पल पल दिल के पास, तुम रहती हो!

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन/

इस लेख की शुरुआत राजेंद्र कृष्ण के दो ऐसे गीतों का उल्लेख करते हुए करना चाहूंगा जिन्हे लगभग हर पीढ़ी के लोगों ने सुनकर गौरव महसूस किया है। राष्ट्रपिता गांधी के अवसान पर उन्होंने लिखा ‘सुनो सुनो ए दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी’ जिसे मोहम्मद रफ़ी ने अपनी आवाज से संवारा  है।  दूसरा गीत ‘जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वो भारत देश है मेरा’ फिल्म ‘सिकंदर ए आजम’ को बजाए बगैर न स्वाधीनता दिवस न ही स्वतंत्रता दिवस अपनी सार्थकता पाता है न ही हमें देशप्रेम की फीलिंग आती है।

इन्ही राजेंद्र कृष्ण ने उल्लेखित दो गीतों के अतिरिक्त सैंकड़ों फिल्मों के संवाद लिखे  और सैंकड़ों ही रूमानी श्रंगारिक  गीत रचे। उनके रूमानी गीतों के सिर्फ मुखड़ों का ही जिक्र किया जाए तो सुबह की शाम हो सकती है।  आपकी स्मृतियों को रिफ्रेश करने के लिए चुनिंदा मुखड़े पेश-ए-खिदमत है! ‘मेरे पिया गए रंगून वहां से किया है टेलीफून’- पतंगा, ‘शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो’-अलबेला, ‘हम प्यार में जलने वालों को चैन कहाँ-जेलर’, ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे’-देख कबीरा रोया, ‘तुम्ही मेरे मंदिर तुम्ही देवता हो’- खानदान, ‘तुम्ही तो लाई  हो जीवन में मेरे प्यार प्यार’- पड़ोसन, ‘जादूगर तेरे नैना दिल जाएगा बचके कहाँ’ -मन मंदिर, ‘कभी कभी ऐसा भी तो होता है राह में चलते चलते’- वारिस, से लेकर रेखा अमिताभ की सिलसिला तक राजेंद्र कृष्ण ने  प्रेमल  गीतों का ऐसा संसार रचा है जिससे गुजरे बगैर जीवन अकारथ लगता  है। ये ऐसे गीत है जो सिर्फ एक बार सुनने पर देर तक आपको भिगोए रखते है।

1973 में आई फिल्म ‘ब्लैकमेल’ के दो गीत राजेंद्र कृष्ण के अन्य गीतों की तरह आज भी लोकप्रियता के शिखर पर विराजे हुए है। अपने रूप सौंदर्य से इतर अपनी कजरारी आँखों के लिए भी याद रखी जाने वाली राखी, ही -मेन बनने से पहले के  हैंडसम धर्मेंद्र और कालीचरण का रूप धरने से पहले के शत्रुघ्न सिंहा इस फिल्म का त्रिकोण थे। मजे की बात है कि दोनों नायक नायिका को लुभाने की कोशिश करते है  और उनमे किसी भी तरह की दुश्मनी भी नहीं है। प्रेम प्रस्ताव की  दुविधा से गुजरती नायिका इस कहानी के केंद्र में है ! मतलब कोई खलनायक नहीं फिल्म के अंत के पहले तक! यहाँ तक कि मदन पूरी जैसे हमेशा घुसर  चरित्र निभाने वाले अभिनेता  भी शालीन रूप में उपस्थित  है ।

‘ब्लैकमेल’ को विजय आनंद ने निर्देशित किया था। गाइड (1965) पहले ही  उनकी काबलियत के परचम को देश की सरहदों के बाहर ले जा चुकी थी। स्त्री पुरुष के रिश्तों को परिपक्वता के नजरिये से देखना और स्वाभाविकता से दर्शाना उनके निर्देशकीय कौशल की पहचान बन चुका था।  विजय आनंद ने गीतों के  फिल्मांकन में चमत्कारी प्रयोग किये है। गाइड का ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’, ज्वेल थीफ का ‘होठों में ऐसी बात छुपा के  चली आई’, जानी मेरा नाम का ‘पल भर के लिए कोई हमें प्यार करले’ उनकी जुदा शैली के महत्वपूर्ण सिनेमाई दस्तावेज है।  ब्लैकमेल  का  रूमानी गीत ‘पल पल दिल के पास तुम रहती हो’ न सिर्फ अपनी भावनाओ की वजह से वरन अपने अनूठे फिल्मांकन की वजह से भी कालजयी बन गया है। प्रेम पत्र पढ़ती नायिका की कल्पना में नायक का होना (बगैर ड्रीम सीक्वेंस के) विजय आनंद की रचनात्मकता का मील का पत्थर  है। प्रेमपत्र पढ़ते समय लोग इसी तरह अपने प्रियतम को अपने आसपास महसूस करते है। विजय आनंद ने एक कल्पना को वास्तविकता में बदल दिया।  इसी तरह एक और गीत जहाँ नायक नायिका खलनायक की टीम से बचने के लिए लकड़ी के ढेर में छुपे है और पार्श्व में बजता ‘मिले मिले दो बदन’ कल्याणजी आनंद जी के संगीत  से उपजे थ्रिल के कारण यादगार बन गया है। श्रोता न गीत के बोल भूल पाता है न ही मेलोडी को।  बहुतेरे फिल्म समीक्षक इस गीत को सादगी के साथ फिल्माए गए शानदार इरोटिक गीत की श्रेणी में भी रखते है।

ब्लैकमेल के ये  दोनों ही गीत फिल्म के अन्य गीतों के साथ  यूट्यूब पर उपलब्ध है। आपने सुने भी होंगे ! इस लेख को पढ़ने के बाद एकबार पुनः इन्हे देखे व नवीनता महसूस करे।

पल पल दिल के पास, तुम रहती हो

जीवन मीठी प्यास, ये कहती हो

पल पल …

 हर शाम आँखों पर, तेरा आँचल लहराए

हर रात यादों की, बारात ले आए

मैं सांस लेता हूँ, तेरी खुशबू आती है

एक महका महका सा, पैगाम लाती है

मेरे दिल कि धड़कन भी, तेरे गीत गाती है

पल पल …

 कल तुझको देखा था, मैने अपने आंगन में

जैसे कह रही थी तुम, मुझे बाँध लो बन्धन में

ये कैसा रिश्ता है, ये कैसे सपने हैं

बेगाने हो कर भी, क्यूँ लगते अपने हैं

मैं सोच मैं रहता हूँ, डर डर के कहता हूँ

पल पल …

 तुम सोचोगी क्यूँ इतना, मैं तुमसे प्यार करूं

तुम समझोगी दीवाना, मैं भी इक़रार करूं

दीवानों की ये बातें, दीवाने जानते हैं

जलने में क्या मज़ा है, परवाने जानते हैं

तुम यूँ ही जलाते रहना, आ आ कर ख़्वाबों में

पल पल …

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(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और पत्र -पत्रिकाओं में विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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