हेमंत कुमार पुण्यतिथि: वेदना का रंग इतना चटख कि उसके आगे और कुछ रास न आये

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अम्बुज पाण्डेय/

देख तो दिल कि जाँ से उठता है
ये धुआं सा कहाँ से उठता है

रोज रात के दस बजे तक जब गांव-घर के लोग सो चुके होते थे. उस समय नीले आसमान से जलते-बुझते असंख्य जुगुनुओं को लेकर उतरता था छायागीत. कमल शर्मा की मोहक आवाज और शुरू हो जाता,मौसिकी का सफर. गीत की शुरुआत होती थी हेमंत कुमार या तलत महमूद की आवाज से. “देखो ऽऽ वोऽऽ चांद छुप के करता है क्या इशारे ?” या “आ नीले गगन तले प्यार हम करें.” “ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल.” या “इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा.”

सोए हुए लोगों की नींद में खलल न पड़े, इसलिए रेडियो कलेजा या कानों के पास होता था. ठीक खाट के नीचे सो रहा कुत्ता और नीम के नीचे बॅधी गाय मेरे सहश्रोता बनते थे. धीरे-धीरे हम तीनों दर्द और वेदना के पारावार में उतर जाते. मेरे साथ दोनों पशु भी जैसे इस लत की गिरफ्त में आ चुके थे. और ऐसा रोज होता था.

कहते हैं नाॅस्टैल्ज़िया रूग्णता का परिचायक है. आपके पास दुनियादारी के खींच-तान और भाग-दौड़ से बचने की औषधि नाॅस्टैल्ज़िया हीं तो है. भला कौन ऐसा पलायन नहीं चाहेगा. मैं तो अक्सर पलायन कर जाता हूं. और ढ़ूंढ़ लाता हूं स्मृतियों के गह्वर से पचास और साठ के दशक वाले नगमें. वहां हेमंद दा का नीरव संगीत मेरे क्लांत मन को असीम तोष देता है.

आज हेमंत दा की बरसी है. उनको याद करता हूं तो जैसे स्मृतियों में द्वन्द्व शुरू जाता है. एक तिकड़ी रफी,किशोर और मुकेश की याद आती है,जो जीवन को विविधरंगी संगीत से भर रहे थे. दूसरी तीकड़ी हेमंत कुमार,मन्ना डे और तलत महमूद की थी,जिनके यहां वेदना का रंग इतना चटख था कि उसके आगे कुछ रास हीं नहीं आता था. यह दर्द दिन ब दीन रूचता गया. कानों से रिस-रिस कर ह्रदय को सहलाने वाले गीत नशा बन चुके थे.

दर्द में एक अजीब किस्म की आसक्ति होती है. यह आसक्ति व्यक्ति को एकाकी बना देती है. जायसी,मीराबाई और महादेवी वर्मा को पढने वाला व्यक्ति दर्द से अनासक्त कैसे हो सकता है? वह इसी दर्द का उपासक बन जाता है. और यदि दर्द हीं उसकी मंजिल व पाथेय बन जाए तो आश्चर्य कैसा?

हेमंत दा की स्मृतियों को नमन !

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