पंडित छन्नूलाल मिश्र से व्योमेश शुक्ल की बातचीत: कासी कबहूँ न छाड़िये

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पंडित छन्नूलाल मिश्र साधारण की आवाज़ हैं. अपनी गायकी से उन्होंने सरल को लोकप्रिय बनाया है, इसलिए उनके प्रशंसक कम नहीं पड़े उनमें अभिजात, रसिक और विद्वान कम, सस्ते, सड़कछाप और मस्त बनारसप्रेमी ज़्यादा हैं. उनकी ज़िंदगी और कला की सूरत कुछकुछ शिवजी की बारात जैसी है सुंदरता और अघोरीपन, शास्त्रीयता और जनप्रियता, मनोहर और भयंकर यहाँ तक कि नरेंद्र मोदी और मनमोहन सिंह का अनोखा सामंजस्य उनके किरदार में है.

व्योमेश शुक्ल

छन्नूलाल को बनारस उपहार या विरासत में नहीं मिला. वह आज़मगढ़ से मुज़फ्फ़रपुर होते हुए यहाँ पहुँचे और इस महान सभ्यता के पारापारा रूपों का आलिंगन कर लिया. इस शहर से मिले आघात और अपमान को भी उन्होंने आशीर्वाद की तरह अपनाया और आज, हाल यह है कि वह बनारस के संगीत के एक पर्यायवाची बनकर दृश्य पर मौजूद हैं.

इस बातचीत में सवालजवाब नहीं हैं, वे कलाकार को औपचारिक बना देते. सिर्फ पढ़ने की सुविधा के लिए कुछ विभाग कर दिए गए हैं. (व्योमेश शुक्ल )    

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एक

इक्यासी बरस पूरे हो गये. बयासी में लग गये. पंद्रह अगस्त जन्मदिन है. काग़ज़ पर तीन अगस्त, जो ग़लत है.

अब कोई ख्वाहिश नहीं. इलाही कोई तमन्ना नहीं ज़माने में, हमने सारी उमर गुज़ारी है अपने गाने में. हमारा सारा जीवन संगीत में ही रह गया. इसके अलावा कोई तमन्ना नहीं – कि राजा हो जायें, मकान बन जाय, ख़ूब पैसा आ जाय.

दो

ज़मीन पर सोते हैं. खिचड़ी खाते हैं. सबसे प्रेम से मिलते हैं – छोटा हो या बड़ा. कोई घमंड नहीं है – न पद्मभूषण का, न मोदीजी के प्रस्तावक होने का.

कभी-कभी सोचता हूँ कि कौन सी तमन्ना बाक़ी है. कुछ तो है जो बाक़ी है. फिर भी, उम्मीद किसी से नहीं है. मैंने किसी से नहीं कहा कि मेरे लिए कुछ कीजिये. जब भी मोदीजी से मुलाक़ात होती है तो वह पूछते हैं कि आपका स्वास्थ्य कैसा है? मैं कहता हूँ कि प्रभु की कृपा है. किसी मनुष्य की नहीं, प्रभु की, क्योंकि देता वही है. जो त्रिभुवन सम मारि जियावा – जो सारे संसार को मारकर जिला सकता है, दे भी वही सकता है. आदमी क्या है? आदमी सिर्फ़ बहाना है. ख़बर देता है.

तीन

हमारी इच्छा यही है कि हम बनारस छोड़कर कहीं न जायें. यहीं मरना है, ताकि गंगा मिलें. कुछ समय पहले, डॉक्टर कर्ण सिंह ने हमारा प्रोग्राम अमेरिका में रखवाया था. छह जगहों पर गाना था. मैंने उनसे कहा कि भाईसाहब, हम नहीं जाना चाहते. उन्होंने पूछा कि क्यों? हमने बताया कि खाने-पाने की तकलीफ़. हम शालिग्राम को भोग लगाकर खाना खाने वाले व्यक्ति और वहाँ जिस कलछुल से दाल चला रहे हैं, उसी से माँस भी. उन्होंने भरोसा दिया कि वहाँ यूपी-बिहार के जो लोग हैं, उनके घर पर आपके खाने का इंतज़ाम हो जायेगा.

