दिल की गिरह खोल दो चुप ना बैठो, कोई गीत गाओ!

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/

साल उन्नीस सौ सड़सठ में एक अनूठी फिल्म आई। अनूठी इस लिहाज से कि अब तक सिनेमा को रंगीन हुए सोलह बरस हो चुके थे और यह फिल्म ब्लैक एंड वाइट थी। इस लिहाज से भी कि इसे बनाने में छः वर्ष का लंबा  समय लगा था। अनूठी इस लिहाज से भी कि इसके कथानक में मनोवैज्ञानिक पहलु गुंथा हुआ था जबकि दौर सामाजिक कहानियों का था। फिल्म का नाम था ‘ रात और दिन ‘  और दो नायक – प्रदीप कुमार , फ़िरोज़ खान और नायिका थी नरगिस। नायिका प्रधान इस फिल्म को नरगिस का  ‘विदाई गीत’ भी कहा जाता है क्योंकि यह  उनके वैभवशाली  सिनेमाई करियर की अंतिम फिल्म थी। संयोग से इसी वर्ष भारत सरकार ने फिल्मों को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार देने की शुरुआत की थी। नरगिस की निभाई  मानसिक रुग्ण मरीज की भूमिका के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री ‘ का पहला पुरस्कार प्रदान किया गया।

इस फिल्म के बनने की भी अपनी एक कहानी है। आइकोनिक फिल्म ‘मदर इंडिया ‘ के दौरान नरगिस सुनील दत्त में प्रेम हुआ और अपने विवाह के बाद उन्होंने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया। इसी समय नरगिस के भाई अपनी एक फिल्म का प्रस्ताव लेकर आये। पारिवारिक और भावनात्मक दबाव के चलते नरगिस को अपना संन्यास टालना पड़ा। आवारा, चोरी चोरी, जोगन और कई बेहद सफल एवं लोकप्रिय फिल्मों की नायिका नरगिस का अपना एक आभा मंडल था जो भाई अख्तर हुसैन की फिल्म की सफलता की गारंटी बन सकता था। ऐसा हुआ भी।

‘रात और दिन’ का उजला पक्ष था इस फिल्म का गीत और संगीत। गीतकार थे शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी व संगीतकार थे शंकर जयकिशन। राजकपूर के साथ अपना करियर आरंभ करने वाले शैलेन्द्र ने  900 गीत लिखे है और उनके लगभग सभी गीत आज तक सुने गुनगुनाये जाते है।  फिल्म में कुल पांच  गीत थे जिसमे से दो गीत मेल फीमेल वर्शन में थे। गुजरते समय के साथ फिल्म के दो गीत आज भी अपनी ताजगी बरक़रार रखे हुए है। ‘रात और दिन दिया जले’ -मुकेश / लता मंगेशकर ने अलग अलग वर्शन में अपनी आवाज से अमर कर दिया वही ‘दिल की गिरह खोल दो चुप न बैठो ‘ – लता मंगेशकर/ मन्ना डे  का शानदार क्लब सांग है। इन दोनों ही गीतों को ऊंचाई देने में शंकर जयकिशन ने कमाल कर दिया है। रात और दिन दिया जले- के संगीत  में  श्रोता एक उदासी में उतर जाता है। लता और मुकेश दोनों ही अपने वर्शन में सुनने वाले के इर्द गिर्द गहरी  उदासी का कोहरा बुन देते है। दूसरी तरफ मल्टीपल पर्सनालिटी डिसऑर्डर की शिकार नायिका का पेगी के रूप में क्लब जाकर सिगरेट शराब पीना और गाना ‘दिल की गिरह खोल दो’  पाश्चात्य   संगीत की वजह से और अधिक मादक बन जाता है। एक ही फिल्म में उदासी और उल्लास शंकर जयकिशन के हुनर की मिसाल बनकर अंतस में उतर जाता है !

गीतकार शैलेन्द्र के गीतों के कालजयी होने में उनके सुंदर सरल बोलों का विशेष महत्व था। इस समय तक संवादों और गीतों में उर्दू के शब्द आ जाना स्वाभाविक बात हुआ करती थी परंतु शैलेन्द्र सरल और लोकजन में उपयोग होने वाले शब्दों को चुनते थे। उनकी लेखनी श्रोताओ को दार्शनिकता का एहसास कराकर आम जीवन में लौटा लाती है। यही वजह है कि उनके कुछ गीत आधुनिक भारत के राष्ट्रगान का सम्मान हासिल कर चुके है।

दिल की गिरह खोल दो -गीत बदलते माहौल में भी अपनी लोकप्रियता बनाये हुए है। आकशवाणी के  ‘संगीत सरिता ‘ कार्यक्रम में आज भी जब तब  शास्त्रीय संगीत के गुणीजन इसके बोलो और संगीत की व्याख्या करते रहते है।

इस गीत के साथ एक दिलचस्प बात और जुड़ी हुई है। अस्सी नब्बे के दशक में जब ऑर्केस्ट्रा पार्टियों का चलन उफान पर था तब नागपुर की जग प्रसिद्ध ऑर्केस्ट्रा ‘ मेलोडी मेकर्स ‘ के ओपी सिंह ने अभिनव प्रयोग करते हुए इस गीत को और लोकप्रिय बना दिया था।  वे अकेले ही इस गीत को मेल फीमेल आवाज निकालकर गाते थे।

 

दिल की गिरह खोल दो

चुप ना बैठो, कोई गीत गाओ

महफ़िल मे अब कौन है अजनबी

तुम मेरे पास आओ

दिल की गिरह खोल दो

चुप ना बैठो, कोई गीत गाओ

मिलने दो अब दिल से दिल को

मिटने दो मजबूरियों को

शीशे मे अपने डुबो दो

सब फ़ासलो दूरियों को

आँखों मे मैं मुस्कुराऊं

तुम्हारी जो तुम मुस्कुराओ

महफ़िल मे अब कौन है अजनबी

तुम मेरे पास आओ

दिल की गिरह खोल दो

चुप ना बैठो, कोई गीत गाओ

हम तुम ना हम तुम रहे अब

कुछ और ही हो गये अब

सपनो की झिलमिल नगर मे

जाने कहा खो गये अब

हमराह पूछे किसी से ना तुम

अपनी मंज़िल बताओ

महफ़िल मे अब कौन है अजनबी

तुम मेरे पास आओ

दिल की गिरह खोल दो

चुप ना बैठो, कोई गीत गाओ

कल हमसे पूछे ना कोई

क्या हो गया था तुम्हे कल

मुड़कर नही देखते हम

दिल मे कहा है चला चल

जो दूर पीछे कही रह गये

अब उन्हे मत बुलाओ

महफ़िल मे अब कौन है अजनबी

तुम मेरे पास आओ

दिल की गिरह खोल दो

चुप ना बैठो, कोई गीत गाओ

***

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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