बनाए, मानो वे हर नौजवान में बाबू को देखते रहे हों…, अक्सर उनकी इस कमजोरी के कारण उनको उल्लू भी बनाया गया. पापा बहुत अकेले हो गए. दुनिया में उनकी एक ही चीज थी जो उनसे दूर चली गई थी. उनके लिए यह ऐसा था जैसे कि उन्होंने अपने जीवन को खो दिया हो.’

छह महीने तक, जगजीत अपने दुख से बाहर नहीं निकल पाए. लेकिन संगीत के लिए उनका प्यार, मिनी के लिए और उसके बच्चे के लिए उनके प्यार ने उनको जीवन के प्रति फिर से जागरूक बनाया. चित्रा उस दुनिया से बाहर नहीं निकल पाई.

पहले कुछ हफ़्तों के बाद जगजीत ने अपना तानपुरा उठा लिया. वे घंटों उसे बजाते, और उसकी आवाज से ही उनको कुछ शांति मिलती थी. मानो संगीत की तान उनके दर्द की परतों के पार जाकर उनके दिल को फिर से जगा रही हो.

‘मैंने यह महसूस किया कि जो कुछ भी मेरे साथ हुआ उसे मैंने खुद को बर्बाद नहीं करने दिया; बल्कि उसे मैंने अपनी मजबूती बनाया. कुछ हलकों में यह भी कहा गया मैं ख़त्म हो गई थी. इन अफवाहों ने मुझे और भी मजबूत बनाया.’

तानपुरा उनके लिए ध्यान भरी शांति का कारक बना. स्मृतियाँ, दर्द और आँसू सब अपनी जगह थे, लेकिन उन्होंने उन सबको अपने अंदर थाम लिया उस ताकत के बल पर जो संगीत ने उनको दिया था. किसी ने उनके दर्द को नहीं देखा, सिवाय किसी महफ़िल के दौरान उन दुर्लभ क्षणों के, यहाँ तक कि सालों बाद भी, जब उनका दर्द आंसुओं के रूप में फूट पड़ता था. कोई शेर आता या कोई शब्द और उनका दबा हुआ दर्द फूट पड़ता था, कभी कभी वे पूरी तरह से नियंत्रण खो देते थे.

बाबू की मृत्यु के छह महीने के बाद जगजीत सिंह बाहरी दुनिया में फिर आये, एक महफ़िल में. उनके प्रशंसकों ने उस जगजीत सिंह को देखा जिसको उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था, घवाहिल और टीस देने वाले. दो साल बाद, कोहली इंग्लैण्ड से लौटकर आ गए, जगजीत ने यह इच्छा जाहिर की कि वे अपने बेटे की स्मृति में एक एल्बम जारी करना चाहते हैं. उन्होंने अपने और चित्रा की आवाज में गई आठ ग़ज़लें दी, और चाहते थे कि उसके कवर पर विवेक सिंह की तस्वीर जाए. एचएमवी के साथ काफी बात-विचार के बाद ‘समवन समव्हेयर’ एल्बम रिलीज हुआ. ‘मुझे पता नहीं कि उसने सभी गज़लों को पसंद किया होता’, जगजीत सिंह ने अपने संग्रह के लिए कहा, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि हाल के वर्षों में उनका बेटा उनका सबसे बड़ा आलोचक था.

(यह सत्य शरण की पुस्तक बात निकलेगी तो फिर: दी लाइफ एंड म्यूजिक ऑफ़ जगजीत सिंह का एक अंश है . यह पुस्तक हार्पर कॉलिन्स से 2015 में प्रकाशित हुई थी जिसका अनुवाद प्रभात रंजन ने किया है.)

 

1 COMMENT

  1. समवन समवेयर की सभी ग़ज़लों में जगजीत और चित्रा का दर्द बहुत ही गहराई से सामने आया.. इस प्रसंग में उनकी पीड़ा को पूरी सच्चाई से अभिव्यक्त किया है ..सत्या जी और प्रभात रंजन जी ने भी इस जीवनी में अपनी भूमिकाएँ बड़ी कुशलता से निभायी हैं

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