तुलसी का पत्ता छोटा हो या बड़ा, भगवानजी पर चढ़ेगा ही. फिर आदमी के साथ भेदभाव क्या करना

दरअसल, वहाँ मरने से भी डर लगता है. अगर वहां अंत हुआ तो समुद्र में फेंके जायेंगे और यहाँ मौत आई तो गंगाजी हैं ही. लंदन, न्यूयार्क और ऐसी और भी जगहें – एक बार देख लीं – काफ़ी हैं. एक बार दीदार हो गया तो बाक़ी क्या रहा? सीताजी ने फुलवारी में राम को एक ही बार तो देखा था – ‘चलीं राखि उर श्यामल मूरति’. इसके बाद राम उनके भीतर थे. उन्हें बाहर खोजने की कोई ज़रूरत न थी.

हम कहीं भी बस एक बार जाते हैं. इतने-भर से तसल्ली हो जाती है. दुनिया एक बार देखने की चीज़ है. एक बार बद्रीनाथ गए थे. वहाँ देखा कि जो भक्त हज़ार रूपये दे रहा है वह भीतर जाकर बाक़ायदा चरणस्पर्श करके दर्शन कर रहा है. जो नहीं दे रहा है, वह बाहर धक्के खा रहा है. उसे कोई नहीं पूछ रहा है. हम भी धक्के खा रहे थे. तो भगवान के दरबार में भी घूसखोरी चल रही थी. पता नहीं, वह देख रहे थे कि नहीं. अब दोबारा वहाँ क्या जाना ? वहाँ भी तो पैसे का खेल हो रहा है.

चार

तुलसी का पत्ता छोटा हो या बड़ा, भगवानजी पर चढ़ेगा ही. फिर आदमी के साथ भेदभाव क्या करना. छोटा-बड़ा कोई है नहीं, बनाया गया है इस दुनिया में. हमें सबकुछ को स्वीकार करना है.

विश्व कर्मप्रधान है. जूता सिलने वाला मोची है, पूजा करने वाला ब्राह्मण. लेकिन मोची पूजा करवायेगा तो वह भी ब्राह्मण. जात-पात और बड़े-छोटे के भेद ने लोगों को एक दूसरे से अलग कर दिया है.

पैसेवाले और ग़रीब के बीच फ़र्क़ है. लोग पैसे वालों से झिझकते हैं – उनके यहाँ जाने से – उनसे बात करने से. हम नहीं झिझकते – उसके पास पैसा है, हमारे पास थोड़े ही है. हम क्यों झिझकें ?

पाँच

भीतरबाहर एकहि देखे’. जो मेरी आत्मा है, वही आपकी. कुत्ते, चींटी, शेर और हाथी के भीतर भी वही आत्मा है. कई शरीर हैं – स्थूल, कारण, सूक्ष्म या दिव्य. मन और आत्मा को भी शरीर कहा गया है. दिव्य शरीर इतना छोटा है कि एक बाल के सिर्फ़ अगले हिस्से को सौ बार काटिये, उतना बड़ा. वही सूक्ष्म दिव्यता – जो ईश्वर का अंश है – हममें, आपमें – चींटी से हाथी तक में विद्यमान है. हर जीव में उस आत्मा को पहचानने की ताब हममें होनी चाहिये. उसे नहीं पहचानेंगे तो ईश्वर को नहीं जान पायेंगे. मोहल्ले के कुत्ते मित्र हैं मेरे. हमारे साथ चले आते है और दरवाज़े पर बैठे रहते हैं. उनको कुछ खिला देते हैं और कहते हैं कि ‘जाओ’, तो सब एकसाथ चले जाते हैं.

छह

सुबह साढ़े चार उठना. बाबा कीनाराम के बनाये पड़ोस के साढ़े चार सौ बरस पुराने गैबेश्वर मंदिर में आधे घंटे टहलना. उसके बाद घर आकर पौन घंटे व्यायाम-प्राणायाम. फिर स्नान, जलपान और शिष्यों को सिखाने का क्रम. सुबह का सिखाना अच्छा होता है. रविवार को कुछ शिष्य बाहर से – कोलकाता, बंबई और दिल्ली से – सीखने आ जाते हैं. वे जानते होंगे हमें. यहीं वाले ठीक से नहीं जानते. बनारस में काटापीटी बहुत है. इनका नाम काट दो, उनका नाम जोड़ दो वाली आदत.

