बेगम अख्तर विशेष: इनकी आवाज़ में डूबने से ही दाग़ धुलते रहेंगे

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प्रभु नारायण वर्मा/

(लेखक हिंदी के बेहतरीन कथाकार हैं और बेगम  साहिबा के इने गिने मुरीदों  में से एक हैं.)

अब तो यही है दिल से दुआएँ
भूलने वाले भूल ही जाएँ

बेगम अख़्तर की ज़िंदगी का हाल किसी किस्से कहानी और फ़िल्म से भी अधिक हौलनाक और हादसों से भरा है। इसके बावजूद उन्होंने अपनी प्रतिभा, मेहनत और तबियत से ऐसा मक़ाम हासिल किया जो बहुत ऊँचा और अनोखा है।

हिन्दुस्तानी क्लासिकल रागों पर उनकी ज़बर्दस्त पकड़ थी। अवध की लोकधुनें उनके दिल में बसी थीं।और उपशास्त्रीय संगीत की शैलियों में वो सरापा रंगी हुई थीं। हालांकि उन्हें मलिका ए ग़ज़ल कहा जाता है, लेकिन ठुमरी और दादरा से लेकर पूरबी, होली, चैती, कजरी, सावन, निरगुन और नात भी वो बख़ूब नहीं, कमाल का गाती थीं। निहुरे निहुरे बहारे अँगनवां मज़ेदार पूरबी है तो घिर घिर आई बदरिया हो राम जादुई कजरी। केसरिया अंगिया रंग डारो मस्त कर देने वाली होली है तो कौन तरह से तुम खेलत होरी स्तब्ध कर देने वाली चैती। दोनों पे है सदक़े दिले शैदा ए मदीना/ वो शहरे मदीना हो कि सहरा ए मदीना- बेचैन कर देने वाली नात है तो सुन्दर साड़ी मोरी मइके में मइल गई, का लेके जइबे गवनवाँ हाए राम व्याकुल कर देने वाला निरगुन। पतली कमर लम्बे बाल, चलूँ जैसे कमिनिया भी सुनिए, वो क्या चीज़ है।

बांग्ला और गुजराती में भी उन्होंने अनेक गीत गाए हैं।

उन्होंने अनेक शायरों की ग़ज़लें गाई हैं, लेकिन ग़ालिब को गाने में उन्हें जैसे महारत हासिल थी। चचा ग़ालिब ख़ुद सुनते तो भी दाद देते। बेगम अख़्तर सिंग्स मिर्ज़ा ग़ालिब एक पूरा एल पी है, जिसमें ग़ालिब की आठ ग़ज़लें हैं। इसके अलावा भी ग़ालिब की कई ग़ज़लें उन्होंने गाई। इस सिलसिले में सहगल को भी याद करते चलें।

बेगम अख़्तर ख़ुद भी शायरी करती थीं। तख़ल्लुस था अख़्तरी। हमको नज़र से अपनी गिराए हुए तो हैं/ अगियार उनके दिल में समाए हुए तो हैं- उनकी ख़ुद की लिखी और गाई ग़ज़ल है।

सरोजिनी नायडू ने भी उनकी तारीफ़ की थी। पद्मश्री और पद्मभूषण के अलावा संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी उन्हें मिला था। भातखंडे संगीत विद्यापीठ में वे बरसों विज़िटिंग प्रोफ़ेसर रही थीं। उनके शिष्यों और उनसे इस्लाह लेने वालों की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है।

सत्यजित रॉय की फ़िल्म जलसाघर में भी बेगम अख़्तर की एक ठुमरी भर भर आईं मोरी अँखियाँ पिया बिन उन्हीं पर फिल्माई गई है।

उनका स्वभाव बहुत बिन्दास था। बच्चों जैसी सरलता और खुली मर्दाना हँसी। सिगरेट कभी छोड़ देतीं कभी धड़ाधड़ फूँकतीं। शराब से कभी तौबा कर लेतीं कभी जाम पर जाम चलते।

अजीब रहस्यमय और जादुई सोज़ भरी आवाज़ थी उनकी। अनोखी इंडिविजुअलिटी थी सो अलग। आवाज़ में पत्ती भी थी (!) रागों का गहरा अध्ययन भी था और घनघोर रियाज़ भी। सुरों से खेलने की शौक़ीन थीं और ताल पर उनकी आवाज़ मछली की तरह तैरती चलती थी। संगतकारों के साथ ऐसे घुलमिल कर गातीं जैसे सब एक घर के हों। ऑडियन्स का मिज़ाज ख़ूब समझती थीं और उसका मज़ा भी भरपूर लेतीं। पक्की महफ़िलबाज़। वास्तव में उनकी सबसे बेहतरीन चीज़ें महफ़िल में ही पेश हुई थीं।

उस दौर के बाद ग़ज़ल गायकी धीरे धीरे बाज़ार की चपेट में आती गई। अब इसमें न ग़ज़ल गायकी की तहज़ीब है, न तबीयत और न रंग। अजीब बदरंग, अजनबी और बेहूदा दौर काबिज हो गया है।

बार बार बेगम अख़्तर की आवाज़ में डूबने से ही ये दाग़ धुलते रहेंगे।

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