सात

जगत मातुपितु संभु भवानी. शिव और पार्वती इस संसार के माता- पिता हैं. स्वर, लय और शब्द की रचना भी उन्होंने ही की है. बनारस के मालिक भी वही हैं. इसलिए काशी के संगीत का इतना महत्व है. उनके डमरू से ही शब्द बने. पाणिनि के चौदह माहेश्वर सूत्र और क्या हैं ? संहार और उद्धार – दोनों धाराएँ उन्हीं में से निकली हैं.

आठ

हमारा जीवन बहुत तकलीफ से बीता है. देहात में, आजमगढ़ जिले के हरिहरपुर गाँव में पंद्रह अगस्त की भोर में जन्म हुआ. उस दिन शनिवार था. हमलोग तीन भाई और एक बहन. गीत में हम, वाद्य में भाई विश्वनाथ और नृत्य में सबसे छोटा शिवजी – बिरजू महाराज का शिष्य. हमारे घर में सात पीढ़ी से संगीत है. सबसे पहले वागीश्वरी महाराज. उसके बाद पिंगल महाराज. उनके भतीजे पंडित जगदीप महाराज – जो बनारस में ठुमरी लाये. उनके लड़के – हमारे दादा शीतल प्रसाद उर्फ़ ढोलई. ढोलई के लड़के – हमारे पिताजी – बद्री महाराज. उनके लड़के हम. हमारे लड़के रामकुमार मिश्र – तबलावादक. उनका लड़का भी बहुत अच्छा तबला बजा रहा है. हमारी लड़की भी गाती है.

बचपन में खाने का पैसा नहीं था. पिताजी मुजफ्फरपुर से कमाकर महीने में दस रूपया भेजते थे. दस रूपया महीना में हम बारह लोग पंद्रह दिन खाते थे. सस्ती का दौर था. एक रूपये का बारह किलो चावल. पैसा ख़त्म हो जाय तो दाल कहाँ से आय. तब रोटी और इमली की चटनी. पेड़ पर ढेले मारकर इमली तोड़ लाते थे. रोटी, नमक और इमली की चटनी खाकर रियाज़ करते थे हम. मन में सोचते थे : छोड़ेंगे नहीं रियाज़.

शुरू के पाँच साल पिता जी ने रियाज़ कराया. दस रूपये का एक हारमोनियम उन्होंने हमें ख़रीदकर दिया था.

शुरू के पाँच साल पिता जी ने रियाज़ कराया. दस रूपये का एक हारमोनियम उन्होंने हमें ख़रीदकर दिया था. जर्मन रीड का बहुत ही बढ़िया हारमोनियम. उसी को लेकर हम सारेगामा किया करते थे. भोर में पाँच बजे रियाज़ शुरू हो जाता था. ज़रा सी भी झपकी आई कि पिताजी की एक चपत. कहते थे, ‘सो रहे हो तो नाम कैसे होगा ?’ वह बहुत अच्छा तबला भी बजाते थे और गाना भी गाते थे. सिखाते भी थे हम सब लोगों को. माताजी रामायण की बड़ी भक्त थीं. उन्होंने सुंदरकांड का पाठ करना सिखाया. हनुमान जी बड़े कृपालु हैं – ज्ञानिनामग्रगण्यम – ज्ञानियों में सबसे आगे. और तो और – संगीत में भी उनका एक मत है – हनुमान मत. शिव मत, नारद मत, भरत मत और हनुमान मत – ये चार मत हैं.

तो, बचपन में चटनी खाकर रियाज़ करने में गला बैठ जाता था. यह बात भी थी कि खाना नहीं मिलेगा तो गायेंगे क्या? आवाज़ रुंध जाय, बोली न निकले, ऐसी हालत हो जाती थी. लेकिन गाते रहना था. पिता-गुरू का आशीर्वाद था.

लय का अभ्यास भयंकर था. एक ही ख़याल को तीन अलग-अलग तालों में गाना होता था. विलंबित एक ताल यानी बारह मात्रा, झूमरा यानी चौदह मात्रा और तिलवाड़ा यानी सोलह मात्रा में. अलग-अलग लयों का अंदाज़ ज़रूरी था. ये सब भला माता-पिता के और कौन करता.

माताजी ने सुंदरकांड पढने की आदत डाली तो सुंदरकांड कंठस्थ हुआ ही, बाक़ी के छह कांड भी प्रायः याद हो गए. लोग पूछते हैं कि आपको याद कैसे हैं तो हम कहते हैं कि शिवजी की कृपा से.

गुरु शंकररूपिणम – गुरु शंकर का रूप हैं. हमारे गुरु थे एक मौनीबाबा. बारह साल तक मौन रहे. पुराण, उपनिषद और गीता उन्हें याद थे. उनका कुछ असर है मुझपर.

नौ

घराना-वराना कुछ होता नहीं. लोग मानें. घराना सिर्फ़ शिवजी का है. जिसने स्वर और शब्द की रचना की, घराना तो उसका होगा न. कोई चीज़ महज़ मेरे घर की कैसे हो सकती है ? आजकल घरानों में घालमेल हो रहा है ख़ूब. स्वर और लय पर किसी घर का अधिकार कैसे हो जायेगा ? गाना आपने बना लिया, हम मानते हैं. इसीलिए कुछ लोग हमारे ख़िलाफ़ भी रहते हैं कि हम घराना नहीं मानते. जिन्होंने ख़याल बनाया – सदारंग-अदारंग, मनरंग-तनरंग, मुहम्मद शाह रंगीले – इन्होंने कभी अपने घराने का दावा नहीं किया. गाया बहुत अच्छा. बस. बाद में लोगों ने स्थायी-अंतरे की शब्दरचना करके यह दावा करना शुरू किया कि यह हमारे घराने की चीज़ है. अरे, आपके घराने का सिर्फ़ शब्द है. स्वर आपका कहाँ है ? अगर ऐसा है तो बिना स्वर, बिना लय का गाना सुना दीजिये. हम मान लेंगे. घराना एक स्टाइल है – कि हम अपने पिता की स्टाइल से गाते हैं. जिससे आप सीखते हैं, जिन लोगों के साथ आप गाते-बजाते हैं, उनका असर आप पर पड़ता है. आपकी स्टाइल तैयार होती है. इसे घराना कहना कहाँ की बात है. अगर कोई चीज़ बनारस घराना है तो आल्हा का भी घराना है. अखाड़े के पहलवानों का भी घराना है. बिरहा का भी कोई घराना है. बनारस बहुत बड़ी चीज़ है. वह घराने में अटेगा नहीं. यह कहिये कि कबीरचौरा एक जगह है, जहाँ कबीरदासजी रहे थे. वह आपका घराना है. आपके दादा ने वहीँ सीखा, आपके पिता का जन्म वहीँ हुआ, तो वही घराना है. परंपरा बदल गई और घराने का नाम वही रह गया. शहर के नाम से घराना नहीं होना चाहिये. किसी को बुरा लगे या भला, हमारा यही मानना है.

दस

सत्ताईस बरस की उम्र में हम बनारस आये – संगीत सुनाने और संगीत सुनने. बनारस का नाम सुनते थे. यह जानने कि यहाँ का संगीत कैसा है. मुजफ्फरपुर से हम यहाँ आये थे. यहाँ बहुत बढ़िया गाने-बजाने वाले लोग थे. श्रीचंदजी का गाना बड़ा सुमधुर और कर्णप्रिय था. नई पीढ़ी का संगीत कर्कश लग रहा है – सुनने में कठोर.

संगीत का मुख्य उद्देश्य है मधुरता. कोई शास्त्र न पढ़े और शास्त्रीय गाने का दावा करे, यह असंभव है. घराने का संगीत अभिजात संगीत हो गया. जो मन हुआ सिखा दीजिये, जैसा मन में हो, गा दीजिये. अंतरा गा दीजिये, स्थाई छूट गया, कोई बात नहीं. घराने की ओट में शास्त्र की भी उपेक्षा हो रही है. शास्त्र है संस्कृत में, और आप घराना-घराना कहते हुए अंग्रेजियत की हवा में बहते चले जा रहे हैं. आपका आचार, पहनावा, बोली-बानी – सबकुछ – भीतर ही भीतर बदल गया. हर मंदिर पर श्रृंगार के साथ गाना-बजाना होता था. ये सब हमारी पहचान बनाने वाली चीज़ें थीं. आप बनारस में लाख सुंदर-सुंदर चीज़ें बना दीजिये, लेकिन गंगा-किनारे घाट पर छतरी के नीचे बैठा पुजारी हमारी पहचान है. उसे डिस्टर्ब नहीं किया जा सकता.

ग्यारह

ठाकुर जयदेव सिंह शास्त्र के बड़े विद्वान थे. हमने इन्हें अपना गुरू बना लिया. इन्होंने बारीकियाँ बतायीं. चार स्वस्थान से आलाप. मेरुखंड और खंडमेरु अलग-अलग. स्थाई भंजिनी और रूपक भंजिनी. पंद्रह तरह की गमकों का प्रयोग.

संगीत के शास्त्र की पढाई कायदे से कहीं हो नहीं रही है. स्कूलों-कॉलेजों में पंद्रह प्रकार की गमक कौन सिखाता है ? शिक्षक ये सब जानते ही नहीं तो सिखायेंगे क्या? ‘मैं आप अपनी तलाश में हूँ, मेरा कोई रहनुमा नहीं है. वो क्या दिखायेंगे राह हमको, जिन्हें खुद अपना पता नहीं है.’ आज संगीत के छात्र का हाल इस शेर जैसा ही है.

संगीत के शास्त्र की पढाई कायदे से कहीं हो नहीं रही है. स्कूलों-कॉलेजों में पंद्रह प्रकार की गमक कौन सिखाता है ? शिक्षक ये सब जानते ही नहीं तो सिखायेंगे क्या?

गुरु-शिष्य परंपरा ही एकमात्र रास्ता था. वही संकट में है. संस्थानों की शिक्षा सर्टिफिकेट देती है और सर्टिफिकेट से ही नौकरी मिलती है, कला देखकर नहीं. संस्थान संस्कार की शिक्षा क्या देंगे और बिना संस्कार के विद्या कहाँ से आयेगी.

युग बदल गया. ‘प्रातकाल उठ के रघुनाथा, मातपिता गुरु नावहिं माथा.’ अब माता पिता ही बच्चे को पैर दबाकर जगा रहे हैं. गुरु गृह गए पढ़न रघुराई – और अब – पैसा देकर गुरु को घर पर ही बुला लिया जाता है – ट्यूशन पढाने. गुरु-शिष्य परंपरा का घनघोर अनादर हुआ है. पैसे ने गुरु को नौकर बना दिया.

बारह

हमने भी चौदह साल नौकरी की. नौकर बने रहे. साइकिल से आना-जाना. गंगा पार. पुल पार करके. टेम्परेरी थे. डेढ़ सौ रूपया महीना मिलता था. बाद में चार सौ मिलने लगा था. परमानेन्ट हो गए. फिर एक घटना घटी, जिसके कारण नौकरी छोड़नी पड़ी.

हुआ यह कि वाइसप्रिंसिपल साहब ने अपनी लड़की की ख़ातिर हमसे एक हारमोनियम मँगवाया. उन्होंने यह भी कहा कि आप कॉलेज के बाद यहीं रुककर बेटी को सिखा दिया कीजिये. यह संभव नहीं था. शाम के पाँच बजते-बजते हम बहुत थक जाते थे. हमने उनसे कह दिया कि अगर लड़की हमारे घर आ जाए तो हम उसे सिखा दें. यहाँ मुश्किल होगी. इसी बात पर वाइसप्रिंसिपल भीतर-भीतर नाराज़ हो गए और मुझे हटाने का षड्यंत्र शुरू हो गया.

हमारा बनारस में रंग जम रहा था और तमाम लोग इस बात से दुखी हो रहे थे. आख़िर हम बाहरी थे.

तो मैं कॉलेज के लिए सात भाती का, साढ़े तीन सप्तक का, जर्मन रीड का हारमोनियम ढाई हज़ार रूपयों में ख़रीदकर ले आया. शुरू में सबलोगों ने हारमोनियम की बहुत तारीफ़ की. कहा, बहुत अच्छा बाजा है. लेकिन फिर कहा-सुनी हुई और मुझपर यह आरोप लगाया गया कि मैं ज़्यादा दाम बता रहा हूँ और हारमोनियम कम पैसों का है. मुझसे कहा गया कि यह कम पैसों का बाजा है. आप इसे लौटा दें और पैसा वापस माँग लें. मैंने यही किया. उसी कॉलेज के एक अध्यापक के साथ हारमोनियम की दुकान पर गया और बाजा लौटाकर पूरे पैसे वापस ले आया. कॉलेज में पैसे जमा कराकर उसकी रसीद भी ले ली. लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं होनी थी. मुझे टर्मिनेट कर दिया गया. सबकुछ मेरा अपमान करने के लिए किया जा रहा था.

हम घर आये. वक़ील से बात की और मुक़दमा कर दिया. अठारह साल तक मुक़दमा चला. लेकिन हम भी थके नहीं. मन बन गया था कि सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाओगे तो भी लड़ेंगे. अठारह साल बाद विजय हुई. एक बेहद इमानदार जज की कोर्ट में हमें न्याय मिला. उन्होंने फैसला दिया कि जब से हटाया गया है, तब से अब तक का पैसा इन्हें जोड़कर दिया जाय. कॉलेज ने घर आकर पचासी हज़ार रूपये दिए. सबलोगों ने कहा : अरे, पंडितजी जीत गए. यह सच की जीत थी.

यह सारा प्रकरण जलन के कारण हुआ था. हमारा नाम बहुत ज़्यादा था. लोग नमस्कार करते रहते थे. इससे दिक्कत थी.

इसके बाद हम बेरोज़गार. ट्यूशन का सहारा. जो हमको जानते थे, वे आते थे सीखने. कोई पचास रूपया, कोई पचीस रूपया. कोई पंद्रह रूपया. जो, जो देता था, हम ले लेते थे. उसी से काम चलता था.

अपना मकान नहीं था. ससुराल में थे. कुछ लोगों ने ससुराल वालों को चढ़ा दिया. दामाद हैं. मकान पर क़ब्ज़ा कर लेंगे. दिवंगत महान तबलावादक अनोखेलाल जी मेरे ससुर थे – नाधिनधिनना वाले. रामजी उनके बेटे. हमारे साले. वह उनके कहे में आ गए. वहाँ से हमें हटा दिया गया. हमारा बनारस में रंग जम रहा था और तमाम लोग इस बात से दुखी हो रहे थे. आख़िर हम बाहरी थे.

जब चिड़िया का घोसला भी नहीं उजाड़ा जाता, हमारे साले ने हमसे उसी आषाढ़ के महीने में घर खाली करा किया. मेरी बीवी – उनकी बहन और बच्चे खूब रोये. लेकिन छोटेलाल मिश्र ने अपने यहाँ शरण दी. उन्होंने अपना कमरा हमें दे दिया और ख़ुद बाहर जाकर रहने लगे. छोटेलाल भी अनोखेलालजी के शिष्य थे. चालीस रूपया मकान का किराया था. किराया वह देते थे, रहते हम थे उस मकान में. हमारे लिए उन्होंने बहुत त्याग किया. इसलिए हम उनकी बहुत इज्ज़त करते हैं.

तेरह

धीरे जान-पहचान बढ़ने लगी और कार्यक्रम होने लगे. घुघरानी गली में एक जगह कथा हो रही थी. पंडित जी राधेश्याम रामायण बाँच रहे थे. मुझे देखकर बोले : क्या तबला बजा दोगे? हमने तबला बजाया और बदले में हमें दो रूपया ईनाम मिला. पाव भर मलाई खरीदकर घर आये और बच्चों को खिलाया. लोग हमको जानने लगे थे. संगीत सिखाया – छोटे से बड़े तक को. जातपात नहीं देखा, मन देखा. चौक पर एक प्रोग्राम में एक आदमी से पचीस रूपया और एक घड़ी का ईनाम मिला तो दाल-चावल ले आये. रेडियो में गाने के मौक़े मिलने लगे. भगवान धीरे-धीरे जीवन की गाड़ी हाँक रहे थे. पहले बहुत तकलीफ झेली है हमने.

बनारस के संगीतकारों ने मदद नहीं की. हमें बाहरी माना. आजमगढ़ का. हमें नीचे गिराने के प्रयास हुए. किसी ने भला नहीं सोचा. सामने अपने हैं, बाहर बेगाने हैं.

संकटमोचन के महंत, गंगा अभियान वाले वीरभद्र मिश्र हमारे मित्र थे. हमसे संगीत सीखते थे. बीसियों साल का साथ रहा. मुझे पैसा दिया. उन्होंने बहुत कुछ बताया. हमने भी उन्हें कुछ न कुछ बताया. सत्संग होता था उनके साथ. धर्म पर, अध्यात्म पर, बनारस पर और संगीत पर.

चौदह

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जहाँ भी हमारा कार्यक्रम होता था, सुनने आती थीं. बड़ी जानकार थीं और कद्र करती थीं. गाँधीजी की समाधि पर हमने गुरु का भजन सुनाया. मनमोहनजी थे सोनियाजी और शीला दीक्षित भी थीं. भजन यों था : गुरु बिन कौन बतावे बाट, गुरु नारायण रूप हैं, गुरु ज्ञान के घाट, सद्गुरु वचन प्रताप से, मन का मिटे उचाट.’ सरदारजी बहुत ख़ुश हुए और वहीँ यह तय हो गया कि हमें पद्मभूषण मिलना चाहिए. शीला दीक्षित ने भी कहा. पहले पद्मश्री की बात थी, लेकिन मिला पद्मभूषण.

हम आटा पिसवाकर, कनस्तर कंधे पर लेकर, दुकान से घर लौट रहे थे. मीडिया वालों ने रास्ते में घेर लिया. लोग कह रहे थे : अरे आपको पद्मभूषण मिल गया. हमने घर जाकर देखा – वाकई.

हम आटा पिसवाकर, कनस्तर कंधे पर लेकर, दुकान से घर लौट रहे थे. मीडिया वालों ने रास्ते में घेर लिया. लोग कह रहे थे : अरे आपको पद्मभूषण मिल गया

हमें बाबा विश्वनाथ ने यह मान दिया. हमारे बनारस से बड़े-बड़े कलाकार बाहर चले गए. रविशंकरजी अमेरिका गये, खूब पैसा कमाया, नाम भी कमाया. लेकिन हमलोग तो यह मानने वाले थे की चना चबैना गंगजल, जो पुरवे करतार, कासी कबहूँ न छाड़िये, बिस्वनाथ दरबार’.

जो रामायण जान गया, वह सबकुछ जान गया और बनारस में रहे बगैर रामायण को जाना नहीं जा सकता. उसे लगातार जानना पड़ता है.

पंद्रह

हमको खिचड़ी से बड़ा प्रेम है. गली हुई खिचड़ी. आलू का चोखा. छेने का रसगुल्ला. सादा खाना. पहले मलाई खाते थे, अब बंद कर दिया है.

जीवन बहुत बढ़िया है. दुख सुख में बदल गया. हमने तो गुरुओं से दुख में सुख का अनुभव करना सीखा था. अब उसकी भी ज़रूरत न रही. पहनने-खाने का शौक़ था. सब पूरा ही हो गया.

कोई कुछ कहे मेरा मन लगा, ऐसी प्रीत लगी मोहन सो, जैसे सोना में सुहागा. बनारस से वही रिश्ता है. खून का.

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(व्योमेश शुक्ल भाव-संसार के अप्रतिम नागरिक हैं. उनकी कविताएं नए प्रतिमान रचती हैं. अमूमन बिसरा दी जाने वाली जीवन स्थितियों को अपनी कविता से माँजते हुए, उसके महत्व को दर्शाते हुए सूरजमुखी के किसी विस्तृत फूल के मानिंद सामने रख देते हैं. जब गद्य रचते हैं इनकी वस्तुनिष्ठता और नए प्रयोग उसे सँवार देते हैं. रंगमंच पर इनके अनूठे प्रयोगों और निरंतरता ने गजब ही आकर्षण पैदा किया है. बेहद विनम्र और सकारात्मक सोच के धनी व्योमेश अव्वल दर्जे के बनारसी हैं.)

नोट: इस साक्षात्कार में प्रयोग तस्वीरें पंडित छन्नूलाल मिश्र के ऑफिसियल वेबसाइट से ली गई हैं. यह साक्षात्कार इंडिया टुडे पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है.

1 COMMENT

  1. नाव में बैठकर गंगा समीरन की सी अनुभूति हुई….

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